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‘ईडी से एकजुट’ हुए नेताओं की नादानी!

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राजनीति में सफल होने के लिए नेता के पास एक अच्छी कहानी होनी चाहिए। आम लोगों को जो जितनी अच्छी कहानी सुना सकता है, उसके सफल होने की संभावना उतनी ज्यादा होती है। कहानी से ही धारणा बनती और बिगड़ती है। दूसरे की कहानी में मीन-मेख निकालने वालों के सफल होने की संभावना कम रहती है। साहित्य में भी नोबल या बुकर पुरस्कार मौलिक कहानी लिखने वालों को मिलता है, कहानी की समालोचना करने वालों को नहीं। पता नहीं क्यों भारत की विपक्षी पार्टियां इस बुनियादी बात को क्यों नहीं समझ रही हैं। उनकी नजरों के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहानी गढ़ रहे हैं और वे उस कहानी की समालोचना में जुटे हैं।

सोचें, जब संसद में खड़े होकर प्रधानमंत्री ने कह दिया कि राजनीति या मतदाताओं के कारण नहीं, बल्कि ईडी के कारण विपक्ष एकजुट हुआ है, उसके बाद विपक्षी पार्टियों की ओर से इसी मसले पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने का क्या मतलब है? प्रधानमंत्री ने आठ फरवरी को लोकसभा में कहा था, ‘भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने वाली एजेंसियों के बारे में बहुत कुछ कहा गया और कई लोग उनके सुर में सुर मिला रहे थे। पहले लगता था कि देश की जनता का फैसला, चुनावी नतीजा इन्हें एक मंच पर ला देगा, लेकिन जो काम देश के मतदाता नहीं कर सके वो काम ईडी ने कर दिया’। मोदी ने कहा कि विपक्षी पार्टियों को ईडी को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने सबको एक मंच पर ला दिया। प्रधानमंत्री इतने स्पष्ट रूप से समूचे विपक्ष को भ्रष्ट साबित करने की कहानी गढ़ रहे हैं, चटखारे लेकर सुना रहे हैं और विपक्ष उसमें मीन-मेख निकालने में जुटा है!

विपक्ष की नौ पार्टियों के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है, जिसमें बहुत विस्तार से बताया गया है कि किस तरह से केंद्रीय एजेंसियां जैसे सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग आदि विपक्षी पार्टियों को जान बूझकर निशाना बना रही हैं और झूठे मुकदमों में फंसा रही हैं। सवाल है कि इसमें प्रधानमंत्री को बताने वाली क्या बात है? जब प्रधानमंत्री खुद ही कह रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने विपक्ष को एकजुट किया है तो फिर उसी मसले पर विपक्षी एकजुटता दिखाने की क्या जरूरत है? यह तो भाजपा की कहानी है, नरेंद्र मोदी की कहानी है! वे तो चाहते हैं कि भ्रष्टाचार पर चर्चा हो और बाकी मुद्दे नेपथ्य में चले जाएं। ध्यान रहे भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा जनता को आकर्षित करता है और इस बात को कांग्रेस से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता है। आखिर उसने 1989 और 2014 में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार गंवाई है। हालांकि प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने वाली नौ विपक्षी पार्टियों में कांग्रेस शामिल नहीं है लेकिन कांग्रेस भी अलग से यह मुद्दा उठाए हुए हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई विपक्षी नेताओं के खिलाफ ही हो रही है। एक आंकड़े के मुताबिक 2014 के बाद ईडी ने जितने मुकदमे दर्ज किए हैं और जितने छापे मारे हैं उनमें से 95 फीसदी कार्रवाई विपक्षी नेताओं के खिलाफ हुई है। सीबीआई के मामले में भी आंकड़ा यही है। इससे पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के शासनकाल में केंद्रीय एजेंसियों की 60 से 65 फीसदी कार्रवाई विपक्ष के खिलाफ हुई थी। उसके बाद ईडी की कार्रवाई में चार गुना बढ़ोतरी हुई है और 95 फीसदी कार्रवाई विपक्ष के खिलाफ हुई है। यह भी हकीकत है कि भ्रष्टाचार के आरोप में घिरा कोई नेता भाजपा में चला गया तो उसके खिलाफ जांच स्थगित हो जाती है। असम में हिमंता बिस्वा सरमा से लेकर पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी और महाराष्ट्र में नारायण राणे तक की मिसाल है। अजित पवार तो तीन चार दिन के लिए ही भाजपा के साथ गए थे और उतने में ही उनके मुकदमे खत्म हो गए थे।

सो, विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई में बढ़ोतरी और भाजपा के अपने या उसके सहयोगी नेताओं को राहत दिए जाने की खबर में कुछ भी नया नहीं है। कांग्रेस के समय भी ऐसा था और अब भी है, बस डिग्री का फर्क हो गया है। इसे मुद्दा बना कर विपक्षी पार्टियां महाभूल कर रही हैं। उनको समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार के मसले पर वे अपने को पीड़ित बता कर जनता की सहानुभूति नहीं ले सकती हैं। अस्मिता की राजनीति करने वालों यानी जातीय या भाषायी पहचान की राजनीति करने वालों को एक खास वर्ग की सहानुभूति इस मसले पर मिल सकती है लेकिन सामान्य नागरिक इस मसले पर उनका समर्थन नहीं कर सकता है। इस मुद्दे पर राजनीति करने का दूसरा खतरा यह है कि जिन पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, पहले उनके प्रति आम लोगों के बीच एक धारणा बनाई गई है। विपक्षी नेताओं को प्रचार, भाषण और सोशल मीडिया के जरिए भ्रष्ट ठहराया गया है। उनके भ्रष्ट होने की छवि बनाई गई है और उसके बाद कार्रवाई हुई है।

ऐसे में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर या मीडिया में रो-गाकर बताने से विपक्षी नेताओं को कोई सहानुभूति नहीं मिलने वाली है। सहानुभूति हासिल करने की तमाम कोशिशें उलटे उनको दयनीय और बेचारा बना रही हैं। ध्यान रहे हर पार्टी के कुछ कट्टर समर्थक होते हैं और एक निश्चित वोट बैंक होता है उसके बीच जरूर सहानुभूति बन रही है लेकिन आम लोगों के बीच मजाक बन रहा है। विपक्षी पार्टियों की इस तरह की उलटी सीधी हरकतों से भ्रष्टाचार की कहानी लोगों के दिल दिमाग में बैठ रही है। भाजपा के नेता और उसका आईटी सेल गड़े मुर्दे उखाड़ रहा है। प्रधानमंत्री खुद भ्रष्टाचार का कहानी नेहरू के जमाने में हुए जीप घोटाले तक ले गए हैं और जब अदानी की कंपनी में एलआईसी का पैसा डूबने की बात आई तो भाजपा ने एलआईसी में नेहरू के जमाने में हुए मुंदड़ा घोटाले का जिन्न निकाला। सो, विपक्ष को इस बहस में पड़ने की बजाय साहस दिखाना चाहिए। केंद्रीय एजेंसियों की शिकायत करने और रो-गाकर खुद को पीड़ित बताने की बजाय अपनी कहानी लेकर लोगों के बीच जाना चाहिए।

विपक्ष के पास बहुत अच्छी कहानी है लेकिन वह उस कहानी पर एक अच्छी पटकथा नहीं बना पा रहा है। उसके पास कोई ऐसा नेता भी नहीं है, जो उस कहानी को बेहतर ढंग से जनता को सुना सके। विपक्षी नेता यह भी नहीं समझ रहे हैं कि लोगों को उनकी निजी तकलीफ में कोई रूचि नहीं है। अगर विपक्ष आम लोगों की तकलीफों से अपने को जोड़े और उसकी कहानी सुनाए तो लोग उसे जरूर सुनेंगे। कहानी लोगों से जुड़ेगी तभी सफल होगी। अपना रोना रोने की बजाय विपक्ष के पास अगर सरकार के भ्रष्टाचार की कहानी है तो वह सुनाए। महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी की वास्तविक समस्या लोगों को बताए। विकास का अपना मॉडल लोगों के सामने पेश करे। विपक्ष यह ध्यान रखे कि 2014 के चुनाव में कहीं भी मोदी ने यह नहीं कहा था कि केंद्र की कांग्रेस सरकार ने उनको किस तरह से परेशान किया था या अमित शाह को कैसे परेशान किया जा रहा है। उन्होंने अपनी कहानी गढ़ी थी और प्रभावशाली तरीके से लोगों को सुनाया था। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां भी भाजपा और नरेंद्र मोदी के बनाए नैरेटिव के जाल में उलझने की बजाय अपना नैरेटिव बनाएं।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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