nayaindia राजनीतिक पार्टियों का जातीय और क्षेत्रीय संतुलन: खड़गे की रणनीति
अजीत द्विवेदी

कुल मिलाकर खड़गे की टीम अच्छी

Share
संतुलन

भारत में हर राजनीतिक पार्टी को संगठन या सरकार बनाते समय सबसे ज्यादा जिस बात का ध्यान रखना होता है वह जातीय व क्षेत्रीय संतुलन का होता है। इसमें कोई भी पार्टी अपवाद नहीं है। विचारधारा की बात करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां हों या नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर जीत रही भाजपा हो, सबको जातीय, क्षेत्रीय, सामुदायिक और लैंगिक संतुलन का ध्यान रखना पड़ता है। तभी हाशिए में डाल दिए गए बीएस येदियुरप्पा को राजनीतिक मजबूरी में भाजपा को संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाना पड़ा। अल्पसंख्यक कोटा पूरा करने के लिए पंजाब के सिख नेता इकबाल सिंह लालपुरा को लाना पड़ा और महिला व पिछड़ी जाति के लिए हरियाणा की सुधा यादव को बोर्ड में रखा गया।

भाजपा की टीम की मिसाल देकर शुरुआत करने का मकसद यह बताना है कि कांग्रेस कोई अपवाद नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी राजनीतिक व चुनावी जरुरत के हिसाब से अपनी कार्य समिति में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाने का प्रयास किया है। एक तरफ खड़गे को पार्टी के तमाम पुराने नेताओं को सीडब्लुसी का सदस्य बना कर उनको सम्मान देना था तो उदयपुर संकल्प के मुताबिक युवाओं व दलित, पिछड़ों, वंचितों, अल्पसंख्यक को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना था। इन दोनों के साथ चुनावी व राजनीतिक जरूरतों का भी ध्यान रखना था। इसी मजबूरी में खड़गे को मुख्य कार्य समिति में 39 सदस्य बनाने पड़े और सीडब्लुसी के सदस्यों की कुल संख्या 84 पहुंच गई।

खड़गे ने किस तरह से राजनीतिक व चुनावी संतुलन बनाया है उस पर बात करने से पहले दो बातों पर ध्यान देना जरूरी है। पहली बात तो यह है कि कांग्रेस ने कार्य समिति के सदस्यों के चुनाव का फैसला क्यों टाला और कब यह तय हुआ कि सभी सदस्य अध्यक्ष द्वारा मनोनीत होंगे? ध्यान रहे राहुल गांधी चाहते थे कि कार्य समिति का चुनाव हो। गौरतलब है कि पारंपरिक रूप से कार्य समिति के 23 सदस्य होते थे, जिनमें आधे सदस्यों का चुनाव होता था। अगर चुनाव नहीं कराना है तो अध्यक्ष को सभी सदस्यों को मनोनीत करने के लिए अधिकृत किया जाता था। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि चुनाव क्यों नहीं हुआ और कब व किसने अध्यक्ष को अधिकृत किया कि वे सभी सदस्यों को मनोनीत करें?

कायदे से स्टीयरिंग कमेटी की बैठक होनी चाहिए थी, जिसमें खड़गे को अधिकृत किया जाता। दूसरी बात यह है कि जब पिछले साल उदयपुर के नवसंकल्प शिविर में तय हुआ था कि कार्य समिति में और पार्टी के पदाधिकारियों में भी आधे सदस्य 50 साल से कम उम्र के रखे जाएंगे तो कार्य समिति के गठन के मामले में उस सिद्धांत का पालन क्यों नहीं किया गया? मुख्य कार्य समिति के 39 सदस्यों में से सिर्फ तीन ही ऐसे हैं, जिनकी उम्र 50 साल से कम है। कहने को कहा जा सकता है कि विशेष आमंत्रित या स्थायी आमंत्रित सदस्यों और अग्रिम संगठनों के अध्यक्षों को मिला कर 50 साल से कम उम्र के नेताओं की संख्या अच्छी खासी हो जाती है। लेकिन उदयपुर में दूसरा सिद्धांत तय हुआ था।

बहरहाल, कांग्रेस अध्यक्ष ने कार्य समिति का गठन करते हुए इस साल होने वाले राज्यों के विधानसभा के चुनावों को तो ध्यान में रखा ही है अगले साल के लोकसभा चुनाव को भी ध्यान में रखा है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि जिन राज्यों में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर सकती है उन राज्यों के नेताओं को महत्व मिले ताकि वे अपने राज्य में मजबूती से काम कर सकें। इस साल के अंत में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। सो, खड़गे ने इन पांचों राज्यों का पूरा ध्यान रखा है। पता नहीं यह कितनी सफल होगी लेकिन एक रणनीति के तहत कांग्रेस ने पांचों मुख्यमंत्रियों को कार्य समिति से बाहर रखा गया। इनमें से दो मुख्यमंत्रियों- अशोक गहलोत और भूपेश बघेल से यहां चुनाव होने वाले हैं।

दोनों राज्यों से कांग्रेस अध्यक्ष ने बड़े चेहरों को कार्य समिति में रखा। राजस्थान के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को कार्य समिति में रख कर उनके समर्थकों और जातीय समुदाय को मैसेज दिया गया है। ध्यान रहे गहलोत और पायलट के बीच संबंध अच्छे नहीं थे लेकिन पिछले दिनों कांग्रेस आलाकमान ने दोनों को साथ बैठा कर तालमेल बनवाने का प्रयास किया है। उसके बाद से दोनों में सद्भाव भी दिख रहा है। खड़गे ने मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और कार्य समिति के सदस्यों के जरिए पिछड़ा, जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, राजपूत सबका एक संतुलन बनाया है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव को कार्य समिति में नहीं लिया गया है लेकिन ताम्रध्वज साहू को सदस्य बनाया गया है। ध्यान रहे पिछले विधानसभा चुनाव के समय अपने आप यह संदेश गया था कि ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इसलिए साहू समाज का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ जुड़ा था। इस बार के चुनाव से पहले भाजपा उसे फिर अपनी ओर करने का प्रयास कर रही है। भाजपा ने पिछले दिनों 21 उम्मीदवारों की घोषणा की, जिनमें से आठ पिछड़ी जाति के थे और उनमें से चार साहू समाज के थे।

भाजपा की इस रणनीति की काट खड़गे ने ताम्रध्वज साहू को कार्य समिति में शामिल करके किया है। उनके अलावा आदिवासी समाज की फूलोदेवी नेताम को भी कार्य समिति में शामिल किया गया है। ऐसे ही मध्य प्रदेश से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी कार्य समिति में रखा गया है और साथ ही राहुल गांधी के भरोसे की नेता मीनाक्षी नटराजन को भी सदस्य बनाया गया है। मिजोरम में भी इस साल चुनाव हैं, जहां के पूर्व मुख्यमंत्री ललथनहवला को सीडब्लुसी में शामिल किया गया है और तेलंगाना से नए चेहरे के तौर पर वामशी चंद रेड्डी को सदस्य बनाया गया है। वे युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं।

इस साल के विधानसभा चुनावों के अलावा अगले साल के लोकसभा चुनाव और कांग्रेस संगठन की मजबूती को ध्यान में रखते हुए भी खड़गे ने नए और पुराने सदस्यों का संतुलन बनाया है। उन्होंने महाराष्ट्र पर सबसे ज्यादा तवज्जो दी है क्योंकि वहां शिव सेना और एनसीपी दोनों में विभाजन को देखते हुए कांग्रेस अपना पुराना आधार हासिल करने की राजनीति कर सकती है। इसलिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक के साथ साथ कुल नौ लोगों को कार्य समिति में रखा गया है।

खड़गे ने मराठा, दलित, ब्राह्मण, महिला, पिछड़ा सबका संतुलन बनाया है। दिल्ली और पंजाब व हरियाणा से कांग्रेस एक मैसेज बनवाना चाहती है इसलिए इन तीनों छोटे राज्यों से कई नेताओं को कार्य समिति में जगह मिली है। दिल्ली से अजय माकन, अलका लांबा और देवेंद्र यादव को रखा गया है तो हरियाणा से रणदीप सुरेजवाला, कुमारी शैलजा और दीपेंद्र हुड्डा को कार्य समिति में शामिल किया गया है। पंजाब में कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को फिर से महत्व देते हुए सीडब्लुसी में रखा है। पंजाब की राजनीति में इसका असर देखने को मिलेगा।

प्रादेशिक व जातीय संतुलन के अलावा मल्लिकार्जुन खड़गे ने दो संतुलन और बनाए हैं। उन्होंने नए और पुराने नेताओं का बैलेंस बनाया है तो साथ ही नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले जी-23 के नेताओं और परिवार के प्रति निष्ठावान रहे नेताओं के बीच भी संतुलन बनाया है। कन्हैया कुमार से लेकर पवन खेड़ा, सुप्रिया श्रीनेत, बीवी श्रीनिवास, सचिन पायलट, अलका लांबा, गौरव गोगोई, दीपेंद्र हुड्डा आदि युवा नेताओं को कार्य समिति में रखा गया है तो एके एंटनी, अंबिका सोनी, मीरा कुमार जैसे बुजुर्ग नेताओं को भी रखा गया है।

जी-23 में शामिल रहे शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा को कार्य समिति में शामिल करके खड़गे ने यह मैसेज दिया है कि पार्टी नेताओं की असहमति का भी सम्मान करती है। आंतरिक लोकतंत्र को लेकर इससे एक अच्छा मैसेज जाएगा। कुल मिला कर खड़गे ने एक अच्छी टीम बनाई है लेकिन राजनीति में किसी भी टीम की परख उसकी परफारमेंस और नतीजों से होती है। सो, आगे आने वाले चुनावों से पता चलेगा कि खड़गे की टीम कितनी कारगर है।

यह भी पढ़ें:

कांग्रेस के मुद्दों पर लड़ रही भाजपा!

मोदी का वह अंहकार और अब?

Tags :

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें

Naya India स्क्रॉल करें