ट्रंप और शी तमाम खाइयों को पाट सकेंगे, इसकी संभावना नहीं है। तनाव अनियंत्रित ना हो और मतभेद टकराव में ना बदलें, दोनों राष्ट्रपति इतनी उम्मीद भी जगा पाए, तो ट्रंप की यात्रा सफल मानी जाएगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति की आज से शुरू हो रही बीजिंग यात्रा की पुष्टि चीन ने सोमवार को जाकर की, जबकि डॉनल्ड ट्रंप इसको लेकर महीनों से सार्वजनिक रूप से उत्साह जताते रहे हैं। यात्रा के कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा के साथ ही बताया कि चीन के राष्ट्रपति से ट्रंप की वार्ता का एजेंडा तय करने के लिए 12-13 मई को दक्षिण कोरिया के में दोनों के देशों के वरिष्ठ नेता बातचीत करेंगे। ये दोनों तथ्य अमेरिका और चीन के बीच मौजूद खाई के प्रमाण हैं। अतः नौ साल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति चीन पहुंच जरूर रहे हैं, लेकिन इस दौरान चीन से संबंध में कोई खास प्रगति होगी, इसकी संभावना कम ही है।
ट्रंप फिलहाल चीन से तनाव घटाना चाहते हैं, ताकि चीन केंद्रित आपूर्ति शृंखला पर जिन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिका निर्भर है, उनमें उसकी तैयारियों पर विपरीत प्रभाव ना पड़े। साथ ही वे अमेरिका के कृषि एवं अन्य उत्पादों के लिए चीनी बाजार को और खुलवाना चाहते हैँ। अमेरिका की शिकायत है कि पिछले अक्टूबर में दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने सोयाबीन सहित कृषि उत्पादों की जितनी खरीद का वादा किया, चीन ने उसे नहीं निभाया। उधर ट्रंप की यात्रा से चीन की अपेक्षाएं अलग हैं।
उसकी पहली मांग है कि ट्रंप ताइवान की आजादी का समर्थन ना करने का एलान करें। फिर चीन के ऊर्जा स्रोतों को बाधित करने, हाई टेक में चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध और भू-राजनीतिक संबंधी दबावों के मुद्दे से संबंधित मुद्दे शी की निगाह में अहम हैं। इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए हालात हैं, जिनमें अमेरिका और चीन दो अलग धुरियों पर खड़े हैं। गुरुवार को होने वाली शिखर वार्ता में ट्रंप और शी इन सारी खाइयों को पाट सकेंगे, इसका भरोसा किसी को नहीं है। इसलिए तनाव अनियंत्रित ना हो और मतभेद टकराव में ना बदलें, दोनों राष्ट्रपति इतनी उम्मीद भी जगा पाए, तो ट्रंप की यात्रा सफल मानी जाएगी। वैसे, अपने स्वभाव के मुताबिक ट्रंप का ध्यान अपनी जीत दिखाने वाली कुछ दिखावटी उपलब्धियों पर भी रहेगा, जिसे प्रदान करने में चीन को शायद ज्यादा दिक्कत नहीं होगी।
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