nayaindia भाजपा के तीन नए मुख्यमंत्री: जानें उनकी खासियतें
अजीत द्विवेदी

भाजपा के प्रयोगों में नया कुछ नहीं!

Share
भाजपा

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने तीन नए मुख्यमंत्री बनाए हैं। छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को छोड़ दें तो बाकी दोनों नाम बहुत चौंकाने वाले हैं। साय दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और केंद्र में इस्पात राज्य मंत्री रहे हैं इसलिए लोगों ने उनका नाम सुना हुआ था और चुनाव नतीजों के बाद से ही उनके नाम की चर्चा भी हो रही थी। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि मध्य प्रदेश में मोहन यादव और राजस्थान में भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री हो जाएंगे। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने इन दोनों का नाम तय करा कर सबको चौंकाया। जब से इन दोनों का नाम तय हुआ है तब से इस बात की चर्चा हो रही है कि भाजपा ने बिल्कुल नया प्रयोग किया है और दूसरी पार्टियों को इससे सीखना चाहिए। लेकिन सवाल है कि इसमें नया क्या है? क्या भाजपा ने पहले ऐसे प्रयोग नहीं किए हैं?

इस प्रयोग के बारे में जो नई बात कही जा रही है उसमें दो-तीन बातें खास हैं। जैसे ये तीनों मुख्यमंत्री 60 साल से कम उम्र के हैं। तीनों बहुत चर्चित चेहरे नहीं हैं। तीनों में से एक भजनलाल शर्मा पहली बार के विधायक हैं। तीनों राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले हैं और संगठन में सक्रिय रहे हैं। अगर इन चार बातों को देखें तो इसमें कुछ भी नया नहीं है। सबसे पहले उम्र की बात करें। तो आज से 20 साल पहले जब वसुंधरा राजे और रमन सिंह मुख्यमंत्री बने थे तब दोनों की उम्र 50 साल थी।

यानी अभी बने तीनों कथित युवा मुख्यमंत्रियों से कम थी। आज से 18 साल पहले, जब शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तब उनकी उम्र सिर्फ 46 साल थी। खुद नरेंद्र मोदी जब पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तब उनकी उम्र 52 साल की थी। उनको उस समय गुजरात भाजपा के सबसे दिग्गज नेता केशुभाई पटेल को हटा कर मुख्यमंत्री बनाया गया था। सो, इसमें कुछ भी नया नहीं है कि भाजपा ने 60 साल से कम उम्र के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया या संबंधित राज्यों के सबसे मजबूत और दिग्गज नेताओं को दरकिनार करके अपेक्षाकृत कम चर्चित नेताओं को कमान सौंपी। भाजपा पहले भी यह काम करती रही है।

अगर पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयोग की बात करें तो वह भी भाजपा पहले कर चुकी है। नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तब वे विधायक भी नहीं थे। वे मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार विधायक बने और पहली बार सांसद बने तो प्रधानमंत्री बने। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा में 2014 में भाजपा के जीतने पर पहली बार के विधायक मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया। जहां तक अपेक्षाकृत कम चर्चित नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने की बात है तो मनोहर लाल खट्टर से बेहतर मिसाल नहीं हो सकती है। अनेक दिग्गज नेताओं के होते हुए मोदी ने खट्टर को सीएम बनवाया था।

इसी तरह उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत हों या तीरथ सिंह रावत हों या मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हों ये सब कम चर्चित चेहरे रहे हैं। धामी के बारे में तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि वे सीएम बनेंगे। लेकिन चुनाव से छह महीने पहले वे मुख्यमंत्री बने और खुद विधानसभा का चुनाव हार जाने के बाद भी उनको दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। गुजरात में भूपेंद्र पटेल से लेकर हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर और महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस तक भाजपा दूसरी या तीसरी कतार के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाती रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाजपा की कमान संभालने से पहले भी ऐसे प्रयोग बहुत हुए। मध्य प्रदेश में बाबूलाल गौर हों या उत्तर प्रदेश में रामप्रकाश गुप्त हों या कर्नाटक में डीवी सदानंद गौड़ा हों, ऐसे कई नेता मुख्यमंत्री बने थे, जो बहुत चर्चित या लोकप्रिय नहीं थे।

तीनों नए मुख्यमंत्रियों में एक कॉमन बात राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की पृष्ठभूमि से होना है। लेकिन यह भी कोई नई बात नहीं है। हां, यह जरूर है कि पिछले कुछ समय से भाजपा ऐसे नेताओं को तरजीह दे रही थी, जो दूसरी पार्टियों से आए थे। असम सहित समूचे पूर्वोत्तर में उसने कांग्रेस से आए नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया तो कर्नाटक में भी पुराने समाजवादी नेता बसवराज बोम्मई को सीएम बनाया था। लेकिन पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा की जो रणनीति है उसे वह हिंदी हृद्य प्रदेशों में नहीं आजमा सकती है। उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मजबूत नेटवर्क और उसके काम की वजह से भाजपा जीतती है। इन राज्यों का मतदाता भी भाजपा और संघ की वजह से विचारधारा की प्रतिबद्धता लिए हुए है। तभी इन राज्यों में बाहरी नेता को कमान देने का प्रयोग संभव नहीं है। यही कारण है कि भाजपा के आला नेताओं के तमाम सद्भाव के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं बन पाए।

जहां तक जातीय संतुलन साधने की कोशिश का सवाल है तो उसमें भी कुछ नया नहीं है। ध्यान रहे छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों राज्य एक साथ बने थे, जिसमें झारखंड में भाजपा को पहली सरकार बनाने का मौका मिला और उसने अटल बिहारी वाजपेयी की तब की सरकार में मंत्री रहे बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना कर बैठाया था। चूंकि एक राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बन गया था इसलिए भाजपा ने छत्तीसगढ़ में गैर आदिवासी रमन सिंह पर दांव खेला था। छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार जीतती रही और रमन सिंह सीएम बने रहे तो उधर झारखंड में भाजपा को जब भी मौका मिला तो आदिवासी मुख्यमंत्री बना।

मरांडी के बाद तीन बार अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। चूंकि नरेंद्र मोदी ने कमान संभालने के बाद झारखंड में रघुबर दास के रूप में पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया था इसलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ में पहला मौका मिलते ही नुकसान की भरपाई के लिए आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया। बाकी दोनों राज्यों में पहले से जो समीकरण था वहीं समीकरण अब भी है। 2003 में जब छत्तीसगढ़ में रमन सिंह बने तो मध्य प्रदेश में पहले उमा भारती फिर बाबूलाल गौर और फिर शिवराज सिंह चौहान के रूप में लगातार ओबीसी मुख्यमंत्री बनाया गया। और राजस्थान में वसुंधरा राजे के रूप में सवर्ण मुख्यमंत्री बनाए रखा गया। अब भी भाजपा ने उसी समीकरण को आगे बढ़ाया है। मध्य प्रदेश में मोहन यादव और राजस्थान में भजनलाल शर्मा को सीएम बनाया है। फर्क यह है कि इस बार राजस्थान में राजपूत की बजाय ब्राह्मण सवर्ण चेहरा लाया गया है। वह इसलिए क्योंकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में दो राजपूत मुख्यमंत्री हैं।

सो, तीनों राज्यों में नया या बहुत क्रांतिकारी कुछ होने का जो हल्ला मचा हुआ है असल में वैसा नहीं है। तीनों मुख्यमंत्रियों की ताजपोशी को नएपन के नजरिए से देखने की जरुरत नहीं है, बल्कि इस नजरिए से देखने की जरुरत है कि मोदी और शाह ने जो जोखिम लिया है उसका भाजपा को फायदा होगा या नुकसान। कई जगह पुराने नेताओं को किनारे करके नए चेहरे आगे करने की राजनीति का भाजपा को फायदा हुआ लेकिन कई जगह नुकसान भी हुआ। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश का नुकसान सबके सामने है। हरियाणा में भी भाजपा को नुकसान ही हुआ था और इसलिए एक दूसरी पार्टी से तालमेल करना पड़ा। झारखंड में भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने निश्चित रूप से जोखिम के फैक्टर का विश्लेषण किया होगा।

लेकिन कई बार बहुत वस्तुनिष्ठ विश्लेषण भी गलत साबित हो जाता है। जिन तीन राज्यों में भाजपा ने तीन नए चेहरे उतारे हैं वहां पुराने नेता अब भी सक्रिय हैं और बहुत मजबूत हैं। आगे उनकी राजनीति पर नजर रखने की जरुरत है। दूसरे, कई बड़े नेता ऐसे हैं, जिनको उनकी मर्जी के विपरीत राज्य की राजनीति में उतारा गया है। तीसरे, जाति का संतुलन बनाने में कई जातियां नाराज हुई हैं। ध्यान रहे छत्तीसगढ़ में ओबीसी मुख्यमंत्री कांग्रेस को आदिवासी वोट नहीं दिला पाए। तो जरूरी नहीं है कि भाजपा के आदिवासी मुख्यमंत्री ओबीसी वोट दिला देंगे। इसी तरह राजस्थान में ब्राह्मण, राजपूत और दलित के समीकरण ने दलित, मीणा, गुर्जर, जाट बिगड़ सकते है। इन प्रयोगों के बाद अगला चुनाव लोकसभा का है, जो नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। इसलिए उसमें तो नहीं लेकिन उसके बाद के विधानसभा चुनावों में इन प्रयोगों की सफलता या विफलता का आकलन होगा।

यह भी पढ़ें:

भाजपा और कांग्रेस गठबंधन का अंतर

भाजपा की पहली सूची का क्या संदेश?

Tags :

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें

Naya India स्क्रॉल करें