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विपक्ष पर कार्रवाई कही उलटी न पड़े!

यह बड़ा राजनीतिक सवाल है कि बिहार से लेकर महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से लेकर तेलंगाना तक केंद्रीय एजेंसियों ने जिस तरह से विपक्षी नेताओं पर शिकंजा कसना शुरू किया है और जिस रफ्तार से कार्रवाई शुरू की है उससे क्या भाजपा को राजनीतिक लाभ होगा या विपक्ष के प्रति आम लोगों के बीच सहानुभूति बनेगी? विपक्षी पार्टियों और अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का विपक्ष को फायदा होगा। उसके प्रति सहानुभूति होगी। यह भी कहा जा रहा है कि लोग केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से उब रहे हैं और उनको लग रहा है कि विपक्ष के ऊपर ज्यादती हो रही है। भाजपा के किसी भी नेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने या भाजपा में शामिल होने पर कार्रवाई रूक जाने की धारणा भी मजबूती से स्थापित हो रही है। भाजपा की छवि भ्रष्टाचार के दाग धो देने वाली वाशिंग मशीन वाली बन रही है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई की अति हो रही है। जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि लोकसभा चुनाव में अब सिर्फ चार सौ दिन बचे हैं और जब से विपक्षी पार्टियों ने अपने हित छोड़ कर एकजुटता बनाने की बात शुरू की है तब से केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई अचानक तेज हो गई है। बिहार में लालू प्रसाद के परिवार के खिलाफ जमीन के बदले नौकरी के मामले की जांच बंद हो गई थी। पिछले साल नीतीश कुमार के भाजपा से अलग होकर राजद के साथ सरकार बनाने के बाद जांच फिर शुरू हुई और सीबीआई ने छापा मारा। उसके बाद भी ऐसा लग रहा था कि एजेंसी के पास कोई खास सबूत नहीं हैं लेकिन अब अचानक सीबीआई और ईडी दोनों की कार्रवाई तेज हो गई है और लालू प्रसाद व राबड़ी देवी के अलावा उनके बेटे तेजस्वी यादव और चार बेटियों पर शिकंजा कस गया है। परिवार के किसी न किसी सदस्य की गिरफ्तारी की पूरी आशंका दिख रही है।

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नंबर दो नेता मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हो गए हैं। शराब घोटाले और दिल्ली में राजनीतिक लोगों व अधिकारियों की जासूसी के मामले में सीबीआई की जांच मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर भी बढ़ रही है। शराब के मामले में ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी कविता से ईडी ने नौ घंटे पूछताछ की है और फिर 16 मार्च को बुलाया है। आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस के दो सांसदों के परिजनों पर भी इस मामले में शिकंजा कसा है। ममता बनर्जी की पार्टी के एक कद्दावर नेता अणुब्रत मंडल को ईडी दिल्ली लेकर आई है तो एक दूसरे नेता शांतनु बनर्जी को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। शिव सेना के नेता सदानंद कदम को पिछले ही हफ्ते ईडी ने गिरफ्तार किया और कई अन्य नेताओं पर तलवार लटकी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का पूरा परिवार किसी न किसी मामले में केंद्रीय एजेंसियों को निशाने पर है। कर्नाटक में कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार और उनके सांसद भाई डीके सुरेश को लगातार पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है।

सो, यह नहीं माना जा सकता है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई रूटीन में हो रही है और राजनीति से इसका कोई लेना देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से राजनीति से जुड़ा मामला है। अभी तक ऐसा लग रहा है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से सत्तारूढ़ भाजपा का मकसद पूरा हो रहा है। उसके तीन मकसद बहुत स्पष्ट दिख रहे हैं। पहला, विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भ्रष्ट साबित करने का है। जितने विपक्षी नेता नेता भ्रष्ट और दागदार साबित होंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि उतनी चमकदार और बेदाग दिखाई देगी। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे जो नैरेटिव बनेगा वह आम आदमी की धारणा को कितना प्रभावित करेगा। दूसरा मकसद विपक्षी पार्टियों के धन का स्रोत बंद करना है। जितनी विपक्षी पार्टियों पर कार्रवाई हो रही है उनमें एक बात कॉमन है और वह ये है कि विपक्षी पार्टियों के अमीर नेताओं या उनसे जुड़े कारोबारियों पर भी कार्रवाई हो रही है। सबको पता है कि अब चुनाव लड़ना कितना खर्चीला काम हो गया है। भाजपा ने चुनाव को बहुत महंगा बना दिया है। अगर पैसे का स्रोत बंद होता है तो किसी भी पार्टी के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल होगा। तीसरा मकसद विपक्ष की चुनाव तैयारियों को पटरी से उतारने का है। सोचें, जिन पार्टियों के ऊपर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई होगी और बड़े नेता गिरफ्तार होंगे या जांच में उलझेंगे वे क्या चुनावी तैयारी करेंगी!

याद करें किस तरह से नवंबर 2016 के नोटबंदी के फैसले की एक व्याख्या यह हुई थी इससे एक झटके में सपा और बसपा का सारा पैसा बेकार हो गया। पता नहीं ऐसा हुआ था या नहीं लेकिन तीन महीने बाद ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हुआ और पहली बार भाजपा तीन सौ से ज्यादा सीट जीत कर सरकार में आई। उसके बाद से ही सपा और बसपा दोनों अपना आधार तलाशने में जुटे हैं। सो, इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई प्रादेशिक पार्टियों की चुनाव तैयारी को कमजोर कर रही है। उनका धन का स्रोत बंद हो रहा है। समर्थन करने वाले कारोबारी चिंता में हैं और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी कमजोर हो रहा है। जहां तक केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से प्रादेशिक पार्टियों के प्रति सहानुभूति का भाव पैदा होने का सवाल है तो वह पार्टी नेताओं का अपने दिल को सांत्वना देने का मामला भर है।

भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तारी से सहानुभूति नहीं पैदा होती है। यह जरूर होता है कि जिस नेता के खिलाफ कार्रवाई होती है उसका कोर वोट बैंक या उसका सामाजिक आधार उससे मजबूती से जुड़ जाता है। लेकिन ऐसा नहीं होता है कि अब तक उसका विरोध करने वाला सामाजिक समूह इसलिए उसके साथ जुड़ जाएगा क्योंकि उसके ऊपर कथित तौर पर ज्यादती हो रही है।

मिसाल के तौर पर बिहार में लालू प्रसाद के परिवार के साथ यादव वोट अब पूरी तरह से एकजुट हो जाएगा। भाजपा को जो भी थोड़ा बहुत वोट मिलता था हो सकता है वह नहीं मिले लेकिन लालू प्रसाद के परिवार के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से पिघल कर दूसरी जातियां, जो अब तक उनका विरोध करती थीं उनके साथ आ जाएंगी, ऐसा सोचना गलत होगा। चुनाव का फैसला तो इसी आधार पर होगा कि किस पार्टी का सामाजिक आधार कितना बड़ा है और उसको चुनाव लड़ाने वाली मशीनरी कैसी है। जाहिर है केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से विपक्ष की मशीनरी तो बिगड़ रही है। जहां तक सामाजिक आधार का सवाल है तो उसे भी भाजपा ने 80 और 20 फीसदी के दायरे में ऐसा बांधा है कि ज्यादातर विपक्षी पार्टियों के लिए इस दायरे को तोड़ना मुश्किल है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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