nayaindia बिहार की सामाजिक दुर्दशा: आंकड़ों की जाँच
अजीत द्विवेदी

उफ! बिहार की दुर्दशा, सभी जिम्मेवार

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बिहार सरकार ने सात नवंबर को विधानमंडल में बिहार की दुर्दशा के दस्तावेज पेश किए। इससे पहले दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर बिहार सरकार ने जाति गणना के आंकड़े जारी किए थे, जिससे पता चला था कि बिहार में 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है, अनुसूचित जाति की आबादी 20 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी एक फीसदी है, जबकि सवर्ण आबादी सिर्फ साढ़े 15 फीसदी है।

इसके बाद सात नवंबर को बिहार सरकार ने इन जातियों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के आंकड़े पेश किए, जिससे इन सबकी सामूहिक दुर्दशा का पता चला। भारत सरकार का नीति आयोग बिहार में पिछड़ेपन और गरीबी के जो आंकड़े पिछले अनेक साले से पेश करता आ रहा है उन सबकी पुष्टि बिहार में हुए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों से हो गई है। बिहार हर पैमाने पर देश का सबसे गरीब, पिछड़ा और अनपढ़ राज्य है, यह तथ्य स्थापित हुआ है।

बिहार के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण से पता चला है कि बिहार के 34 फीसदी परिवार की हर स्रोत से सामूहिक आय छह हजार रुपए महीने से कम है। इसका मतलब है कि अगर एक परिवार में पांच व्यक्ति हैं तो प्रति व्यक्ति मासिक आय 12 सौ रुपए यानी 40 रुपए रोज है। इसके बाद जो दूसरी श्रेणी है, जिनकी आय छह से 10 हजार के बीच है उनकी संख्या 29 फीसदी से कुछ ज्यादा है।

इस श्रेणी के परिवारों की प्रति व्यक्ति आय दो हजार रुपए महीना यानी प्रतिदिन 70 रुपए से कम है। सोचें, बिहार के तीन में से दो व्यक्ति 70 रुपए रोज से कम आय वाले हैं! जिस बिहार के बारे में यह धारणा बनी है या बनाई गई है कि वहां से बड़ी संख्या में आईएएस-आईपीएस बनते हैं या आईआईटी-आईआईएम में जाते हैं वहां सिर्फ सात फीसदी लोग ग्रेजुएट हैं और महज एक फीसदी लोगों ने पोस्ट ग्रेजुएट तक पढ़ाई की है।

कुल 13 करोड़ की आबादी वाले बिहार में सिर्फ पांच फीसदी लोग नौकरी करते हैं। इसमें सरकारी नौकरी करने वाले शामिल हैं तो साथ ही संगठित और असंगठित निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाले भी हैं। बिहार को लेकर यह भी एक मिथक है कि यह कृषि प्रधान प्रदेश है लेकिन सरकार द्वारा पेश किए गए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण से पता चला है कि सिर्फ सात फीसदी लोग कृषि कार्य करते हैं और चार फीसदी से कुछ कम लोग स्वरोजगार करते हैं। सबसे ज्यादा 17 फीसदी लोग मजदूरी करते हैं।

सरकार ने इसमें 67 फीसदी की एक श्रेणी अलग बनाई है, जिनको गृहिणी और विद्यार्थियों की श्रेणी कहा गया है। इसका मतलब है कि इतने लोग कोई काम नहीं करते हैं। सोचें, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के महिला सशक्तिकरण के दावों के बारे में! महिलाओं के लिए कितना कुछ करने के दावे किए जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि आधी आबादी का बड़ा हिस्सा गृहिणी है, जिसका मतलब यह है कि आय अर्जित करने वाला कोई काम उनके पास नहीं है। सवाल है कि जब आधी आबादी के पास कोई काम नहीं होगा तो कोई भी राज्य या देश कैसे प्रगति कर सकता है?

बिहार की यह बदहाली सभी जातियों की सामूहिक बदहाली है। ऐसा नहीं है कि अगड़ी जातियां इस बदहाली से बाहर हैं। बिहार में हिंदू सवर्णों की चार और मुस्लिम सवर्णों की तीन जातियां हैं। इन सात जातियों में सबसे ज्यादा गरीब भूमिहार हैं। सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 28 फीसदी भूमिहार परिवारों की मासिक आय छह हजार रुपए से कम है। इसके बाद राजपूत, ब्राह्मण, शेख, सैयद और पठान आते हैं।

सवर्णों में सबसे बेहतर स्थिति कायस्थों की है। कुल मिला कर 25 फीसदी सवर्ण परिवार छह हजार रुपए की मासिक आय वाली श्रेणी में हैं, जबकि 34 फीसदी पिछड़ी आबादी इस श्रेणी में आती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति सबसे खराब है, जिनमें 42 फीसदी से ज्यादा परिवार छह हजार रुपए आय वाली श्रेणी में है। ज्यादातर लोग कच्चे या खपरैल के मकानों में रहते हैं और महज पांच फीसदी आबादी के पास ही किसी तरह का मोटराइज्ड वाहन है।

बिहार और उसके 13 करोड़ लोगों की बदहाली का यह आंकड़ा पेश करने के बाद बिहार सरकार ने जो कथित मास्टरस्ट्रोक चला है वह आरक्षण की सीमा बढ़ाने का है। सोचें, जो काम आरक्षण की 60 फीसदी की सीमा में नहीं हुआ क्या वह 75 फीसदी कर देने से हो जाएगा? जाहिर है यह वोट लेने के लिए लोगों को मूर्ख बनाने का एक दांव है। सो, अब बड़ा सवाल है कि बिहार की इस बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है? इस सवाल का जवाब बहुत मुश्किल नहीं है। बिहार की इस दुर्दशा में सभी पार्टियां समान रूप से शामिल हैं।

बिहार में पिछले 33 साल से या तो लालू प्रसाद की पार्टी राजद का मुख्यमंत्री रहा या नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का मुख्यमंत्री रहा। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे तो तेजस्वी यादव दो बार में तीन साल उप मुख्यमंत्री रहे हैं। नीतीश कुमार 17 साल मुख्यमंत्री रह चुके। एक साल से कुछ कम समय के लिए उन्होंने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। नीतीश के साथ करीब 13 साल तक भाजपा भी सरकार में रही और पहले सुशील मोदी फिर बाद में तारकिशोर प्रसाद व रेणु देवी उप मुख्यमंत्री रहे। अलग अलग समय में कांग्रेस भी आठ साल तक राजद और जदयू के साथ सरकार में रही है। सो, दोनों बड़ी प्रादेशिक पार्टियां और दोनों राष्ट्रीय पार्टियां लगभग समान रूप से बिहार की इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं।

यह बिहार का दुर्भाग्य है, जो किसी भी सरकार या मुख्यमंत्री ने विकास की दृष्टि नहीं दिखाई। सबने उतना ही काम किया, जितना सरकारी फंड खर्च करने के लिए जरूरी था। बिहार के दोनों नेताओं, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का रोना रहा है कि बिहार लैंड लॉक्ड स्टेट है यानी समुद्र और बंदरगाह नहीं है और झारखंड अलग होने के बाद कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं है। इस कमी के बावजूद औद्योगिक विकास हो सकता था और रोजगार का सृजन संभव था। आईटी और आईटी आधारित सेवाओं का कारोबार जब फला-फूला तब बिहार में उस दिशा में काम हो सकता था। आज दुनिया भर के कपड़े बांग्लादेश में सिल रहे हैं क्या वह काम बिहार में नहीं हो सकता था?

बिहार एक समय छोटे और बड़े उद्योगों का केंद्र रहा था। बरौनी रिफाइनरी से लेकर सिंदरी के खाद कारखाने और बोकारो से लेकर जमशेदपुर तक स्टील की फैक्टरियां चलती थीं। हर जिले में एक या उससे ज्यादा चीनी मिल था। इनमें कोई नई चीज जोड़ना तो छोड़ दिए इन्हें भी चलाए रखना मुश्किल हो गया। इसके लिए जिस दृष्टि की जरूरत थी वह किसी नेता के पास नहीं है या उसने उसका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं समझी।

इसका बड़ा कारण यह था कि नेताओं को बड़ी आसानी से जाति के नाम पर वोट मिलते रहे इसलिए काम करके, लोगों की आकांक्षाएं पूरी करके वोट लेने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। इस लिहाज से बिहार के करोड़ों लोग भी अपनी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है क्योंकि उनके लिए वोट देने का एकमात्र आधार जाति और धर्म रहा। तभी उन्होंने कभी अपने हुक्मरानों से जरूरी सवाल नहीं पूछे। हकीकत यह है कि पिछले साढ़े तीन दशक में अनपढ़ बनाए रख कर बिहार को देश और दुनिया के लिए मजदूर सप्लाई करने वाली फैक्टरी में बदल दिया गया और किसी ने आवाज नहीं उठाई। किसी ने यह नहीं पूछा कि शिक्षा और स्वास्थ्य की सुचारू रूप से चलने वाली व्यवस्था कैसे पूरी तरह से चौपट हो गई?

क्यों बच्चों की पढ़ाई और रोजगार के लिए लोगों को पलायन करना पड़ा? सवाल नहीं पूछने और जाति-धर्म की वजह से पार्टियां का बंधुआ रह कर बिहार के लोगों ने अपनी आंखों से इस गौरवशाली सभ्यता वाले प्रदेश को बरबाद होते हुए देखा है। सब इस पाप के समान रूप से भागी हैं।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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