nayaindia ओबीसी वोट: भाजपा की बढ़त, विपक्ष की चुनौती
अजीत द्विवेदी

‘इंडिया’ के सामने ओबीसी वोट की चुनौती

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ओबीसी वोट

विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ‘इंडिया’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी का वोट वापस हासिल करने की है। पिछले दो लोकसभा चुनावों से ओबीसी वोट तेजी से भाजपा की ओर शिफ्ट हुआ है। यह भारतीय राजनीति का एक अनोखा और दिलचस्प पहलू है। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर नरेंद्र मोदी के उदय से पहले माना जाता था कि मंडल और कमंडल की राजनीति एक दूसरे के विपर्यय हैं यानी एक दूसरे के उलट और विरोधी हैं। लेकिन 2014 के चुनाव से यह तस्वीर बदलने लगी, जो बाद में कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी दिखी। अब मंडल और कमंडल यानी जाति और धर्म की राजनीति एक हो गई है या कह सकते हैं कि एक दूसरे के साथ हाथ जोड़े चल रही है।

मंडल और कमंडल की राजनीति के एक हो जाने का स्पष्ट संकेत 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों में दिखता है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले तक राष्ट्रीय चुनावों में भाजपा एक चौथाई के करीब ओबीसी वोट ले पाती थी। भाजपा को 2009 में पिछड़ी जातियों का 22 फीसदी वोट मिला था। यह आंकड़ा 2014 में बढ़ कर एक तिहाई से ज्यादा यानी 34 फीसदी हो गया। इसके अगले चुनाव में यानी 2019 में वोट डालने वाले लगभग हर दूसरे ओबीसी मतदाता ने भाजपा को वोट किया। भाजपा को 44 फीसदी ओबीसी वोट मिला।

जिस अनुपात में भाजपा का ओबीसी वोट बढ़ता गया उसी अनुपात में कांग्रेस और प्रादेशिक पार्टियों का वोट घटता गया। कांग्रेस को 2009 में 24 फीसदी ओबीसी वोट मिला था, जो पिछले दो चुनावों में 15 फीसदी पर स्थिर रहा। प्रादेशिक पार्टियों को 2009 में 54 फीसदी ओबीसी वोट मिला था, जो 2014 में घट कर 51 फीसदी हुआ और 2019 में सीधा 10 फीसदी कम होकर 41 फीसदी रह गया। यानी भाजपा का ओबीसी समर्थन 2009 से 2019 के बीच दोगुना हो गया। वह 22 से बढ़ कर 44 फीसदी हो गया। भाजपा को मिले ओबीसी वोट में मजबूत व मझोली पिछड़ी जातियों का हिस्सा 40 फीसदी और अत्यंत पिछड़ी जातियों का हिस्सा 48 फीसदी है।

कांग्रेस से लेकर उसकी तमाम सहयोगी और संभावित सहयोगी पार्टियों की असली चिंता यही आंकड़ा है। हालांकि इसके अलावा भी कई आंकड़े हैं, जिन पर विपक्षी पार्टियों को बारीकी से विचार करने की जरूरत है, जैसे पिछले 10 साल में भाजपा ने मुस्लिम छोड़ कर हर समुदाय के वोट में पैठ बनाई है और उसको मिलने वाले हर समुदाय के वोट में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि वो समूह ऐसे हैं, जिनमें पहले से भाजपा मजबूत रही है। वैश्य और सवर्ण में भाजपा का पहले से मजबूत असर रहा है। खेती करने वाली जातियों जैसे मराठा, जाट, वोक्कालिगा, रेड्डी आदि का मामला अलग है।

अलग अलग राज्यों में इनका आधार है और भाजपा की कोशिश है कि इन जातियों की राजनीति करने वाली पार्टियों के साथ उसका चुनावी तालमेल हो जाए। इनमें से भी ज्यादातर जातियां अलग अलग राज्यों में ओबीसी श्रेणी में ही आती हैं। इसलिए अगर भाजपा की राजनीति को देखें तो बड़े कैनवस में वह हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति कर रही है, जबकि सूक्ष्म रूप से वह जातियों की राजनीति को अलग अलग तरीके से साध रही है। तभी संसद में महिला आरक्षण बिल पर भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा का यह कहना गौरतलब है कि कांग्रेस ने कभी भी ओबीसी प्रधानमंत्री नहीं बनाया, जबकि भाजपा ने देश को ओबीसी प्रधानमंत्री दिया। हालांकि नरेंद्र मोदी से पहले एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे, जो ओबीसी समुदाय से आते हैं और चूंकि उत्तर प्रदेश में जाट ओबीसी में आते हैं इसलिए चौधरी चरण सिंह पहले ओबीसी प्रधानमंत्री माने जाएंगे।

बहरहाल, अगले चुनाव की असली राजनीति ओबीसी वोट की है। तमिलनाडु में डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन को बीमारी बताया और इसके उन्मूलन की अपील करके ओबीसी राजनीति की है तो बिहार में चंद्रशेखर और उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्य ने ‘रामचरितमानस’ की कुछ चौपाइयों को दलित, पिछड़ा और स्त्री विरोधी बता कर ओबीसी व दलित राजनीति को साधने का प्रयास किया है। इस राजनीति के बीच ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण बिल पास हो गया है। संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस और मंडल की राजनीति करने वाली सभी पार्टियों ने इस बिल का समर्थन किया।

राज्यों में भी जहां उनकी सरकारें हैं वहां वे इसे पास कराएंगी। लेकिन साथ ही यह सवाल उठाती रहेंगी कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था नहीं की। विपक्षी पार्टियों के और खास कर मंडल की राजनीति करने वाली पार्टियों के सोशल मीडिया में सक्रिय समर्थक महिला आरक्षण बिल को सवर्ण महिला आरक्षण बिल बता कर प्रचारित कर रहे हैं। वे फिल्मी अभिनेत्रियों की तस्वीरें दिखा कर बता रहे हैं कि भाजपा सरकार के लाए कानून से ऐसी महिलाएं संसद में पहुंचेंगी। उनका दावा है कि इससे लोकसभा में ओबीसी सांसदों का प्रतिनिधित्व कम होगा और बड़ी संख्या में सवर्ण महिलाएं सांसद बन कर पहुंचेंगी।

इस तरह से महिला आरक्षण के रूप में विपक्ष को एक बड़ा दांव खेलने का मौका मिल गया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इसका अंदाजा नहीं रहा होगा। उनको पता होगा कि बिना ओबीसी के सब कोटा के महिला आरक्षण लाने में खतरा है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि दो कारणों से भाजपा ने यह जोखिम लिया है। पहला कारण तो ओबीसी के बीच भाजपा और नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता है।

उनको दिख रहा है कि पिछले दो चुनाव से ओबीसी का समर्थन बढ़ रहा है और मोदी के प्रधानमंत्री का चेहरा रहते यह वोट कम नहीं होगा। दूसरा कारण यह है कि भाजपा और मोदी को यह भरोसा है कि महिला एक कांस्टीट्यूंसी के तरह पर पूरी तरह से उभर कर स्थापित हो चुकी है। वह जाति और धर्म से परे स्वतंत्र होकर वोट डालने की स्थिति में है। तभी कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रह रहा है। भाजपा को लग रहा है कि महिला आरक्षण का इम्पैक्ट इतना बड़ा होगा कि उसमें जाति की राजनीति दब जाएगी।

तभी सवाल है कि विपक्षी पार्टियां क्या करेंगी? ऐसा लग रहा है कि महिला आरक्षण बिल ने विपक्ष को एक मौका दिया है। हालांकि यह ओबीसी वोट अपनी ओर खींचने का मुख्य प्लॉट नहीं होगा, लेकिन सब प्लॉट निश्चित रूप से होगा। मुख्य प्लॉट वही है, जो पहले से चल रहा है। वह है जातीय जनगणना और आरक्षण की सीमा बढ़ाने का वादा। विपक्षी पार्टियां अलग अलग राज्यों में इसे आजमा रही हैं। कर्नाटक में कांग्रेस ने इसे आजमाया और उसे कामयाबी मिली। बिहार में जाति जनगणना का काम पूरा हो गया है और उसके आंकड़े जल्दी ही सार्वजनिक किए जाएंगे।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक बिहार में 52 से 54 फीसदी तक ओबीसी आबादी होगी। यह आंकड़ा सामने आने के बाद इस अनुपात में आरक्षण की घोषणा हो सकती है। फिलहाल ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण है। उसे बढ़ा कर 40 फीसदी से ऊपर करने का ऐलान संभव है। इसके अलावा ओवरऑल आरक्षण की सीमा भी बढ़ाई जा सकती है। इसके अलावा महिला आरक्षण में ओबीसी आरक्षण करने की घोषणा के साथ साथ निजी क्षेत्र में और न्यायपालिका में आरक्षण का ऐलान भी संभव है। सो, ओबीसी की गिनती और उसके अनुपात में आरक्षण देने के प्लॉट के साथ साथ महिला आरक्षण के सब प्लॉट से भाजपा के ओबीसी वोट को अपनी ओर खींचने की रणनीति विपक्ष की होगी।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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