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कर्नाटक की हवा का असर छत्तीसगढ़-मप्र पहुंचा!

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छत्तीसगढ़ में भाजपा के सबसे बड़े आदिवासी नेता नंदकुमार साय कांग्रेस में शामिल हो गए। वे 3 बार विधायक, 3 बार लोकसभा सदस्य, दो बार राज्यसभासदस्य रहे और अविभाजित मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष भी। मगर इससे उनके महत्व का अंदाजा मत लगाइए। ये देखिए कि वे आज के नहीं जनसंघ के समय के पार्टी के नेता है। और छत्तीसगढ़ में एक तिहाई आबादी आदिवासियों की है।…बड़ी बहन वसुन्धरा भी राजस्थान में कम्फरटेबल नहीं हैं।…वहां से भी कोई बड़ी खबर कभी भी आ सकती है।

क्या मौसम बदल रहा है? वेदर, भौगोलिक मौसम नहीं वह तो सब को दिख रहा है।शहर के लोग उसे सुहावना कहकर खुश हो रहे हैं। गांव के, खेती किसानी वालेचिंता कर रहे हैं। कुछ जगह जहां खलिहाल लेट हो गए थे वहां तो नुकसान हुआ ही है। मगर चैत बैसाख में वर्षा होना वैसे भी अनिष्ट की आशंका जताता है।

चैत – बैसाख – जेठ जब खूब तपता है तो मानसून अच्छा आता है। भारत में अभीभी कृषि वर्षा पर आधारित है। मुख्य फसल खरीफ की होती है। धान, ज्वार,मक्का, बाजरा, दलहन, तिलहन सब आसाढ़ सावन भादों की वर्षा की मेहरबानी सेहोती हैं। कहा जाता है कि  “ एक बूंद जो चैत में परे, सहस बूंद सावन मेंहरे!  “ या गांवों में यह कहावत मशहूर है कि “ चमकी भली ने चैत में, बूठोभलो न जेठ !” मतलब चैत ( मार्च-अप्रैल) में बिजली चमकना और जेठ ( मई-जून)में बारिश होना खेती के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

खैर फिलहाल खेती-किसानी की बात नहीं है। कौन सुनता है खेत खलिहान की बात। एकमुहावरा है गांवों में कस्बों में सबसे लोकप्रिय कि इन्हें खेल खलिहानमें फर्क नहीं मालूम! लेकिन उससे क्या आजकल! कह दिया जाएगा कि किसान तोआतंकवादी है, गुंडा है वह अगर फसल नहीं उगाएगा तो हम अडानी कीफैक्ट्रिर्यों में पैदा कर लेंगे। इतिहास खुद को किस तरह अभिशाप की तरहदोहराता है कि फ्रांस की रानी की तरह रोटी नहीं है तो ब्रेड खाएं!  हमारेयहां कभी भी कहा जा सकता है कि रोटी नहीं है तो पकोड़े खाओ! पकौड़े बेचने को रोजगार का बढ़िया साधन तो बता ही दिया गया है।

लेकिन बात राजनीतिक मौसम की करना थी। क्योंकि अब सब उसी से बदलता है। यथाराजा तथा प्रजा का जीवन होता है। तो कर्नाटक में एक हवा चली और उसका असरपहले छत्तीसगढ़ और फिर मध्य प्रदेश में भी पहुंच गया।

छत्तीसगढ़ में भाजपा के सबसे बड़े आदिवासी नेता नंदकुमार साय कांग्रेस में शामिल हो गए। वे 3 बार विधायक, 3 बार लोकसभा सदस्य, दो बार राज्यसभासदस्य रहे और अविभाजित मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष भी। मगर इससे उनकेमहत्व का अंदाजा मत लगाइए। ये देखिए कि वे आज के नहीं जनसंघ के समय केपार्टी के नेता है। और छत्तीसगढ़ में एक तिहाई आबादी आदिवासियों की है।

और लगभग इतनी ही सीटें 29 ( 90 में से) उनके लिए आरक्षित हैं। अब आप समझसकते हैं कि भाजपा को कितना बड़ा झटका लगा है। और इससे भी ज्यादा वेक्यों गए के सवाल के जवाब में! जवाब जो जनता दे रही है। जनता राजनीतिकरूप से तो जागरुक है। वह समझ गई कि कांग्रेस सरकार वहां वापस आ रही है।और यही वह कह रही है कि राज्य में भाजपा की संभावनाएं अब पूरी तरह खत्म।साय जी ने मौसम पहचान लिया है।

अब छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तो दो दशक पहले तक एक ही थे। एक ही राजनीतिक माहौल चलता था। तो अब राजनीतिक हवा छत्तीसगढ़ से फौरन मध्य प्रदेश में भी पहुंच गई। वहां भाजपा के पहले मुख्यमंत्री रहे राज्य के सबसे बड़े भाजपा नेताओं में माने जाने वाले कैलाश जोशी के बेटे तीन बार के विधायक, मंत्री रहे दीपक जोशी भी 6 मई को कांग्रेस ज्वाइन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश मेंयह कांग्रेस की बड़ी सफलता है। कैलाश जोशी वे नेता थे जो 8 बार विधायक,लोकसभा, राज्यसभा सदस्य तो रहे ही भाजपा के सबसे अऩुशासित और सहज सज्जन

नेताओं में माने जाते थे। इतने कि एक बार विजयाराजे सिंधिया ने उन्हें अपने बेटे माधवराव सिंधिया के साथ चल रहे महल के विवाद में भूख हड़ताल तक पर बिठा दिया गया था। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा बुझाकर उठाया गया कियह पार्टी का मामला नहीं है विजयाराजे का संपत्ति का व्यक्तिगत मामला है।

उनके बेटे का पार्टी छोड़ने का फैसला साधारण नहीं है। इसका व्यापक असरपड़ेगा। जैसे कैलाश जोशी भाजपा के पहले मुख्यमंत्री थे। वैसे ही अटलबिहारी वाजपेयी भाजपा के पहले प्रधानमंत्री। उनके भांजे अनूप मिश्रा मध्य प्रदेश में मंत्री, लोकसभा सदस्य और लगभग पेंतालिस पचास साल से जमीनीनेता रहे। छात्र जीवन से। वाजपेयी जी के नाम पर नहीं अपनी मेहनत सेउन्होंने ग्वालियर में जगह बनाई थी। मगर अब नुकसान सारा वाजपेयी के भांजेहोने के कारण उठाना पड़ रहा है। जैसा कि नंद कुमार साय ने कहा कि अबवाजपेयी आडवानी की पार्टी नहीं रही। तो उनके नाम से जुड़े लोगों की भी अबपार्टी में जगह नहीं रही। अनूप मिश्रा हाशिए पर पड़े हैं। दूसरी भांजीकरुणा शुक्ला जो भी विधायक और सांसद रह चुकी हैं भाजपा छोड़ चुकी हैं।

यहां यह बताना आवश्यक है कि मध्य प्रदेश के ही ग्वालियर के जन्मे और रहनेवाले वाजेपेयी खुद कभी अपने गृह राज्य से नहीं जीत पाए। उनके भांजे औरभांजी अपनी दम से राजनीति में जीतें हासिल करते रहे। लेकिन वाजपेयी केकमजोर होते ही उन्हें अकारण हाशिए पर डाल दिया गया।

मध्य प्रदेश में भाजपा के दूसरी पीढ़ी के नेताओं के लिए यह एक बड़ीतकलीफदेह बात है। विजया राजे सिंधिया मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी और पार्टीको बनाने वाली भाजपा नेता थीं। 1967 में उन्होंने कांग्रेस की सरकारगिराकर राज्य में पहली गैर कांग्रेस सरकार गोविन्द नारायण सिंह ( वे बागीकांग्रेसी थे)  के नेतृत्व में बनावाई थी। कैलाश जोशी बाद में जनतापार्टी के आने के बाद 1977 में पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने। खैर तो उनविजयाराजे सिंधिया जिन्हें भाजपा राजमाता कहती थी कि बेटी यशोधरा राजे कोभी कई बार अपनी अवहेलना और राजमाता की भी उपेक्षा की पार्टी और सरकार सेशिकायत हुई। जबकि वे भी अपनी दम पर ही शिवपुरी से विधानसभा जीतती हैं।मध्य प्रदेश में इस समय भाजपा की जो सीटें सबसे मजबूत मानी जा रही हैंउनमें यशोधरा की सीट सबसे उपर है।

बड़ी बहन वसुन्धरा भी राजस्थान मेंकम्फरटेबल नहीं हैं। वे राजस्थान की भाजपा की सबसे बड़ी नेता हैं। मगर आजके नए पार्टी नेतृत्व की कृपा दृष्टि पाने से वंचित। वहां से भी कोई बड़ीखबर कभी भी आ सकती है। सिंधिया परिवार में वसुंधरा सबसे ज्यादास्वाभिमानी हैं इतनी कि कुछ लोगों को वे अहंकारी भी लगती हैं। मगर जिनकोउनकी शादी और अपने ग्वालियर की तुलना में छोटे राजघराने धौलपुर के बारेमें एवं वहां बिताए वसुन्धरा के दिनों के बारे में मालूम है वे जानते हैंकि महाराणी कहलाने वाली उनसे समझौता नहीं होता है।

तो राजनीति में कुछ हवा बदलने के इमकान हैं। यह ऐसे मालूम पड़ता है कि जबपाजिटिव लहर चलती है तो शाट में अपने आप जान आने लगती है। प्रियंका नेकर्नाटक में प्रधानमंत्री मोदी को जो जवाब दिया वह पार्टी के आत्मविश्वासको बताता है।

नेता के मुंह से ऐसा करारा जवाब तभी निकलता है जब स्थितियां उसके साजगारहोती है। कर्नाटक में कांग्रेस जीत के आत्मविश्वास से भरी हुई हैं। इसके बहुआयामी असर हो रहे हैं। ज्यादातर विपक्षी दल विपक्षी एकता की जरूरत कोस्वीकारने लगे हैं। कर्नाटक चुनाव के बाद पटना में एक बड़ा विपक्षीसम्मेलन हो सकता है। पूरा विपक्ष समझ रहा है कि कर्नाटक के बाद कांग्रेसऔर मजबूत होगी। तीनों राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में भीवह जबर्दस्त प्रदर्शन करेगी। जाहिर है कि उसके बाद 2024 का लोकसभा चुनावदिलचस्प हो जाएगा। अगर विपक्ष एक हो गया तो दिलचस्प से ज्यादा वह कांटेकी टक्कर बन जाएगा। और कांटे की टक्कर में हमेशा स्थापित सत्ता चुनौतिदेने वाली ताकतों से मुकाबला नहीं कर पाती है।

2014 में कांग्रेस नहीं कर पाई। और 2004 में वाजपेयी।

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By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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