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अराजनीतिक सलाहकारों,यू ट्यूबर्स आंकडेबाजों से डूब रही हैं कांग्रेस

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उत्तर भारत में कांग्रेस क्यों कर डूबी- 2 : कांग्रेस मिजोरम का भी विधानसभा चुनाव हार गई। और बहुत बुरी तरह से। लेकिन यू ट्यूब पर आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले पुराने सैफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव मिजोरम में कांग्रेस को बड़ी ताकत के तौर पर उभरता हुआ बता रहे थे। दावा कर रहे थे कि कांग्रेस के बिना वहां कोई सरकार नहीं बनेगी। मगर कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली जबकि पहली बार चुनाव लड़ी जोरम पीपुल्स मूवमेंट ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। सोचें, कांग्रेस की आंधी बताई गई तो उसकी सीट पांच से घट कर एक हो गई। इसी तरह कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, और राजस्थान में चुनाव हारी है। कांग्रेस के सारे नेता हैरान-परेशान घूम रहे हैं। उनको समझ में नहीं आ रहा है, जब सारे लोग कह रहे थे कि कांग्रेस इन राज्यों में जीतेगी तो कैसे हार गई?

हारने की इस रियलिटी के बीच तमाम आंकड़ेबाज नेता, सोशल मीडिया के इन्फ्लूएन्सर्स और यू ट्यूबर्स नए आंकड़ों के साथ हल्ला करते हुए हैं। कांग्रेस के गुरदीप सप्पल और सुप्रिया श्रीनेत के साथ साथ योगेंद्र यादव भी आंकड़ों के हवाले कथित सचाई बता रहे हैं। योगेंद्र यादव ने नतीजों के बाद एक वीडियो यू ट्यूब पर डाला ‘हैट्रिक का मिथक और आंकड़ों का सच’। इस आंकड़ाई हवाबाजी से लोगों को समझा रहे है कि मिजोरम को छोड़ कर चार राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट मिले हैं।

निश्चित ही आंकड़ों की सत्यता पर सवाल नहीं है। सही है कि चार राज्यों में भाजपा को चार करोड़ 81 लाख वोट मिले हैं तो कांग्रेस को चार करोड़ 90 लाख वोट मिले हैं। लेकिन असल में यह कांग्रेस नेतृत्व को बरगलाने का प्रयास है, जो हर बार होता है और इस वजह से कोई बड़ा बदलाव नहीं हो पाता है। सोचें, पिछले विधानसभा चुनाव में यानी 2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस जीती थी और सरकार बनाई थी तब भाजपा को कांग्रेस से 0.13 फीसदी वोट ज्यादा मिले थे। यानी ज्यादा वोट लेकर भी भाजपा हारी थी। लेकिन तब भाजपा के किसी नेता या उसके लिए काम करने वाले आंकड़ेबाजों ने इस आधार पर हार को जीत नहीं बताया था।

क्या इन आंकड़ेबाजों को पता नहीं है कि वोट प्रतिशत या वोटों की संख्या एक तकनीकी मामला है और जीत-हार का गणित उससे अलग भी हो सकता है? यह बिल्कुल उसी तरह की बात है, जैसे कोई नदी की औसत गहराई निकाल कर नदी पार करने की कोशिश करे। कांग्रेस के नेता और उसके समर्थक आंकड़ेबाज, यू ट्यूबर्स जो आंकड़े बता रहे हैं उसमें 60 लाख वोट का अंतर सिर्फ तेलंगाना से है। वहां भाजपा को 32 लाख के करीब वोट मिल हैं, जबकि कांग्रेस को 92 लाख के करीब वोट हैं। कांग्रेस इस वोट को बाकी तीन राज्यों के साथ जोड़ कर यह साबित करने में लगी है कि वह हारी नहीं है। अगर तेलंगाना को हटा दें तो हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में भाजपा को कांग्रेस से 50 लाख वोट ज्यादा मिले हैं।

इसी उत्तर भारत में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भाजपा का असली मुकाबला करना है। लेकिन कांग्रेस के नेता आंख बंद करके समझ रहे हैं कि सामने खतरा नहीं है। और सचमुम पिछले कई सालों से कांग्रेस इसी एप्रोच में राजनीति कर रही है। उसे हकीकत दिखाई नहीं दे रही है या गैर-सरकारी संगठनों वाले झोलाछाप बुद्धिजीवी, वामपंथी विचारक, यू ट्यूबर्स और सोशल मीडिया के इन्फ्लूएन्सर्स उसे हकीकत नहीं देखने दे रहे हैं।

कांग्रेस को भाजपा से उत्तर भारत में लड़ना है, जहां वह बुरी तरह से हारी है। तीन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच दो से लेकर आठ फीसदी तक वोट का अंतर है। लेकिन कांग्रेस के आंकड़ेबाज या आलाकमान के आसपास चक्कर काटने वाले परजीवी किस्म के नेता चार राज्यों का औसत निकाल कर बता रहे हैं कि कांग्रेस को कितना वोट मिल गया। दिग्विजय सिंह जैसे समझदार नेता पोस्टल बैलेट में कांग्रेस को ज्यादा वोट मिलने की बात करके इशारा कर रहे हैं कि ईवीएम में गड़बड़ी है। हकीकत यह है कि पोस्टल बैलेट में सरकारी कर्मचारियों के वोट हैं, जिन्होंने पुरानी पेंशन योजना की कांग्रेस की घोषणा से प्रभावित होकर वोट दिया। इसके बावजूद अगर ईवीएम पर सवाल उठाना है तो वह अलग राजनीति है लेकिन अभी इसका समय नहीं है।

जाहिर है कांग्रेस के अराजनीतिक सलाहकारों और आंकड़ेबाजों की वजह से कांग्रेस लगातार हारती जा रही है, वह डूब रही है। दरअसल, कांग्रेस के लिए राजनीति अब उसके नेता नहीं कर रहे हैं, बल्कि मैनेजर कर रहे हैं। उसके लिए नीतियां पार्टी के जमीनी नेता नहीं, बल्कि गैर-सरकारी संगठनों के अराजनीतिक लोग बना रहे हैं। कभी सैम पित्रोदा नीति बनाते हैं, तो कभी के राजू के हवाले नीति बनाने का काम होता है तो कभी योगेंद्र यादव नीति बनाने आ जाते हैं। जेएनयू ब्रिगेड अलग राहुल गांधी को ज्ञान देती रहती है, जिसमें कभी सीताराम येचुरी ‘बॉस’ बन कर राजनीति समझाते हैं तो कभी कन्हैया कुमार की क्रांतिकारिता चलती है। कभी सनातन का विरोध है तो कभी जाति गणना और ‘जितनी आबादी उतना हक’ का नारा है तो कभी मोहब्बत की दुकान है, पहले ‘चौकीदार चोर है’ का नारा था।

इस तरह की सलाह देने वाले अच्छी अंग्रेजी में या भारी भरकम वैचारिक शब्दावली में पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन देकर योजना बनाते हैं और घुट्टी देते है किइस पर पूरी पार्टी को अमल करना होता, जबकि वास्तविकता इनके पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से बिल्कुल अलग होती है।

ठीक बात है कि भाजपा से कांग्रेस को विचारधारा की लड़ाई लड़नी है लेकिन वह लड़ाई क्या सोशल मीडिया स्पेस में लड़ी जाएगी, भाषणों, व्याख्यानों से लड़ी जाएगी या जमीन पर लड़ी जाएगी? कांग्रेस के नेता इस भ्रम में रहते हैं कि सोशल मीडिया ने नैरटिव सेट कर दिया है। लोग उसे पसंद कर रहे हैं और इसलिए अब चुनाव जीत जाएंगे। हैरानी की बात है कि वैचारिक लड़ाई भी कांग्रेस के लिए यू ट्यूबर्स लड़ रहे हैं। अपने एजेंडे के तहत चैनल वाले गांधी-सावरकर की बहस कराते हैं, नेहरू पर हमला करते हैं और यू ट्यूब में सब्सक्राइबर बढ़वाने में लगे कथित इतिहासकार वहां कांग्रेस का पक्ष रखते हैं। बाद में कांग्रेस के नेता उनके वीडियो वायरल करने की जिम्मेदारी निभाते हैं।

राजनीतिक लड़ाई हो, चुनावी लड़ाई हो या विचारधारा की लड़ाई हो कांग्रेस उसे जमीन पर नहीं लड़ रही है। वह हवा में लड़ रही है। सोशल मीडिया में पोस्ट और यू ट्यूब वीडियो के लाइक व व्यूज गिन कर अपनी लड़ाई जीत रही है। ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यू ट्यूब पर व्यूज व लाइक से कांग्रेस यह बता रही है कि राहुल गांधी अब नरेंद्र मोदी से ज्यादा लोकप्रिय हो गए। सोशल मीडिया से नैरेटिव बनाने का मुगालता कांग्रेस ने पाला है। इन्फ्लूएन्सर्स बता रहे हैं कि सोशल मीडिया में अब राहुल की पोस्ट को नरेंद्र मोदी से ज्यादा लोग देख रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों कहा कि संसद के पिछले सत्र में विश्वास मत पर हुई बहस में राहुल के भाषण को नरेंद्र मोदी के जवाब के मुकाबले ज्यादा लोगों ने देखा।

कांग्रेस उस पर ऐसे उछलने लगी, जैसे राहुल ने मोदी को हरा दिया हो। इसी तरह विश्व कप क्रिकेट का फाइनल मैच हारने के बाद मोदी के लिए सोशल मीडिया में पनौती ट्रेंड हुआ तो राहुल गांधी ने अपने भाषण में मोदी को पनौती बता दिया। क्या सोशल मीडिया का ट्रेंड देख कर भाषण का कंटेंट तय होगा? हर महीने एक आंकड़ा आता है, जिसमें बताया जाता है कि डिजिटल कंटेंट में 30 सबसे लोकप्रिय लोगों में 25 से ज्यादा ऐसे हैं, जो नरेंद्र मोदी और भाजपा के विरोधी हैं। डीबी लाइव से शुरू करके सत्य हिंदी तक और पुण्य प्रसून वाजपेयी से लेकर आशुतोष, अभिसार शर्मा से लेकर आरफा खानम शेरवानी तक के कंटेंट काफी देखे जाते हैं। इसमें यह भी बताया जाता है कि भाजपा और मोदी समर्थकों में सिर्फ दो-चार ही लोग लोकप्रिय हैं।

ये मूर्खता भरे आभासी दुनिया के आंकड़े हैं, जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक नाता नहीं होता है। कांग्रेस के नेताओं को यह समझ में ही नहीं आता है कि यू ट्यूब का अल्गोरिद्म कैसे काम करता है और वहां किस तरह से चैनल के सब्सक्राइबर और फॉलोवर बनते हैं। यू ट्यूबर्स या सोशल मीडिया इन्फ्लूएन्सर्स एक वैचारिक लाइन पकड़ते हैं और उस पर बढ़-चढ़ कर दावे करते हैं, जिससे उनकी फॉलोवर्स की संख्या बढ़ती जाती है। जैसे जिन लोगों ने मोदी विरोध की लाइन पकड़ी है वे बहुत लोकप्रिय इसलिए हैं कि क्योंकि मोदी विरोधी लोग, जिसमें बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी पार्टियों के समर्थकों और मुस्लिम समुदाय के लोगों का है, उनके वीडियो देखते हैं और उसे पसंद करते हैं।

सारे यू ट्यूबर्स उनको खुश रखने के लिए बढ़ चढ़ कर मोदी विरोध करते हैं। हर चुनाव में भाजपा को हारते और कांग्रेस को जीतते दिखाते हैं। वे अपनी चुनी इस लाइन से नहीं हट सकते हैं क्योंकि जैसे ही वे वस्तुनिष्ठ होंगे उनको लोग अनसब्सक्राइब करने लगेंगे। वे अपने सब्सक्राइबर के बंधक हो जाते हैं। तभी हर बार गलत साबित होने के बाद भी किसी न किसी आंकड़े से उसको जस्टिफाई करते हैं।

इस तरह से यू ट्यूबर्स गुजरात में भी कांग्रेस को जीता रहे थे और पांच राज्यों के चुनाव में भी कांग्रेस की जीत का दावा कर रहे थे। योगेंद्र यादव ने पांचों राज्यों में कांग्रेस की जीत का गणित समझाया था, जिससे कांग्रेस में ऐसी हवा भरी थी कि कई राज्यों में नतीजों से पहले नेताओं ने होर्डिंग और पोस्टर बनवा लिए थे। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने नतीजों से दो दिन पहले एक वीडियो यू ट्यूब पर डाला था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि ‘आएगा तो मोदी ही कहने वालों तक का भ्रम टूटने लगा है’। नतीजों से एक दिन पहले वीडियो बनाया, ‘इंतजार कीजिए…कल का जनादेश बदल देगा देश के हालात’! इन दोनों वीडियो को यू ट्यूब पर करीब 10-10 लाख व्यूज मिले।

उनका काम व्यूज बटोरना है लेकिन कांग्रेस नेता इस भ्रम में थे कि सचमुच चुनाव जीत रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सोशल मीडिया के सहारे ही चुनावी लड़ाई लड़ने से कांग्रेस का नुकसान हुआ है लेकिन उसके अलावा कांग्रेस के पास मजबूत संगठन नहीं है, वैचारिक एकरूपता नहीं है, राजनीतिक अभियानों में निरंतरता की कमी है, आपसी तालमेल कमजोर है और जमीनी स्तर पर लड़ने की मशीनरी नहीं है। इन मुद्दों पर कल चर्चा करेंगे। (जारी)

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