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बेबाक विचार

रूस की विजय दिवस परेडः सब कुछ फीका और बेजान!

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नौ मई की रुसी विजय दिवस की परेड इस साल फीकी, बेजान थी।हालातों को बूझ मैंने पिछले हफ्ते लिखा भी था कि इस बार परेड निराशा और खालीपन की चादर ओढ़े हुए होगी। और वही हुआ। पारंपरिक रूप से विजय दिवस रूसी जनता के लिए एक भव्य समारोह होता था। दुनिया रूस की सैन्य शक्ति के प्रदर्शन को देख विचार करती थी। इस बार ऐसा कुछ नहीं था।केवल एक टैंक परेड में शामिल हुआ – द्वितीय विश्वयुद्ध का वही टी-34 टैंक जो हमेशा से सैनिक साजो-सामान की नुमाइश की शुरुआत करता है। सेना की ताकत का प्रतिनिधित्व केवल यही एक टैंक कर रहा था। और कोई टैंक परेड में शामिल नहीं हुआ। वे आधुनिक टैंक जो रूसी सेना की शान हैं, परेड से गायब थे। जो एकमात्र बड़ा हथियार प्रदर्शित किया गया वह था आरएस-24 यार्स न्यूक्लियर मिसाइल लांचर।

उत्सव की तैयारी के दौरान रूसी रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगू ने कहा था कि परेड में 125 सैनिक वाहन और 10,000 सैनिक भाग लेंगे। परन्तु परेड में केवल 8,000 सैनिकों ने मार्च किया। मास्को के लाल चौक पर केवल 51 सैनिक वाहन उतारे गए। यह 2008 के बाद से सबसे कम और पिछले साल से आधे थे। फ्लाईपास्ट लगातार दूसरे साल रद्द रहा।

प्रसन्नता, गर्व, उत्सव और राष्ट्रवादी धूमधाम के इस दिन देश उदास था। दूसरी बड़ी लड़ाई में सोवियत संघ की जीत का उत्सव पहले से कहीं छोटे पैमाने पर मनाया गया। नौ मई को रूस में छुट्टी रहती है। जाहिर है कि लोग मौजमस्ती करते हैं। परन्तु इस बार वातावरण में डर और आशंका थी। लाल चौक पर व्लादिमीर पुतिन का भाषण केवल 10 मिनट चला। उनकी चाल-ढाल में जोश नहीं था। उनके चेहरे से तनाव और कमजोरी टपक रही थी। उनके भाषण के बीच में तालियाँ नहीं गूंजी। पुतिन ने इस बार भी वही कहा जो पिछली बार कहा था – यह कि यूक्रेन की लड़ाई, संशकित और भय से ग्रस्त पश्चिम के खिलाफ अस्तित्व के लड़ाई है।

पुतिन ने कहा, “आज सभ्यता फिर से एक निर्णायक मोड़ पर है। हमारे खिलाफ एक युद्ध, एक असली युद्ध, छेड़ दिया गया है।” उन्होंने अपने घिसेपिटे से भाषण में यूक्रेन की ‘गुनाहगार हुकूमत’ से युद्ध की तुलना नाज़ी जर्मनी के खिलाफ 1945 की लड़ाई से की। उन्होंने अपनी अन्य पुरानी शिकायतें भी दोहराईं। ‘पश्चिमी वैश्विक्तावादी कुलीन वर्ग’ पर ‘परिवार’ और ‘पारंपरिक मूल्यों’ का नाश करने का आरोप एक बार फिर लगाया।

कुल मिलकर वही पुराने झूठ और यूक्रेन और पश्चिम पर वही पुराने आरोप। एक अच्छी बात यह रही कि पश्चिम के उसे दुनिया से अलग-थलग कर देने के प्रयासों के बावज़ूद, परेड में विदेशी मेहमान मौजूद थे। पांच मध्य एशियाई देशों के राष्ट्र प्रमुख पुतिन के बगल में बैठे थे। वे जानते हैं कि क्रेमलिन से दोस्ती बनाये रखना उनकी सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। परन्तु दुनिया में उसकी पूछपरख बनी रहने के इस प्रमाण के अलावा, रूस अपनी जनता को ऐसा कुछ नहीं दे सका जिसका जश्न मनाया जा सके।

पिछले करीब 80 सालों से मास्को में होने वाले सालाना विजय दिवस परेड में न केवल उन 2.70 करोड़ रूसी नागरिकों को याद किया जाता है जो द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ी जर्मनी के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए बल्कि देश की सैनिक ताकत का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस साल युद्ध के मैदान में रूसी सेनाओं के बुरे हाल रहे। शायद इसी कारण देश के अन्य हिस्सों में विजय दिवस समारोह या तो रद्द कर दिए गए या छोटे पैमाने पर हुए। पुतिन का रूस एक हारा, एक थका हुआ देश लग रहा था। मध्य एशिया के नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पश्चिम ने रूस के विजय दिवस को कोई तवज्जो नहीं दी। पुतिन अकेले और उपेक्षित नज़र आ रहे थे। यूक्रेन के बखमुत शहर, जिसे उसकी सेनाओं ने घेर रखा है, पर रूस ने हाल में जम कर गोलाबारी की थी ताकि विजय दिवस के पहले कम से कम एक जीत तो हासिल हो सके पर यह भी नहीं हो सका क्योंकि कीव ने पलटवार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

इस बीच, यूक्रेन ने पश्चिमी यूरोप के तर्ज पर 8 मई को विजय दिवस मनाया। और जिस दिन मास्को में विजय दिवस परेड हुई, उसी दिन ज़ेलेंस्की ने एक महत्वपूर्ण मेहमान की कीव में अगवानी की। वे थीं यूरोपियन कमीशन की मुखिया उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जो यह सन्देश ले कर आयीं थी कि यूक्रेन को यूरोप का समर्थन जारी रहेगा।

बाइडन प्रशासन ने यूक्रेन के लिए 1.2 अरब डॉलर के एक और सहायता पैकेज का ऐलान किया जिसमें असलाह और उपकरण शामिल हैं। उर्सुला वॉन ने शायद 9 मई का दिन अपनी यात्रा के लिए इसलिए चुना ताकि दुनिया को यह सन्देश दिया जा सके कि यूक्रेन और यूरोप नज़दीक आ रहे हैं। जिस तरह यूरोप में 8 मई को नाज़ी सेनाओं के हथियार डालने की वर्षगाठं के रूप में और 9 मई को यूरोप डे के रूप में मनाया जाता है, वैसा ही यूक्रेन भी कर रहा है। जर्मनी के चांसलर ओलाफ सोल्स ने कहा कि यूरोप को एकमत होकर और सैन्य दृष्टि से मज़बूत होकर यूक्रेन को युद्ध लड़ने में मदद करनी चाहिए।

पुतिन लम्बे समय से बहुत जोरशोर से, खूब उत्साह से विजय दिवस मनाते रहे हैं। परन्तु इस बार ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने अकारण एक युद्ध शुरू किया है ताकि वे एक और विजय दिवस अपनी विरासत के रूप में देश को सौंप सकें। परन्तु युद्ध की जो दशा और दिशा है और जिस तरह रूस के पाँव उखड़ रहे हैं, उसके चलते रूस यदि किसी चीज़ का जश्न मना सकता है तो वह केवल बर्बादी है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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