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बेबाक विचार

टूटते सपने, बिखरती आशाएं

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भारत के लिए जी-20 की बैठकों का आयोजन गौरव की बात है, अवसरों की दस्तक है तो जबरदस्त रस्साकशी में उलझना भी है।… वैश्विक गर्वनेश या देश की गर्वनेश, सभी और वह उम्मीद कहा है जिस परहम मिलेनिअल्स (सन् 1980 के बाद जन्मे) कभी पूरी मजबूती और ताकत से विश्वास करते थे।एक समय था जब मैं उम्मीद शब्द पर पूरी शिद्दत से विश्वास करती थी।विश्वास इसलिए क्योंकि हमने जब होश संभाला तब दुनिया तनातनी, शीत युद्ध और अफरातफरी के दौर को पीछे छोड़कर, उदारीकरण के खुले झोंको में अपेक्षाओं और आशा से भरे युग में प्रवेश कर रही थी।

ओह! इतनी कूटनीति। हम कल्पना नहीं कर सकते है कि भारत के कूटनीतिज्ञों को इन दिनों कितनी भागदौड़ करनी पड रही है!भारत के लिए जी-20 की बैठकों का आयोजन गौरव की बात है, अवसरों की दस्तक है तो जबरदस्त रस्साकशी में उलझना भी है। पहले जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों की और अब विदेश मंत्री स्तर की मौजूदा बैठक काएक साझा बयान बन सकना भी इतना मुश्किल! …देशों में इतने गंभीर मतभेद! दुनिया इतनी बिखरी हुई! परस्पर ऐसी नफरत! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 के विदेश मंत्रियों से गलत नहीं कहा कि ग्लोबल गर्वनेश फेल है। तभी तो जी-20 की बैठक में साझा विचार और बयान मुश्किल और संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों, बैठकों और प्रस्तावों का भी अर्थ नहीं।

वैश्विक गर्वनेश या देश की गर्वनेश, सभी और वह ‘उम्मीद’ कहा है जिस परहम मिलेनिअल्स (सन् 1980 के बाद जन्मे) कभी पूरी मजबूती और ताकत से विश्वास करते थे।

एक समय था जब मैं ‘उम्मीद’ शब्द पर पूरी शिद्दत से विश्वास करती थी। अंग्रेजी के चार अक्षरों का छोटा-सा ‘होप’शब्द तब हिम्मत और निश्चिंतता, संभावनाओं से लबालब था। विश्वास इसलिए क्योंकि हमने जब होश संभाला तब दुनिया तनातनी, शीत युद्ध और अफरातफरी के दौर को पीछे छोड़कर, उदारीकरण के खुले झोंको में अपेक्षाओं और आशा से भरे युग में प्रवेश कर रही थी।

बर्लिन की दीवार ढ़हाई जा चुकी थी।सोवियत संघ दुनिया के नक्शे से अदृश्य हो गया था।शीतयुद्ध ठंडा पड़ चुका था।उदारीकरण का उदय हो चुका था।दुनिया के कुछ हिस्सों में पहली बार लोकतंत्र का सूर्य उग रहा था और कुछ में लोकशाही की फिर से वापसी हो रही थी। वैश्वीकरण की शुरूआत हो चुकी थी और ‘वैश्विक नागरिक’ की एक नई अवधारणा हमारे सामने थी। कुल मिलाकर, पूरी दुनिया भविष्य को आशा भरी निगाहों से देख रही थी और वह सही था। लड़ाई-झगड़ों के खत्म होने की आस में इतिहास के अंत होने की भविष्यवाणी होने लगी थी। सन् 1990 का दशक और नई सदी के शुरूआती दौर में आने वाले अच्छे दिनों की पदचाप साफ़ सुनाई पड़ रही थी.

और भारत भी दुनिया के साथ पुराने ढर्रे को अलविदा कह रहा था। जब हम बड़े हो रहे थे तब सांप्रदायिक हिंसा और तनातनी से हमारा रोजाना सामना नहीं होता था। लोगों को एक-दूसरे के खून का प्यासा बनाने वाले दुष्प्रचार का बोलबाला नहीं था। हवा में नफरत नहीं घुली थी। बदला लेना नहीं था। उस समय फोकस प्रगति पर था, अर्थव्यवस्था पर था, देश को सही अर्थों में प्रजातांत्रिक बनाने पर था, नागरिक स्वतंत्रताओं पर और आमजनों को एक अच्छी जिंदगी देने पर था। उस समय सचमुच सब कुछ मुमकिन था, मुमकिन लग रहा था।

और अब? चारों तरफ नजर ड़ाले, देश-दुनिया पर गौर करें। चारों ओर अनिश्चितता, आंशका अराजकता और अशांति है। एक तरह की बेचैनी है। ठहराव है। अनहोनी की आंशकाएं है। कौन जानता था कि जिस इतिहास को हम किताबों से जानते थे और फिल्मों में देखते थे, वह हमारे आसपास घटेगा। हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि हमारी दुनिया को एक पारंपरिक युद्ध से गुजरना पड़ेगा और पूरी दुनिया युद्ध की तमाम मुसीबतों से जूझ रही होगी।

गत 25 फरवरी को रूस-यूक्रेन युद्ध के एक साल पूरे हो गए। इसकी चोट सभी तरफ है। सब घायल है। योरोप और रूस घायल है तो अमेरिका, चीन, भारत और पूरी दुनिया तरह-तरह के नुकसान, दबाव, चिंताओं को झेलते हुए है। आर्थिकी को चोट और रिश्तों कोघाव। अब केवल यूक्रेन और रूस, ज़ेलेंस्की और पुतिन आमने-सामने नहीं हैं. अब लड़ाई पश्चिम और पूरब के बीच है, जिसमें एक ओर बाईडन और सुनक हैं और दूसरी ओर पुतिन और शी जिनपिंग। अब बात अच्छे और बुरे की नहीं वरन् बुरे, और और बुरे की है। ज़ेलेंसकी को पक्का भरोसा है कि पश्चिम की मदद से वे युद्ध जीत जाएंगे। पश्चिम को उतना ही पक्का भरोसा है कि यूक्रेन, पूरी दृढ़ता से तब तक लड़ता रहेगा जब तक वे चाहेंगे। पुतिन निश्चिंत हैं कि जंग में जीत उनकी ही होगी और यूक्रेन रूस का हिस्सा बन जाएगा, फिर चाहे इस प्रक्रिया में रूस टूटकर बिखर जाए और वे अपने नागरिकों का भरोसा खो बैठें। इससे क्या फर्क पड़ता है? वे पुराने दिनों को वापस लाना चाहते हैं, चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े।

जानकारों का मानना है कि इस जंग के जारी रहने से हथियारों की वैसी ही दौड़ एक बार फिर शुरू हो सकती है जैसी 1930 के दशक में दो वैश्विक गुटों के बीच छिड़ गई थी और जिसका अंत द्वितीय विश्वयुद्ध में हुआ था। कौन जानता था कि हमें एक बार फिर वही दिन देखने पड़ेंगे। इस युद्ध के छिड़ने के पहले तक दुनिया एक अलग किस्म की चिंता में डूबी थी। ऐसा लगता था कि भावी युद्ध साईबर दुनिया में लड़े जाएंगे और टैंक, तोपें और गोला-बारूद के दिन लद गए हैं। परंतु इस 21वीं सदी में भी यूक्रेन में चल रहे युद्ध में बंदूकें और बारूद सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं और यही कारण है कि पश्चिम ने बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए इनका उत्पादन बढ़ा दिया है। इसका अर्थ यह भी है कि वैश्विक गठबंधनों को बार-बार कसौटी पर कसा जाएगा।

अभी यूरोपियन यूनियन और नाटो इस युद्ध में यूक्रेन के साथ खड़े हैं। रूस पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं और ये दोनों गुट रूस की सत्ता को कमजोर करने के लिए यूक्रेन को टैंक और गोलाबारूद उपलब्ध करवाने के लिए पानी की तरह डालर बहा रहे हैं। परंतु पुतिन अडिग हैं क्योंकि उन्हें अपने जैसे दोस्त मिल गए हैं। यूरोपियन यूनियन में हंगरी उनके सबसे नजदीक है। फिर उत्तर कोरिया है, ईरान है, दक्षिण अफ्रीका है, चीन है…पुतिन के पास ऐसी शैतानी ताकतों की कमी नहीं है जो हर तरह से उनकी मदद करने को तत्पर हैं.

इस युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। वैश्विक व्यापार, जो कोविड महामारी से उबर ही रहा था, एक बार फिर बिखर गया है। खाद्यान्नों की कीमत आसमान छू रही है क्योंकि रूस और यूक्रेन दुनिया में गेहूं और सूरजमुखी के तेल के बड़े सप्लायर हैं और रूस दुनिया का सबसे बड़ा रसायनिक खाद उत्पादक है। ऊर्जा का संकट गहरा गया है और जलवायु परिवर्तन को रोकने की चर्चा बंद हो गईं है। यूरोप के देश पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले कोयले का इस्तेमाल बढ़ाते जा रहे हैं.

फिर पुतिन बार-बार धमकी दे रहे हैं कि अगर लड़ाई और तेज हुई तो वे परमाणु हथियारों का उपयोग करेंगे. परमाणु युद्ध का खतरा, जो शीत युद्ध की समाप्ति के बाद लगभग गायब हो गया था, एक बार फिर दुनिया पर मंडराने लगा है। ज़ैपोरिझझिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र के आसपास युद्ध ने चेर्नोबिल जैसे हादसे की आशंका स्थाई है।

हम एक बार फिर अतीत में चले गए हैं। दुनिया में एक अघोषित शीत युद्ध चल रहा है। दुनिया दो कैंपों में बंट गई है और कई देश, जिनमें भारत भी शामिल है, इंतजार कर रहे हैं कि ऊंट किस करवट बैठेगा। इस युद्ध के जल्द समाप्त होने की आशा जैसे-जैसे धूमिल पड़ती जा रही है, हमें यह समझ में आने लगा है कि दुनिया अब आपस में कितनी जुड़ी हुई है और यह भी कि हमें इस युद्ध की कितनी बड़ी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय कीमत चुकानी होगी।

सभी बेचैन और व्यग्र हैं और बेचैनी और व्यग्रता के इस दौर की समाप्ति की कोई आशा नज़र नहीं आती है। हमारा वर्तमान अनिश्चितताओं से भरा है। हमारे सपनों, एक बेहतर दुनिया बनाने की हमारी योजनाओं को ग्रहण लग गया है। मैं यूक्रेन के साहस और दृढ़ता को सलाम करती हूं। और दुनिया के प्रजातंत्र जिस तरह से उसके साथ खड़े हैं, उसकी सराहना करने से अपने आपको रोक नहीं सकती। परंतु अहंकार, दंभ, प्रतिशोध और नफरत से भरे इस दौर में जब प्रजातंत्र सिकुड़ रहे हैं, यह सोचकर भी आश्चर्य होता है कि एक समय था जब हमारा मन भविष्य के प्रति आशाओं से लबालब था। वह सपना टूटकर बिखर रहा है। ऐसा लगता है कि आशा सिर्फ एक मृगतृष्णा है औरप्रजातंत्र एक भ्रम है जबकि शांति एक स्वप्न है।

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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