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अखंड भारत अब चीन का उपनिवेश!

India china border dispute

यों न अब अखंड भारत है और न उपनिवेश केंद्रीत देशों की गुलामी का ओपनिवेशिक मॉडल है! साम्राज्य और वर्चस्व का इक्कीसवीं सदी का नुस्खा साहूकारी-लाठी तथा वैचारिक दबंगी है। आदर्श प्रमाण चीन है। अमेरिका के पारस पत्थर (पूंजीवाद) से वह दुनिया की फैक्ट्री बना। दुनिया को अपना बाजार बनाया। बेइंतहा कमाई करके देशों को कर्ज देने की साहूकारी की। उन्हे कर्जदार-पराश्रित-गुलाम बनाया। अपनी ताकत का लौहा बनवा कर दुनिया पर ऐसी दादागिरी बनाई कि भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री अनजाने में ही सही कह बैठे कि चीन से लड़ा नहीं जा सकता। अब लड़ाई का वक्त नहीं। हां,जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक मेंबिना रूस-चीन युद्ध का जिक्र किए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा वह चीन के प्रति भारत के मनोविज्ञान का भी संकेत है। मोदी ने कहां यह दौर युद्ध का नहीं है। आप सब गांधी और बुद्ध की धरती पर मिल रहे है तो शांति का संदेश ले कर जाए। याद करें कि इससे पहलेभारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने क्या कहा? उनके वाक्य थे- हमें यह समझना होगा कि वे (चीन) हमसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसका मतलब यह है, हमें ऐसे में क्या करना चाहिए? एकछोटी इकॉनोमी होते हुए… क्या हम आगे बढ़ कर अपने से बडी इकॉनोमी से लड़ाई कर लें?

सर्वप्रथम सोचे, ‘बड़ी इकॉनोमी’ पर। क्या इससे चीन की साहूकारी-लाठी की दबंगी से भारत का आक्रांत होना प्रमाणित नहीं है? फिर गौर करे ‘गांधी व बुद्ध की धरती’ के जुमले पर। क्या यह जी-20 बैठक में चीनी और बाकि विदेश मंत्रियों के आगे लाचार भारत का पाखंड दिखलाना नहीं था? एक तरफ परमाणु हथियार बना रखे है। आए दिन पाकिस्तान को छप्पन इंची छाती दिखाते है वही चीन के आगे तथा वैश्विक दायित्व में फलसफा झाडते है कि ‘गांधी व बुद्ध की धरती’! यदि ऐसा है तो चीन की सीमा पर हमने क्यों सेना तैनात की हुई है? जबकिपता है कि चीन ‘बड़ी इकॉनोमी’ है और वह इतना अमीर है कि दस साल तक सीमा पर लाखों सैनिक तैनात रखके भारत को थका देगा, भारत की छोटी इकोनॉमी को सूखा देगा तो उसके विदेश मंत्री को ‘गांधी व बुद्ध की धरती’ का पाठ पढ़ाना चाहिए या दो टूक कहना चाहिए था कि ‘ग्लोबल गर्वनेश’ चीन तथा रूस जैसे देशों की आक्रामकता के कारण खत्म है तथा इसे न भारत बरदास्त करेगा और न दुनिया। इसलिए रूस और चीन दोनों अपनी सेनाओं को पीछे हटाएं। यूक्रेन व भारत को आजादी के वक्त जो सीमा प्राप्त थी उसे रूस और चीन अक्षुण्ण माने अन्यथा वे ग्लोबल व्यवस्था के दुश्मन और अपराधी।

बहरहाल, मुद्दा है इक्कीसवीं सदी मेंअखंड भारत कैसे पराश्रित-भयाकुलऔरगुलाम है?जवाब के लिए समझना चाहिए कि अखंड भारत उर्फ सार्क के आठ देशों के लोग किन विदेशियों की आधुनिक गुलामी में जीवन जी रहे है? उपमहाद्वीप किस बाहरी शक्ति की दबिस में है। सीधा दो टूक जवाब है चीन और रूस की दादागिरी में। इन दोनों महाशक्तियों का पृथ्वी पर यदि कही सर्वाधिक कब्जा है तो वह दक्षिण एसिया है। इनका कब्जा है क्षेत्र के दो अरब लोगों पर। ये इनसे चाहे जैसे मुनाफा कमा रहे है। चाहे जैसे नचा रहे है। चीन जो कहेगा, रूस जो चाहेगा वही दक्षिण एसिया के देश संयुक्त राष्ट्र में करेंगे। वैश्विक मंचों में करेंगे। इन्ही के अनुसार इन देशों की रीति-नीति बनेगी। और ये चाहे जो मुनाफा कमाएं, चाहे जिन शर्तों और ब्याज दर पर कर्ज दें। चाहे जिस रेट पर हथियार बेचे, वह पाकिस्तान को मंजूर, श्रीलंका को मंजूर तो नेपाल, भारत, अफगानिस्तान, मालदीव कोभीमंजूर। ब्रितानी वक्त के अंखड भारत के म्यांमार को मैं इस विश्लेषण में शामिल नहीं कर रहा हूं अन्यथा उसके सैनिक शासक तो माओं की जैकेट भी पहने हुए!

सोपहले जरूरी है हाल-फिलहाल के चीन और रूस का यह सत्य जानना कि इन देशों ने अपने हित, अपनी सोच में विश्व व्यवस्था का जो मॉडल बनाया है उसकी बुनियाद विस्तारवादी-वर्चस्ववादी-राक्षशवादी है। अभी जो व्यवस्था है ये उसे खत्म करके अपनी नई दुनिया बना रहे है। इसके रोडमैप की पहली ठोस उपलब्धि पृथ्वी का भारत उपमहाद्वीप है। चीन ने तमाम तरह के साहूकारी हथक़डों से पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और अब चुपचाप अफगानिस्तान को गिरवी बना लिया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने‘बिल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ की गाजर में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव को बांधा है।  सडक, रेल, पावर प्रोजेक्ट, बंदरगाहों का अपना वह इंफ्रास्ट्रक्चरबना चुका है या बना रहा है जिसके चलते तमाम देश आर्थिक तौर पर कर्जदार रहेंगेतो सियासी तौर पर उसके बंघुआ।

तभी संयुक्त राष्ट्र की विश्व पंचायत में उपमहाद्वीप के देशों ने वही किया जो चीन ने चाहा। यूक्रेन पर रूसी हमले के विरोध के प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका ने चीन के साथ  अनुपस्थित रह कर रूस का बचाव किया। भारत भी इनके साथ खड़ा था। और इसकी वजह रूस है। भारत यूक्रेन पर हमले के पहले दिन से लेकर साल पूरे होने के दिन भी रूस की निंदा के प्रस्ताव में अनुपस्थित था तो इस मजबूरी में क्योंकि वह हथियार और व्यापार दोनों मामलों में रूस तथा चीन पर आश्रित है। जब रूस और चीन ने नई विश्व व्यवस्था बनाने के लिए अपनी चट्टानी दोस्ती घोषित कर दी तब भारतको चीन के साथ ही खडा होना था। यों भी ‘बडी इकॉनोमी’ और गली के बाहर के ताकतवरों से डरता है। ऊपर सेअखंड भारत का वह धुरी देश जिसके डीएनए से दक्षिण एसिया के देशों की बुनावट है।

मैं दक्षिण एसिया को अखंड भारत या चाहे तो आर्यावत का पर्याय इसलिए समझता हूं क्योंकि कुल मिलाकर हिंदू डीएनए में उपमहाद्वीपरचा-पका है। इससे पोर-पोर में गुलामी है, दिवालिया दिमाग है और राजेंद्रीयां लगभग नहीं के बराबर। भूल जाए कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल आदि में अलग-अलग धर्म-नस्ल है। मूलतः सब गुलामी, भीरूता के डीएनए से रचे-पके है। मुसलमान पाकिस्तान का हो या बांग्लादेश का, सभी भयाकुल-लाचार हिंदू के धर्मांतरित चेहरे है। तभी तो सभी देशों का75 वर्षों का एक सा सफर है। इस सत्य की गहराई में जाए कि भारत और पाकिस्तान दोनों ने परमाणु हथियार बना रखे है लेकिन दोनों चीन के आगे क्या हिम्मत लिए हुए है? दोनों की जमीन चीन ने खाई हुई है? सो क्या जाहिर हुआ? क्या यह नहीं कि अखंड भारत या आर्यावत के लोग आपस में लडेंगे, एटम बना कर एक-दूसरे को वैसे ही आंखे दिखाएंगे जैसे राजे-रजवाड़ों के वक्त था। मगर यह नहीं जानेंगे, देखेंगे और समझेंगे कि सीमा पार सुदूर में कोई (आज के संर्दभ में चीन, शीत युद्ध के दौरान अमेरिका व सोवियत संघ) घात लगाए बैठा है। उस नाते चमत्कारिक ढंग से इतिहास रीपिट है। पिछले पच्चीस सालों में चीन ने अपने धंधे के बूते कैसे आर्यावत पर ईस्टइंडिया कंपनी से असंख्य गुना अधिक दबदबा बनाडाला है। उपमहाद्वीप के जगत सेठ उसकी दलाली से अपने-अपने देश में उसका कारोबार वैसे ही फैलवाए हुए है जैसा कभी अंग्रेजों का बनवाया था।

क्या मैं गलत हूं? सोचे, दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वोतर एसिया, पश्चिम एसिया या पृथ्वी के और किसी कोने के क्षेत्रिय संगठनों के सदस्य देशों पर। क्या सभी ने अपनी किसी न किसी खास तासीर से अपनी पहचान नहीं बनाई है?चीन के दबदबे को ठेंगा बताते हुए आसियान देशों ने अपने को संगठित किया। राष्ट्रवादी टकरावों के बावजूद परस्पर ऐसा साझा बनाया कि इलाका अपने आप स्वयंभूआर्थिक शक्ति बनता हुआ है। चीन, रूस, अमेरिका को या तो टक्कर दे रहे है या तीनों से अपने हित साध रहे है। वह वैश्विक फैक्ट्री का नया इलाका बना है। ऐसे ही जापान का विकास रहा। खाडी देशों का हुआ। मगर दक्षिण एसिया और उसके देश क्या और कहां है? सभी चीन-रूस के मिशन की जमीन है। बाजार है। उसकी कूटनीति के हरकारे है। ये देश अपनी आर्थिकी, स्वतंत्रता-स्वालबंता को रूस-चीन के यहां गिरवी रखे हुए है और पता ही नहीं कि ऐसा हो गया!पूराअखंड भारत मानों रूस-चीन के अधीनस्थ।

इसमें एक-एक देश की अधीनता के आंकडे और दशा -दिशा का विश्लेषण आगे फिर कभी।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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