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रवैया जब टच एंड गो का है तब साथ आ कर भी विपक्ष कैसे आंदोलन ख़ड़ा करेगा?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में हो रही है। मई में भी विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की एक बैठक दिल्ली में हुई थी। तब जिन पार्टियों ने उससे दूरी बनाई थी वे भी इस बार की बैठक में शामिल हो रही हैं। इससे पार्टियों की गंभीरता का अहसास हो रहा है। लेकिन क्या सिर्फ एक साथ आकर बैठक कर लेना पर्याप्त होगा? देश के सामने जो अभूतपूर्व संकट दिख रहें हैं उससे निपटने के लिए पार्टियों की साझा बैठक या नेताओं के बेहद आक्रामक बयान या सोशल मीडिया का अभियान पर्याप्त नहीं है।

पार्टियों को संकट की व्यापकता को समझना होगा और मुकाबले के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले तो ‘इंडिया’ ब्लॉक को ही औपचारिक रूप देना होगा। 2023 में शरद पवार के घर पर हुई बैठक के बाद से ही इसका इंतजार हो रहा है कि इसका एक संयोजक होगा और एक सचिवालय बनेगा। लेकिन अभी तक ये दोनों काम नहीं हुए। जून 2024 में चुनाव हारने के बाद तो दो साल तक इसकी बैठक भी नहीं हुई।

ऐसा नहीं है कि विपक्षी पार्टियों को कोई चैरिटी का काम करना है। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के अभियान ने ही 2024 के चुनाव में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को राजनीतिक सफलता दिलाई थी। इसलिए अगर पार्टियां गंभीरता से एसआईआर की गड़बड़ियों को पकड़ती हैं, उन्हें जनता के बीच ले जाती हैं, चुनाव आय़ोग और सरकार को कठघरे में खड़ा करती हैं तो उनको इसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। एक समय था जब विपक्ष मुद्दों की तलाश करता था और उन पर आंदोलन करके सरकार को जवाबदेह बनाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।

यह बहुत दिलचस्प है कि इन दिनों आम लोग सरकार की कमियां खोज रहे हैं। नीट पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी का खुलासा छात्रों ने किया। उन्होंने न सिर्फ पेपर लीक का पता लगाया, बल्कि परीक्षा कराने का ठेका ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दिए जाने का खुलासा भी छात्रों ने किया। पहली बार अगर नरेंद्र मोदी सरकार के किसी मंत्री का इस्तीफा हुआ तो वह छात्रों के आंदोलन और उनके दबाव में हुआ। नीट पेपर लीक का खुलासा करने से लेकर ब्लैकलिस्टेड कंपनी को परीक्षा का ठेका देने के लिए बार बार टेंडर बदलने का खुलासा सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी जैसे युवा छात्रों ने किया।

इसी तरह इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन खराब होने का मुद्दा कुछ यूट्यूबर्स और इन्फ्लूएंसर्स ने उठाया। मनीष कश्यप ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। आम लोगों से जुड़े इस मुद्दे पर भी सरकार बैकफुट पर आई। इसी तरह यूपीआई पर शुल्क लगाने के सरकार के फैसले के खिलाफ व्यापारी लड़ रहे हैं और आम लोग सोशल मीडिया में माहौल बना रहे हैं। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का खुलासा मंदिर के ही एक कर्मचारी ने किया। इन सारे मुद्दों पर गहराई से काम करने की जरुरत थी। लेकिन विपक्ष ने सिर्फ संसद सत्र में इन मुद्दों को उठाया।

असल में विपक्ष का रवैया टच एंड गो का है। वह हर मुद्दे को छूकर आगे बढ़ जा रहा है। जबकि इतिहास गवाह है कि किसी भी मुद्दे पर सरकार को जिम्मेदार ठहराने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने के लिए सतत चलने वाले प्रयास की जरुरत होती है। उस पर गंभीरता से शोध करना होता है, उसके हर आयाम को समझना और जनता को समझाना होता है। बोफोर्स का मामला निरंतर दो साल से ज्यादा चला था तब जाकर राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ माहौल बना। भ्रष्टाचार का आंदोलन लगातार तीन साल चला तब लोगों की दिलदिमाग में मनमोहन सिंह की सरकार को पलट देने और कांग्रेस को सजा देने की भावना बनी। यहां कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां समझ रही हैं कि वे संसद में मुद्दा उठा देंगी, संसद परिसर में हंगामा कर देंगी या एक साझा बैठक कर लेंगी या कोई प्रेजेंटेशन हो जाएगा तो उससे सरकार के खिलाफ माहौल बन जाएगा तो ऐसा नहीं होने वाला है। यह सरकार पहले की सरकारों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाली नहीं है। वह लगातार आरोपों को काउंटर करती है और नए नैरेटिव पैदा करती है।

इसलिए विपक्ष अगर चाहता है कि एसआईआर की गड़बड़ियों या चुनाव आयोग की मनमानियों पर देश में एक राजनीतिक माहौल बने तो उसके प्रयासों में निरंतरता दिखनी चाहिए। बारीकी से इस पर काम करके लोगों के सामने एक एक तथ्य रखना चाहिए। सिर्फ मोटामोटी यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि ज्ञानेश कुमार ने मनमानी की, 13 करोड़ लोगों के नाम काट दिए या जिला व प्रदेश के चुनाव अधिकारियों को सेंट्रल डेटाबेस का एक्सेस नहीं दिया। विपक्ष को इसकी तह में जाना होगा।

अभी ऐसा लग रहा है कि पार्टियां ऊपर ऊपर मामले को देख रही हैं। उनके प्रयास में निरंतरता भी नहीं है। राहुल गांधी ने पिछले साल सितंबर में कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट को लेकर खुलासा किया था। उन्होंने 6,018 वोट काटे जाने का दावा किया था और कहा था कि कर्नाटक के बाहर से मोबाइल नंबर से नाम कटवाने के आवेदन भेजे गए और नाम कटे। उन्होंने सूर्यकांत नाम के एक व्यक्ति को मंच पर पेश किया। सूर्यकांत ने बताया कि उन्होंने किसी का नाम काटने का आवेदन नहीं दिया लेकिन उनके नाम से आवेदन करके 14 मिनट में 12 नाम कटवाए गए। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र को लेकर भी इस तरह के दावे किए। लेकिन उसके बाद सन्नाटा हो गया।

यह बहुत बड़ी बात है कि किसी भी व्यक्ति के नाम या फोन नंबर का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम काटे जा रहे हैं या काटे जा सकते हैं। अभी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के सामने 38 लाख आवेदन लंबित हैं, जिनमें से 22 लाख आवेदन नाम जोड़ने के हैं और 16 लाख आवेदन नाम काटने के हैं। क्या यह विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पता लगाए कि ये 16 लाख लोग कौन हैं, जो अपना नाम कटवाना चाहते हैं? पिछले दिनों बंगाल के माल्दा और मुर्शिदाबाद दोनों जगह से खबर आई थी कि थोक में फॉर्म सात भर कर लोगों के नाम कटवाने की कोशिश की गई।

कई जगह जागरूक बीएलओ ने इसे रोका भी। दिल्ली में 47 लाख यानी एक तिहाई मतदाताओं के नाम कट गए। इनमें 43 लाख लोगों के नाम इस आधार पर कटे हैं कि वे स्थायी रूप से शिफ्ट हो गए हैं। सोचें, इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली से शिफ्ट होकर लोग कहां जा रहे हैं? अब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि धीरे धीरे सेंट्रल डेटाबेस के एक्सेस को सेंट्रलाइज किया जा रहा है और ईआरओ, डीईओ और सीईओ को संपूर्ण व बिना शर्त एक्सेस नहीं मिल रही है। अगर इस खुलासे को कर्नाटक, बंगाल या दिल्ली की खबरों से मिला कर देखें तो यह संभव है कि योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं की प्रोफाइलिंग करके उनके नाम काटे जाने का बड़ा खुलासा हो।

साझा बैठक करने या आंदोलन करके ऑप्टिक्स बनाने से पहले कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को बारीकी से तमाम गड़बड़ियों पर काम करने की जरुरत है। यह समय लेने और थका देने वाला काम है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के पास संसाधन की कमी नहीं है। अगर उनको लग रहा है कि एसआईआर के जरिए बहुत बड़ी कोई गड़बड़ी हो रही है तो उन्हें इसका खुलासा करने के लिए बड़े पैमाने पर ही काम करना होगा। अमेरिका के वाटरगेट स्कैंडल से लेकर भारत के बोफोर्स घोटाले तक जितने बड़े मामले खुले हैं उनमें लोगों को खपना पड़ा है। ऊपर ऊपर मुद्दे को छू देने और उस पर बयान देने से सरकार न तो जवाबदेह बनेगी और न आम जनता इसे गंभीरता से लेगी। जनता को यह दिखाना होगा कि विपक्ष या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे सिविल सोसायटी के लोग क्या लेकर सरकार से लड़ रहे हैं। इस पर कल विचार करेंग। (जारी)

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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