राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

विमर्श बदल गया है, भाषण भी बदलना होगा

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को अपने भाषण का टेम्पलेट तत्काल बदलना चाहिए। उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी कुछ सीखना चाहिए और कुछ बदलते हालात को स्वतंत्र रूप से समझने की कोशिश करनी चाहिए। यह बड़ी हैरानी की बात है कि देश का समूचा राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक विमर्श बदल गया है लेकिन भाजपा नेताओं के भाषण का टेम्पलेट नहीं बदला है। वे अब भी अपने भाषण में वही बातें कह रहे हैं, जो कई साल से कहते आ रहे हैं। भाजपा की सोशल मीडिया टीम भी बदलती स्थितियों के मुताबिक बन रहे नए विमर्श का हिस्सा बनने के लिए कुछ नहीं कर रही है। इसलिए नैरेटिव का कंट्रोल उसके साथ से निकल रहा है। विपक्ष के नेता नैरेटिव तय कर रहे हैं और भाजपा की सोशल मीडिया टीम और भाजपा के नेता सिर्फ प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

बुधवार, छह अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे होने के मौके पर कई कार्यक्रम हुए। ऐसे ही एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लंबे भाषण में मोदी की उपलब्धियां बताने के बाद भाषण का समापन दो राजनीतिक बातों से किया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश का ‘चुनाव 80-20’ का है। एक तरफ ‘80 एनडीए के साथ और 20 पीडीए’ के साथ इसके बाद उन्होंने ‘एनडीए बनाम पीडीए’ का नारा दिया। सोचें, जब इतनी उपलब्धियां हैं, देश इतनी तरक्की कर रहा है, हर व्यक्ति का जीवन इतना खुशहाल हो रहा है और अगले 21 साल में भारत विकसित हो जाने वाला है फिर सांप्रदायिक आधार पर विभाजन के नारे का क्या मतलब है? दूसरी बात यह है कि अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ का मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। क्या योगी आदित्यनाथ ‘पीडीए’ की इस परिभाषा को स्वीकार कर रहे हैं और अगर कर रहे हैं तो फिर एनडीए के पास क्या बचेगा?

बहरहाल, इसी तरह छह अक्टूबर के ही एक कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर हमला किया और उनके प्रदर्शनों की आलोचना करते हुए कहा कि वे मतदाताओं के नहीं, बल्कि ‘घुसपैठियों के अधिकार की रक्षा’ के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इससे पहले एक भाषण में नितिन नबीन ने देश के नेता प्रतिपक्ष को ‘राहुल मियां’ कह कर संबोधित किया था। सोचें, क्या अब इस टेम्पलेट को बदलने की जरुरत नहीं है? 12 साल से केंद्र में भाजपा की सरकार है और अब भी वह घुसपैठ के नाम पर वोट मांग रही है। लेकिन यह नहीं बता रही है कि उसने अब तक कितने घुसपैठियों को बाहर निकाला। भाजपा बरसों तक मुलायम सिंह यादव को मौलाना मुलायम कहती रही। इसके बावजूद उनकी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार में आई और जब उनका निधन हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उनको दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान यानी पद्म विभूषण से सम्मानित किया। फिर क्या मुंह रह गया, उनको मौलाना मुलायम कहने वाले भाजपा नेताओं का! ऐसे ही भाजपा के नेता बरसों तक ममता बनर्जी को ममता बानो कहते रहे और वे चुनाव जीतती रहीं। ठीक है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के ऊपर भाजपा मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाती रही है लेकिन अब जबकि केंद्र में 12 साल से ज्यादा समय से हिंदू हृद्य सम्राट नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है तब भी क्या विपक्ष का कथित मुस्लिम तुष्टिकरण ही भाजपा का एजेंडा होगा? फिर प्रधानमंत्री जो इतनी बड़ी बड़ी उपलब्धियां बताते हैं उनका क्या?

ध्यान रहे देश का लोकप्रिय विमर्श पूरी तरह से बदल गया। विपक्ष की साख बिगाड़ने का अभियान भाजपा जितना चला सकती थी वह चला चुकी है। कांग्रेस, सपा, राजद या टीएमसी मुस्लिमपरस्त पार्टियां हैं, यह नैरेटिव अब वोट नहीं दिलाएगा। यह मरा हुआ सांप है, जिसे भाजपा गले में लटका कर घूम रही है। अब लोगों के खास कर युवाओं और महिलाओं के सरोकार बदल गए हैं। युवा पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी या परीक्षा के नतीजों में देरी और नौकरियों में कमी से परेशान है। उसके इस सरोकार को संबोधित करने की जरुरत है। महाराष्ट्र से लेकर बिहार, झारखंड और दिल्ली तक छात्र आंदोलित हैं और धरना, प्रदर्शन कर रहे हैं। नीट पेपर लीक के बाद दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन का असर यह हुआ है कि देश के अलग अलग हिस्सों में सैकड़ों प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। सब जंतर मंतर या झारखंड में हुए आंदोलन की तरह बहुत बड़े नहीं हैं। लेकिन छोटे स्तर पर ही छात्र व युवा सुलग रह हैं। हैरानी है कि पुराने टेम्पलेट के हिसाब से भाजपा के नेता अब भी छात्रों व युवाओं के धर्म के आधार पर बंट जाने की संभावना देख रहे हैं।

परंतु भाजपा नेताओं को समझना चाहिए कि आज के लोकप्रिय विमर्श में सबसे ऊपर सरकार की विफलताएं हैं। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के अलावा आर्थिक मुश्किलें लोगों के सामने हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्वीकार किया है कि आर्थिक संकट गहरा होने वाला है और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि खाद्यान्न का संकट आने वाला है। बढ़ती महंगाई की चिंता में रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी है, जिसका असर आम लोगों के ऊपर पड़ेगा। यूपीआई के इस्तेमाल पर शुल्क लगाने का सरकार का फैसला भी अंततः आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाएगा। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का मुद्दा भले ठंड़ा हुआ है लेकिन लाखों लोग इससे भी प्रभावित हैं।

उधर सामाजिक स्तर पर बिल्कुल नया विमर्श छिड़ गया है। थोड़े दिन पहले जो विमर्श सोशल मीडिया में दिख रहा था वह जमीनी स्तर पर भी दिखने लगा है। हिंदी के सबसे बड़े अखबार ‘दैनिक भास्कर’ ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए दिखाया कि एससी, एसटी एक्ट में कैसे लोगों को फंसाने का रैकेट काम कर रहा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पत्नी आरोप लगाती है, पति गवाही देता है और उसके बाद मुकदमा सेटल करने के लिए ढाई लाख रुपए लिए जाते हैं। बिल्कुल निचले स्तर पर अगड़ा बनाम पिछड़ा, अगड़ा बनाम दलित, पिछड़ा बनाम दलित का विवाद इतना बढ़ गया है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इस साल फरवरी में सरकार ने यूजीसी के नए दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें सामान्य वर्ग के युवा छात्रों को बिना किसी कसूर के अपराधी बनाने का प्रावधान किया गया। उसके बाद सामाजिक स्तर पर जाति का विमर्श ज्यादा तेज हुआ। सरकार की नीतियों के कारण समाज कई स्तर पर बंट गया है। हिंदू और मुस्लिम सहित अन्य अल्पसंख्यकों का विभाजन पहले से ज्यादा हुआ है तो साथ ही हिंदू समाज के अंदर जाति का विभाजन भी बहुत गहरा हो गया है। जाने अनजाने में नरेंद्र मोदी सरकार ने कई जातियों को सशक्त बनाने की बजाय उन्हें दूसरी जातियों के खिलाफ खड़ा कर दिया है। अब इसे संभालना भाजपा के वश में भी नहीं दिख रहा है।

सो, भाजपा के नेताओं को बदलते हुए विमर्श के हिसाब से अपने भाषण के टेम्पलमेट बदलने की जरुरत है। नेताओं को मरा हुआ सांप गले में लटका कर घूमने की बजाय जमीनी वास्तविकताओं को समझना होगा। जंतर मंतर पर इकट्ठा युवा छात्र, छात्राओं ने बताया कि उनको क्या चाहिए। उनको गंभीरता से सुनना और उनके सरोकारों को संबोधित करना चाहिए। सिर्फ गोलमोल और लच्छेदार बातों से या विपक्ष को मुस्लिमपरस्त या देशद्रोही बताने से भाजपा का भला नहीं होने वाला है। देश का लोकप्रिय विमर्श उससे आगे निकल चुका है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इसे नहीं समझा था तो उसे बड़ा नुकसान हुआ। अब वह बदलाव और ज्यादा सघन और तीव्र हो गया है। अब भी नहीं समझे तो आगे ज्यादा मुश्किल होगी।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment