nayaindia भाजपा: राज्यों में नेतृत्व या एकाधिकार?
अजीत द्विवेदी

भाजपा जूनियर पार्टनर नहीं रहना चाहती

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भाजपा-संघ

भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक दृष्टि पूरी तरह से बदल गई है। वह गठबंधन करना चाहती है और यह भी दिखाना चाहती है कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के मुकाबले उसे ज्यादा प्रादेशिक पार्टियों का समर्थन और सहयोग हासिल है। लेकिन वह कहीं भी जूनियर पार्टनर नहीं रहना चाहती है। वह किसी भी राज्य में छोटी पार्टियों के नेतृत्व में चुनाव नहीं लड़ना चाहती है। यह दृष्टिकोण का बड़ा बदलाव है। एक तरफ कांग्रेस कई राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों के जूनियर पार्टनर की तरह गठबंधन में शामिल है और उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने को तैयार है तो दूसरी ओर भाजपा ने पूरा नजरिया बदल दिया है। अब वह इस नजरिए से राजनीति कर रही है कि राज्यों में भी या तो वह गठबंधन का नेतृत्व करेगी या अकेले राजनीति करेगी और अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक उसका यह नजरिया दिख रहा है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बिहार में पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि भाजपा अब किसी भी नेता को कंधे पर नहीं बैठाएगी। इसका मतलब है कि किसी दूसरी पार्टी के नेता के नेतृत्व में न राजनीति करेगी और न चुनाव लड़ेगी। इस बयान से नीतीश कुमार को भाजपा ने बहुत साफ संदेश दिया। उसने बता दिया कि अगर नीतीश कुमार को एनडीए में लौटना है तो भाजपा का नेतृत्व स्वीकार करना होगा। पहले की तरह भाजपा उनको नेता बना कर राजनीति नहीं करेगी।

इस आशय की खबरें पहले से आ रही थीं कि अगर उनकी वापसी होती है तब भी भाजपा उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी। तभी भाजपा ने राज्य की बेहद छोटी छोटी तीन-चार पार्टियों से तालमेल किया है। नीतीश कुमार भी वापसी के लिए बेचैन नहीं है। उनकी अपनी राजनीति है और वे अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान कराने के बाद ही वापसी के बारे में सोचेंगे और तब उनको लग रहा है कि भाजपा उनकी शर्त मानेगी।

बहरहाल, भाजपा के किसी का जूनियर पार्टनर बन कर राजनीति नहीं करने की रणनीति कई राज्यों से स्पष्ट दिखाई दे रही है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब इन चारों राज्यों में भाजपा अकेले या छोटी पार्टियों के साथ राजनीति करती दिख रही है। पहले पंजाब की बात करें। वहां भाजपा हमेशा अकाली दल की पिछलग्गू रही है। अकाली दल लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में ज्यादा सीटों पर लड़ती थी और उसकी छोड़ी हुई सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ती थी।

कृषि कानून पर एक बार अकाली दल के अलग होने के बाद से भाजपा अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ा रही है। उसने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ को पार्टी में शामिल किया और इतना ही नहीं जाखड़ को प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया। अब अकाली दल के साथ भाजपा बराबरी की बात कर रही है। वह बराबर सीटों पर लड़ना चाहती है और इस वजह से तालमेल नहीं हो पा रहा है।

इसी तरह भाजपा ने महाराष्ट्र में शिव सेना का विभाजन होने के बाद भले एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया है लेकिन वह शिव सेना के शिंदे गुट की पिछलग्गू नहीं है। शिव सेना और एनसीपी का अजित पवार गुट भाजपा का पिछलग्गू हैं। भाजपा प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर 2014 के लोकसभा और उसी साल के विधानसभा चुनाव में उभर गई थी। लेकिन उसके बाद साम, दाम, दंड और भेद की सारी रणनीति अपना कर उसने प्रदेश की सभी पार्टियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां कोई पार्टी उससे बड़ी न हो सके या उस पर दबाव नहीं डाल सके।

अब शिव सेना और एनसीपी का अजित पवार गुट उसके नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा हैं लेकिन अगले साल के लोकसभा व विधानसभा चुनाव में उन्हें बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ना होगा। आधे से ज्यादा सीटों पर भाजपा लड़ेगी और आधी से कम सीटों पर दोनों पार्टियों को लड़ना होगा। भाजपा जिस तरह बिहार में लंबे समय तक जनता दल यू की पिछलग्गू थी वैसे ही महाराष्ट्र में शिव सेना की और पंजाब में अकाली दल की थी। लेकिन तीनों राज्यों में भाजपा ने राजनीति बदल दी है।

आंध्र प्रदेश के बारे में माना जा रहा है कि वहां भाजपा संतुलन की राजनीति कर रही है। वह जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू दोनों से समान दूरी दिखा रही है ताकि चुनाव के बाद जिसको ज्यादा सीटें मिलें उसके साथ तालमेल किया जा सके। लेकिन वहां भी किसी के साथ तालमेल नहीं करने का एक कारण यह है कि पार्टी वाईएसआर कांग्रेस या टीडीपी की पिछलग्गू नहीं बनना चाहती है। वह अकेले लड़ कर ताकत बढ़ाना और चुनाव के बाद तालमेल की योजना पर काम कर रही है।

तमिलनाडु में भी अन्ना डीएमके से तालमेल टूटने का कारण यह है कि भाजपा अकेले अपनी ताकत बढ़ा रही थी। नए प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद कर रही थी। अन्ना डीएमके नेताओं पर बयान तो तालमेल टूटने का तात्कालिक कारण बना। असली कारण यह है कि अन्ना डीएमके को लग रहा था कि भाजपा उसके वोट में सेंध लगा रही है। उसके साथ रह कर अपने को ज्यादा बड़ा करने की राजनीति कर रही है।

सोचें, भाजपा कितने राज्यों में पिछलग्गू पार्टी के तौर पर राजनीति करती थी। लेकिन आज वह किसी भी राज्य में जूनियर पार्टनर नहीं है। या तो उसका गठबंधन नहीं है, वह अकेले राजनीति कर रही है या वह गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। यह बात राष्ट्रीय स्तर पर पहले से थी लेकिन राज्यों के स्तर पर भाजपा ने हाल के दिनों में यह राजनीति की है। भाजपा यह महसूस कर रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी तौर पर सबसे बड़ी ताकत बने रहने के लिए जरूरी है कि राज्यों में भी पार्टी बड़ी ताकत बने।

पहले वह सिर्फ हिंदी पट्टी की पार्टी थी और दक्षिण, पश्चिम या पूर्वी भारत में कमजोर थी तो राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए का नेतृत्व संभालने के बावजूद प्रादेशिक क्षत्रपों के हिसाब से उसको काम करना पड़ता था। उसने यह भी देखा कि कांग्रेस कैसे राज्यों में कमजोर होती गई तो राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी मजबूती समाप्त हो गई। इसलिए उसने राज्यों में अपने को मजबूत करना शुरू किया है। यह राजनीति उसकी सभी सहयोगी पार्टियों के लिए खतरे की घंटी है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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