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धर्म-जाति के बाद अब क्षेत्रीयवाद का खतरा-संघ राष्ट्र को

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भोपाल। जाति के कारण कुछ समय पूर्व तामिलनाडु के एक मंदिर में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रवेश वर्जित था, जब जिला प्रशासन ने वहां दखल देकर उनको मंदिर में प्रवेश दिलाया, तब किसी शरारती ने वहां की पानी की टंकी में मानव मल मिला दिया। फलस्वरूप दर्जनों बच्चे उस पानी को पीकर अचानक बीमार हो गए। फिर महिला कलेक्टर को स्वयं वहां जाकर लोगों को समझाना पड़ा कि कानून के अनुसार किसी भी हिन्दू को मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।

इधर, धरम को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस मुस्लिम माफिया के घरों को प्रयाग उर्फ इलाहाबाद में एक के बाद एक घरों पर बुलडोजर चलाती जा रही हैं ! वैसे वहां की पुलिस के पास 43 ऐसे लोग हैं जो माफिया के रूप में कुख्यात हैं। परंतु उन पर अभी तक कोई कारवाई नहीं हुई! जाति और धरम के आधार पर सत्ता प्रतिस्थानों द्वारा नफरत की जिस आग को आसरा या सहारा दिया जा रहा हैं उसकी घटना राजस्थान के दो मुस्लिमों की बालेरों गाड़ी में जला कर हत्या की घटना हाल ही की हैं। अब चूंकि हत्या के दोषी हरियाणा के हैं और उनमें तीन लोग हरियाणा पुलिस के मुखबिर हैं, तो उनकी गिरफ्तारी तो हुई नहीं, हाँ एक सह अभियुक्त की गिरफ्तारी राजस्थान पुलिस ने की है। उसने 8 आठ लोगों के वारदात में शामिल होने की बात मंजूर की हैं। राजस्थान पुलिस के दबाव में हरियाणा पुलिस ने उन लोगों के फोटो सार्वजनिक कर उनको फरार बताया हैं ! कहते हैं जुनैद और उसके साथियों को इन आठों लोगों के गैंग ने गाय की तस्करी के संदेह में पकड़ा था। हरियाणा पुलिस के स्रोतों ने स्वीकार किया इनमें तीन लोग उनको जानवरों की तस्करी की खबर देते थे।

खबर लिखे जाने तक कोई और गिरफ्तारी नहीं हुई हैं। हाँ राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलौट ने मृतकों के परिवारों के नाम पाँच लाख की मियादी जमा और 1 लाख नकद की सहता उनके गांव में जाकर की हैं। यानि अब गाय को लेकर जो राजनीति उत्तर प्रदेश से शुरू हुई थी वह अब हरियाणा और राजस्थान तक पहुँच गयी हैं। गाय को लेकर जहां उत्तर भारत में इतनी मारा मारी है, वहीं उत्तर पूर्व के राज्यों नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा में बीजेपी नेताओं की मौजूदगी में नए सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने खुले आम कहा हैं कि सरकार में आने के बाद बीफ यानि गौ मांस सस्ता मिलेगा ! अब यह विरोधाभास भारत में ही हैं की उत्तर पूर्व और दक्षिण राज्यों में बीफ खाने पर कोई प्रतिबंध नहीं हैं ! हाँ गौ की तस्करी के लिए मुस्लिमों की जान जरूर ली जा सकती हैं। क्यूं ना इन बजरंग दल के उत्साही नेताओं को मेघालय या नागालैंड भेज दे। वहां उनकी बहादुरी अपने आप टेस्ट हो जाएगी।

क्षेत्रवाद का जहर एक बार फिर पंजाब की शांति – व्यवस्था को दहलाये हुए हैं। जिस प्रकार वारिस पंजाब दे के नेता अमृतपाल सिंह ने अजनला में पुलिस ठाणे पर हमला करके हथियारबंद लोगों को गुरु ग्रंथ साहब की पालकी के पीछे रख कर पुलिस को बेबस कर दिया, उसकी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से आलोचना या भर्त्सना नहीं करना –एक बार फिर भिंडरनवाले के धार्मिक आतंक की याद दिला रहा हैं। राज्य की पुलिस इस अलगाववादी आंदोलन के आतंकी संगठन को यदि नहीं रोका गया तब आपरेशन ब्लू स्टार जैसी पुनरावृती हो सकती हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री मान ने देश के गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर इस समस्या पर बात की हैं। यह वास्तविकता हैं कि इस समस्या का हल पंजाब सरकार अकेले नहीं निकाल सकती। क्यूंकि गोल्डेन टैम्पल और गुरुद्वारा प्रबंध समिति में अकाली दल का वर्चस्व है जिनकी विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजय हुई हैं। अब हरमंदिर साहब से कोई फरमान इस बाबत नहीं निकालना की गुरु ग्रंथ साहब की पालकी को ढाल बनाकर ऐसी हरकत करना गैर वाजिब है, अपने आप में शक पैदा करता हैं। इतना ही नहीं घटना के बाद वे सभी लोग राइफल, बंदूक, फारसा आदि से लैस हरमंदिर साहब दर्शन करने गए। वहां किसी भी प्रकार की रोक –टॉक नहीं होना अचंभे की बात हैं।

इधर यह हो रहा था उधर तमिलनाडु में बिहारी और उत्तर भारतीय मजदूरों का तमिल गुंडों द्वारा उत्पीड़न किए जाने की घटना ने वहां के सूती मिलों में भय पैदा कर दिया हैं। कारण तमिल मजदूर 8 घंटे से ज्याता काम नहीं करना चाहते हैं। जबकि प्रवासी उत्तर भारतीय कमाई के लिए 12 से 14 घंटे तक काम करते हैं। साथ ही वे अनुशासित रहते हैं, जबकि तमिल मजदूर शराब के नशे में वातावरण को गंदा करते हैं। यह घटना अभी भले दो स्थानों की हो परंतु यह बाल ठाकरे के महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों का आंदोलन की याद ताज़ा कर देता हैं। जब दक्षिण भारतीयों के रेस्टुरेंट और होटलों को निशाना बनाया गया। वैसा बुरा वक़्त उद्योग और देश की एकता को खंडित करने वाला हैं। भले ही प्रांतवाद की अवधारणा स्थानीय अस्मिता को उभरने में सहायक हो, जो स्थानीय राजनैतिक दलो के लिए भले ही सहायक हो परंतु छेत्र की अखंडता के लिए घटक होती हैं।
कुछ दशक पूर्व आसाम में भी वहां के छात्रों ने असम गण परिषद के तले गैर आसामिया लोगों को विशेस्कर बंगालियो के खिलाफ आंदोलन चलाया बाद में वे विधानसभा चुनाव जीत कर सरकार भी बनाई। परंतु आसाम के ढांचे में आज भी कोई बहुत बदलाव नहीं आया। और वे राजनीतिक अखाड़े से बिलकुल बाहर हो गए। अब वहां बीजेपी है। यह सब लिखने का अर्थ सिर्फ इतना हैं की केंद्र सरकार को इन घटनाओं की खबर करनी कहिए, वरना बात के हाथ से निकाल जाने के बाद….

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