nayaindia Lok Sabha election 2024 चुनाव के मुद्दे पहले से तय होते हैं
नब्ज पर हाथ

चुनाव के मुद्दे पहले से तय होते हैं

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जमानत पर जेल से छूटने के बाद भाजपा के लिए मुश्किल बढ़ा रहे हैं। इस मायने में नहीं कि वे जेल से निकल कर नायक हो गए हैं और जनता उनकी दिवानी हो गई है, बल्कि इस मायने में कि वे कुछ भी बोल कर चुनाव के बीच विमर्श को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के लिए उनकी बातों का जवाब खोजना मुश्किल हो रहा है तभी भाजपा के दिल्ली प्रदेश के नेता यह तंज कर रहे हैं कि एक जून के बाद वे क्या करेंगे यानी एक जून के बाद तो जेल जाना ही होगा।

इससे एक तरह की खिसियाहट जाहिर होती है। इससे यह भी जाहिर हो रहा है कि केजरीवाल जो नया विमर्श गढ़ रहे हैं उससे नुकसान की संभावना भाजपा को दिख रही है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के तमाम नेता हिंदू-मुस्लिम या भारत-पाकिस्तान का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है कि चुनाव के बीच विमर्श बदल जाए और लोग जो पहले सोच रहे थे उससे बिल्कुल अलग सोचने लगें। लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक बार ऐसा देखने को मिला है, जब मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या हुई थी। उसके बाद चुनाव बदल गया था। इसके अलावा हर बार मतदान शुरू होने से पहले लोग मन बना चुके होते हैं। थोड़े से अनिर्णय वाले मतदाता ही चुनावी भाषण या किसी नैरेटिव के असर में आते हैं।

बहरहाल, केजरीवाल को लेकर भाजपा की चिंता बढ़ने के दो कारण हैं। पहला कारण तो उनका कुछ भी बोलना है। वे चुनावी भाषण में या प्रेस कांफ्रेंस में कुछ भी कह सकते हैं। वे किसी बात को कोई भी मोड़ दे सकते हैं। जैसे उन्होंने यह शिगूफा छोड़ा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद नियम बनाया है कि उनकी पार्टी में 75 साल से ऊपर का कोई आदमी नहीं रहेगा। इसलिए अगले साल 17 सितंबर को जब वे 75 साल के होंगे तो कुर्सी छोड़ देंगे और अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाएंगे। इस आधार पर केजरीवाल ने यह विमर्श बनाया कि मोदी अपने लिए नहीं, बल्कि अमित शाह के लिए वोट मांग रहे हैं। इस पर खुद अमित शाह को प्रतिक्रिया देनी पड़ी ताकि यह मैसेज न जाए कि मोदी बीच में हट सकते हैं और अमित शाह उनके उत्तराधिकारी हैं।

इसका नुकसान उत्तर भारत में हो सकता है, जहां अभी मतदान होना है और इससे पार्टी के बड़े नेताओं में भी नाराजगी पैदा हो सकती है। गुजरात का चुनाव निपट चुका है और वहां तो शाह का नाम चलाने की जरुरत भी नहीं थी। लेकिन अगर अब उनका नाम चलता है तो दूसरे राज्यों में नुकसान हो सकता है क्योंकि यह मैसेज होगा कि गुजराती से गुजराती को सत्ता का ट्रांसफर होना है। इससे क्षेत्रीय विमर्श प्रभावित होगा और जातीय समीकरण पर भी असर होगा। ध्यान रहे मोदी के हिंदू हृदय सम्राट होने की धारणा के साथ साथ उनके अत्यंत पिछड़ी जाति और गरीब घर से आने का तथ्य भी मतदाताओं पर असर डालता है। यह एडवांटेज अमित शाह के नाम पर संभव नहीं है।

इसका दूसरा पहलू यह है कि चूंकि 2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है और उन्होंने खुद कहा हुआ है कि 543 सीटों पर मोदी लड़ रहा है ऐसे में अगर मोदी ही हट जाएंगे तो फिर लोग क्यों भाजपा को वोट करेंगे? ध्यान रहे मोदी ने पूरे देश में सिर्फ अपना नाम लिया है। भाजपा से ज्यादा बार वे अपना नाम लेते हैं। वे भाजपा के लिए तो शायद ही कभी वोट मांगते हैं। हर सभा में वे मोदी के लिए वोट मांगते हैं। वे मोदी की गारंटी देते हैं। वे कहते हैं कि मोदी किसी से नहीं डरता है।

मोदी गरीबों के लिए काम करता है। मोदी विपक्ष की गालियां खाता है। उन्होंने चुनावी सभाओं में कहा है कि नीचे उम्मीदवार को देखने की जरुरत नहीं है, मोदी को देख कर वोट करें। तभी बहुत बारीक तरीके से केजरीवाल ने इस नैरेटिव को टारगेट किया है। अगर आम मतदाता के बीच यह बात पहुंचती है कि मोदी बीच में ही सरकार छोड़ सकते हैं तो मतदाताओं में उदासीनता का भाव आ सकता है। ध्यान रहे देश में पहले ही चुनाव के प्रति लोगों का उत्साह नहीं दिख रहा है।

इसका तीसरा पहलू यह है कि भाजपा के अंदर क्षत्रपों के बीच अविश्वास पैदा होगा और किसी न किसी स्तर पर उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू होगी। एक दूसरे को कमजोर करने का प्रयास भी हो सकता है। केजरीवाल ने अमित शाह के मोदी का उत्तराधिकारी होने का दावा करने के साथ ही यह भी कहा कि सरकार बनने के दो महीने के अंदर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है। सोचें, कितनी होशियारी से केजरीवाल ने पहले से अफवाहों की तरह चल रही चर्चाओं को मुख्यधारा का राजनीतिक विमर्श बना दिया?

इससे पहले ऐसी बातें केजरीवाल की अपनी पार्टी के लिए कही जाती थी। कहा जा रहा था कि राज्यसभा सांसद संजय सिंह जेल से छूट गए हैं तो वे केजरीवाल के उत्तराधिकारी बनेंगे या केजरीवाल से पहले मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आए तो वे मुख्यमंत्री बनेंगे। यह भी अक्सर कहा जाता है कि भगवंत मान को केजरीवाल हटाएंगे नहीं तो वे पार्टी और सरकार दोनों पर कब्जा कर लेंगे। कुल मिला कर केजरीवाल की पार्टी के अंदर अविश्वास और सत्ता संघर्ष की बातें भाजपा फैलाती थी लेकिन अब इसी तरह की अफवाह केजरीवाल भाजपा के बारे में फैला रहे हैं।

केजरीवाल ने जो विमर्श बदलने का प्रयास किया है उसका दूसरा हिस्सा यह है कि मोदी की गारंटी कौन पूरी करेगा? हर बात पर मोदी कहते हैं कि यह मोदी की गारंटी है। लेकिन अगर आम लोगों के बीच यह मैसेज जाता है कि मोदी अगले साल हट जाएंगे तो गारंटी कौन पूरी करेगा यह सवाल तो उठेगा। तभी मोदी की गारंटियों पर सवाल उठाने के बाद केजरीवाल ने बड़ी चतुराई से अपनी 10 गारंटियों का ऐलान कर दिया। सोचें, उनकी पार्टी 543 में से कुल 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन वे पूरे देश के लिए गारंटी दे रहे हैं। इसके दो मकसद साफ दिख रहे हैं। पहला तो यह कि मोदी की गारंटियों का महत्व कम किया जाए और दूसरा यह कि मोदी की गारंटी के बरक्स अपनी गारंटी रख कर अपने को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में प्रासंगिक बनाया जाए।

केजरीवाल के इन बयानों के अलावा कुछ और घटनाएं चुनाव के बीच हुई हैं। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंबानी और अडानी का नाम लेकर कहा कि क्या इनसे बोरे में और टेंपो में भर कर काला धन मिला है, जो राहुल गांधी ने इनके बारे में बोलना बंद कर दिया है। इसी तरह पहले चरण के बाद हिंदू और मुस्लिम का विमर्श भी प्रधानमंत्री और भाजपा की ओर से खड़ा किया गया तो भारत और पाकिस्तान का नैरेटिव भी आ गया। लेकिन भारत का अब तक का चुनावी इतिहास यही है कि लोग मतदान का मन एक दिन पहले या चुनाव के बीच नहीं बनाते हैं।

उनका मन बना होता है। उनके फैसले तय होते हैं और फैसले तय करने में कोई एक कारक जिम्मेदार नहीं होता है। सो, अकादमिक बहस के लिए नए विमर्श या नए फैक्टर की चर्चा हो सकती है लेकिन चुनाव बुनियादी रूप से मोदी सरकार के 10 साल के कामकाज और मोदी की छवि के मुकाबले विपक्ष की एकजुटता और संविधान, लोकतंत्र व आरक्षण बचाने के मुद्दे पर ही लड़ा जा रहा है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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