nayaindia एनडीए vs विपक्षी गठबंधन: चुनावी दावे का मूड
अजीत द्विवेदी

2024 में चुनावी मुकाबला नजदीकी का

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भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पुनर्जीवित होने और विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के औपचारिक शक्ल लेने के बाद हुए पहले बड़े सर्वेक्षण में ‘मूड ऑफ द नेशन’ भाजपा और एनडीए के पक्ष में दिखा है। सी-वोटर के सर्वेक्षण के मुताबिक एनडीए को एक बार फिर तीन सौ से ज्यादा सीटें मिलेंगी और भाजपा अकेले पूर्ण बहुमत हासिल करेगी। हालांकि दोनों की सीटें 2019 के मुकाबले कम होने की संभावना है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक एनडीए को 306 और भाजपा को 287 सीटें मिलेंगी।

इसका मतलब है कि एनडीए की 27 और भाजपा की 16 सीटें कम होंगी। अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 43 फीसदी वोट मिलेंगे। अकेले भाजपा के 39 फीसदी वोट हासिल करने की संभावना जाहिर की गई है, जो पिछली बार से दो फीसदी से ज्यादा है। यानी विपक्षी गठबंधन का एक छोटा सा फायदा यहां दिख रहा है कि भाजपा का वोट दो फीसदी बढ़ेगा लेकिन सीटें कम हो जाएंगी। 

दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को 41 फीसदी वोट मिलेगा लेकिन सीटें सिर्फ 193 मिलेंगी। सोचें, एनडीए के मुकाबले ‘इंडिया’ को सिर्फ दो फीसदी कम वोट मिलेंगे लेकिन सीटें 113 कम मिलेंगी। विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस को 22 फीसदी वोट मिलने का अनुमान जाहिर किया गया है, जो पिछली बार से दो फीसदी ज्यादा है।

दो फीसदी वोट बढ़ने और पूरे देश में गठबंधन बना कर चुनाव लड़ने का फायदा यह है कि कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़ कर 74 हो जाएंगी। इस सर्वेक्षण के मुताबिक भाजपा पश्चिम बंगाल और बिहार में अपनी पुरानी सीटें बचाने में काफी हद तक कामयाब रहेगी और उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें बढ़ेंगी। सर्वेक्षण ने इस लोकप्रिय धारणा की पुष्टि की है कि उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व का मुद्दा गुजरात की तरह स्थायी हो गया है और वहां भाजपा 50 फीसदी तक वोट हासिल कर सकती है। सर्वे में उसे 49 फीसदी वोट मिलने की बात कही गई है।

हालांकि अभी चुनाव बहुत दूर हैं और उससे पहले कई बातों से देश का मूड बदल सकता है। पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, उनके नतीजों का भी लोकसभा चुनाव पर असर होगा। विपक्षी पार्टियों का गठबंधन और मजबूत हुआ तो उसका भी असर चुनाव पर होगा। चुनावी रणनीति, प्रचार और सीटों के बंटवारे का भी बहुत असर चुनाव पर होगा। इसके अलावा कुछ ऐसे फैक्टर हैं, जिन पर किसी का जोर नहीं होता है।

ऐसी कोई घटना भी अगले आठ-नौ महीने में हो सकती है, जिसका चुनाव की दिशा पर असर होगा। लेकिन इस सर्वेक्षण से एक बात जाहिर हो गई है कि अगर एनडीए बनाम ‘इंडिया’ की लड़ाई होती है तो पूरे देश में मुकाबला आमने-सामने का होगा और बहुत नजदीकी होगा। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों में सत्तारूढ़ दलों के किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं होने के बावजूद 84 फीसदी वोट दोनों गठबंधनों के बीच बंट रहे हैं। इसका मतलब है कि दोनों गठबंधन से बाहर की पार्टियों और निर्दलियों को कुल मिल कर 16 फीसदी वोट मिलेंगे। 

दोनों गठबंधनों की तस्वीर साफ होने के बाद हुए पहले बड़े सर्वे के नतीजे दोनों पक्षों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। भाजपा भले वोट के मामले में कांग्रेस से बहुत आगे है लेकिन ‘इंडिया’ के मुकाबले देखें तो वोट का अंतर बहुत कम है। इतने कम अंतर पर भी भाजपा को बहुत ज्यादा सीट मिलने का कारण यह है कि भाजपा का वोट कुछ खास इलाकों में केंद्रित है। जहां उसका वोट नहीं है वहां नहीं है, लेकिन जहां है वहां उसको निर्णायक जीत दिलाने वाला है। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब आदि राज्यों में भाजपा का वोट बहुत कम है।

उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों और पश्चिम के महाराष्ट्र व गुजरात जैसे राज्यों में भाजपा का वोट केंद्रित होने का एक गणित यह है कि इन राज्यों में उसका वोट स्वाभाविक रूप से 50 फीसदी या उससे ज्यादा हो जाता है, जिससे वह इन राज्यों में ज्यादातर सीटें जीत जाती है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का वोट पूरे देश में है। इसलिए हर सीट पर उसे अच्छा खासा वोट मिलेगा लेकिन उससे चुनाव नहीं जीता जा सकेगा।

विपक्ष की ओर से बार बार 2004 के लोकसभा चुनाव की मिसाल देकर कहा जा रहा है कि उस समय भी किसी को अंदाजा नहीं था कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार हार जाएगी। लेकिन तब और अब में बहुत फर्क है, जिस पर विचार नहीं किया जा रहा है। 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं और उसे 24 फीसदी वोट मिले थे। उस चुनाव में कांग्रेस को सीटें भले 114 मिली थीं लेकिन उसे 28 फीसदी वोट मिले थे। यानी भाजपा से चार फीसदी ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले थे। सो, जब 2004 में कांग्रेस लड़ने उतरी थी तो वोट प्रतिशत के मामले में वह भाजपा से बड़ी और मजबूत पार्टी थी।

आज कांग्रेस के पास सिर्फ 20 फीसदी वोट है, जबकि भाजपा के पास 37 फीसदी वोट हैं। यानी अगले साल जब भाजपा चुनाव लड़ने उतरेगी तो कांग्रेस से 17 फीसदी ज्यादा वोट के साथ लड़ने उतरेगी। एक दूसरे सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि 2004 में महज 27 फीसदी लोग मानते थे कि वाजपेयी सरकार की आर्थिक नीतियों की वजह से देश का विकास हुआ है, जबकि आज 38 फीसदी लोग ऐसा मानते हैं। यह बड़ा अंतर है। वाजपेयी और मोदी की लोकप्रियता का फर्क भी बहुत बड़ा है। एक फर्क यह भी है कि अब चुनाव राष्ट्रीय भावनाओं पर हो रहे हैं, विपक्ष को कमजोर करने के अराजनीतिक उपायों का इस्तेमाल बढ़ गया है और भाजपा चुनाव लड़ने की एक बड़ी मशीनरी में तब्दील हो गई है। 

सो, 2004 के चुनाव की मिसाल 2024 में बहुत उपयुक्त नहीं है। अगले साल के लोकसभा चुनाव की संभावनाओं का आकलन वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि विपक्षी गठबंधन के लिए रास्ता बंद हो गया है। इस सर्वेक्षण में ही विपक्ष के लिए उम्मीद की किरण छिपी है। यह साफ हो गया है कि वोट के मामले में गठबंधन बराबरी की टक्कर दे रहा है और भाजपा की सीटें ज्यादा होना एक तकनीकी मामला है, जिसका उपाय निकाला जा सकता है।

मिसाल के तौर पर सर्वे के मुताबिक पश्चिम बंगाल में भाजपा पिछली बार की तरह फिर 18 सीट जीत जाएगी और गठबंधन को 24 सीटें मिलेंगी। संभावित गठबंधन की तीनों पार्टियां यानी तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और लेफ्ट सीटों का ऐसा रणनीतिक एडजस्टमेंट कर सकते हैं, जिससे गठबंधन की सीटें बढ़ सकती हैं। इसी तरह एनडीए को बिहार में 14 सीट मिलने की बात कही गई है। वहां भी गठबंधन की पार्टियां बेहतर तालमेल से एनडीए की सीटें और कम कर सकती हैं। ध्यान रहे पहले से माना जा रहा है कि बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक इन चार राज्यों में अगले चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है। इस लोकप्रिय धारणा की कुछ हद तक  पुष्टि इस सर्वेक्षण से हुई है।

सो, विपक्षी गठबंधन की पार्टियों को एक तरफ सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन में बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत है तो दूसरी ओर चुनाव का नैरेटिव तय करने पर फोकस करने की जरूरत है। भारत की जो चमकदार तस्वीर सरकार की ओर से पेश की जा रही है उसके बरक्स अगर विपक्ष जमीनी हकीकत और आम लोगों की जिंदगी से जुड़े मुद्दों का नैरेटिव बनाता है तो उसको फायदा होगा। केंद्र सरकार और भाजपा दोनों की तरफ से बनाए जा रहे हिंदुत्व के नैरेटिव के बरक्स अगर विपक्ष जातीय जनगणना और आरक्षण के मुद्दे से सामाजिक न्याय का नैरेटिव बनाता है तब भी उसको फायदा होगा। इसके बाद भी राष्ट्रवाद और मोदी का मजबूत नेतृत्व विपक्ष के रास्ते की बाधा है, जिससे पार पाने का रास्ता विपक्षी गठबंधन को अगले आठ-नौ महीने में खोजना है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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