nayaindia राजनीतिक स्तर पर आरक्षण: सर्वोच्च अदालत की चर्चा
अजीत द्विवेदी

आरक्षण पर एक जरूरी बहस

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राजनीतिक स्तर पर आरक्षण

लोकसभा चुनाव से पहले जहां राजनीतिक स्तर पर आरक्षण की सीमा बढ़ाने या आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था करने की होड़ मची है वहीं दूसरी ओर आरक्षण को लेकर एक बेहद जरूरी बहस सुप्रीम कोर्ट में हो रही है। सर्वोच्च अदालत अपने ही 20 साल पुराने एक फैसले पर सुनवाई कर रही है और समय की जरुरतों को देखते हुए उसे बदलने की संभावना पर विचार कर रही है। यह मसला अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण के अंदर ज्यादा वंचित समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था से जुड़ा है। यह सिर्फ संयोग हो सकता है कि जिस समय पंजाब सरकार का यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए आया उससे ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई है, जो अनुसूचित जातियों के वर्गीकरण की संभावना पर विचार करेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल तेलंगाना विधानसभा चुनाव के समय मडिगा समुदाय की मांग को स्वीकार करते हुए वादा किया था कि उनकी सरकार अनुसूचित जातियों के वर्गीकरण और उनमें ज्यादा वंचित समूहों को आरक्षण के अंदर तरजीह देने की व्यवस्था पर विचार करेगी।

सो, एक तरफ सरकार ने वादा पूरा करते हुए कमेटी बनाई और दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 20 साल पुराने एक फैसले पर सुनवाई शुरू कर दी। सुप्रीम कोर्ट का 20 साल पुराना फैसला यह प्रावधान करता है कि अनुसूचित जाति एक होमोजेनस यानी सजातीय समूह है, जिसके अंदर वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है। ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार व अन्य के मामले में पांच जजों की बेंच ने 2004 में यह फैसला सुनाया था। अब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस बीआर गवई ने समय की जरुरत के हवाले आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर कई अहम बातें कही हैं, जिनसे एक नई बहस शुरू हो गई है। यह एक सार्थक बहस है, जिस पर कोर्ट रूम से बाहर और राजनीतिक व सामाजिक स्पेस में भी चर्चा होनी चाहिए ताकि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की प्रत्यक्ष दिख रही कमियों को दूर किया जा सके।

अगर संवैधानिक प्रावधानों की बात करें, तो उसे आधार बना कर एक पक्ष कहता है कि आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था करना एक तरह का भेदभाव है, जो नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर यह तर्क है कि संविधान सभी नागरिकों के लिए समानता की बात करता है फिर भी अन्य पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति व जनजातियों और गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था कुछ लोगों के साथ भेदभाव करती है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट के 1976 के एनएम थॉमस बनाम केरल सरकार के मामले में आए फैसले के बाद इस तरह का न्यायिक सिद्धांत विकसित हो गया है, जिसमें इस भेदभाव को समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाता है।

देश के पिछड़े, दलित, आदिवासी और वंचित समूहों के लिए एफर्मेटिव एक्शन यानी सकारात्मक पहल के तहत आरक्षण की सुविधा दी गई है। माना गया कि ये समूह कुछ अन्य समूहों की तुलना में सामाजिक, शैक्षणिक या आर्थिक रूप से पिछड़े हैं इसलिए इनको अतिरिक्त सुविधा की जरुरत है। अगर इस तरह का वर्गीकरण संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है तो आरक्षण पाने वाले समूहों के अंदर वर्गीकरण करना और उनमें जो ज्यादा जरुरतमंद हैं उनके लिए अतिरिक्त व्यवस्था करना भी भेदभाव की श्रेणी में नहीं आएगा। समानता के सिद्धांत के बावजूद जिस तर्क से आरक्षण की व्यवस्था लागू है उसी तर्क से आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था भी लागू हो सकती है।

लेकिन इसके लिए सबसे पहले क्वांटिफायबल डाटा यानी ठोस आंकड़ों की जरुरत होगी। उससे पता चलेगा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर किन जातियों को अब तक आरक्षण की व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा मिला है और कौन सी जातियां अपनी सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक पृष्ठभूमि के चलते इससे वंचित रह गई हैं। सैद्धांतिक रूप से इस बात को समझने के लिए बहुत ज्ञानी होने की जरुरत नहीं है। जो जातियां शहर में हैं या जिन जातियों या परिवारों की पहली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ मिला और उनकी स्थिति सुधर गई वे निश्चित रूप से ज्यादा लाभान्वित हुए और जो शुरुआत में ही पिछड़ गए, जो आज भी गावों व छोटे कस्बों में हैं या जंगलों के आसपास हैं वे इसके लाभ से वंचित रह गए। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ अनुसूचित जातियों या जनजातियों में ही है। यह स्थिति पिछड़ी जातियों में भी है और गरीब सवर्णों के आरक्षण में भी है।

पिछड़ी जातियों में आरक्षण के लाभ से वंचित रह गई जातियों के अध्ययन के लिए भारत सरकार ने 2017 में जस्टिस जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। आयोग ने मोटे तौर पर ओबीसी सूची की करीब 27 सौ जातियों को मिले आरक्षण के लाभ का अध्ययन किया है। इसने हैरान करने वाली बातें बताई हैं। इसके मुताबिक ओबीसी के लिए दिए गए 27 फीसदी आरक्षण का 97 फीसदी लाभ सिर्फ 25 फीसदी यानी करीब सात सौ जातियों को मिला है। बाकी 75 फीसदी यानी करीब दो हजार जातियां सिर्फ तीन फीसदी लाभ ले पाई हैं। उसमें भी 983 ओबीसी जातियां ऐसी हैं, जिनको आज तक आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिला है।

यानी इतनी जातियों में आरक्षण के जरिए किसी को न तो सरकारी नौकरी मिली है और न किसी सरकारी संस्थान में दाखिला मिला है। सोचें, यह कितनी बड़ी खामी है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि पारंपरिक पृष्ठभूमि या आरक्षण ने जिन लोगों को सबल बनाया वे और मजबूत होते गए, जबकि एक बड़ा समूह न्यूनतम लाभ से भी वंचित रह गया? हालांकि अभी तक रोहणी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने आरक्षण के अंदर वर्गीकरण की व्यवस्था लागू नहीं की है। बिहार जैसे कुछ राज्यों में जरूर पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था में वर्गीकरण किया गया है लेकिन वहां भी जातियों की पहचान करके उनके लिए विशिष्ठ तौर पर प्रावधान करने की जरुरत है।

बहरहाल, जब पिछड़ी जातियों में शामिल 983 जातियां आरक्षण के किसी भी लाभ से वंचित हैं तो सोच सकते हैं कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों में ऐसी जातियों या उप जातियों की संख्या कितनी ज्यादा होगी? निश्चित रूप से कुछ चुनिंदा समूहों को इसका फायदा मिल रहा है और व्यापक समाज इसके लाभ से वंचित है। इसलिए केंद्र सरकार की पहल और सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस दोनों का स्वागत किया जाना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि यह पूरी बहस एक सार्थक नतीजे पर पहुंचेगी और आरक्षण की व्यवस्था तर्कसंगत बनेगी। अच्छी बात यह है कि पंजाब सरकार, केंद्र सरकार, बहस में शामिल अन्य वरिष्ठ वकील और माननीय जज भी इस बात को महसूस कर रहे हैं कि आरक्षण के अंदर जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति के अनुरूप वर्गीकरण करना और ज्यादा जरुरतमंदों को प्राथमिकता देना समय की जरुरत है।

इसलिए इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन आपत्ति की बात इस सिद्धांत के दूसरे पहलू को लेकर है, जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने और जस्टिस बीआर गवई ने किया और पंजाब के एडवोकेट जनरल गुरमिंदर सिंह ने भी किया। इन्होंने कहा है कि जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और जिनकी स्थिति बेहतर हो चुकी है वे आरक्षण से बाहर निकलें और सामान्य वर्ग के साथ प्रतिस्पर्धा करें। इसे लेकर आपत्ति उठाई जा रही है और अगर इसे लेकर कोई फैसला होता है तो उसका विरोध भी होगा। उसे आरक्षण छीनने की कोशिश बताया जाएगा। इसलिए इस संवेदनशील मामले को सरकार व संसद के ऊपर छोड़ देना चाहिए।

लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट 2004 के फैसले को पलट दे तो वह अपने आप में बड़ी बात होगी। ध्यान रहे पंजाब सरकार ने अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के अपने 2006 के कानून में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की है, जिसमें वाल्मिकी और मजहबी सिखों को प्राथमिकता दी है। पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट ने इस कानून को 2004 के ईवी चिन्नैया केस के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए खारिज कर दिया है। अब अगर सुप्रीम कोर्ट 2004 के फैसले को बदल देता है तो आरक्षण के अंदर वर्गीकरण का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन इसके साथ ही यह निर्देश भी दिया जाना चाहिए कि केंद्र और राज्य अपने अपने स्तर पर इस बात का अध्ययन कराएं कि किन जातियों को ज्यादा लाभ मिला है और कौन सी जातियां या उप जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। और उस आंकड़े के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था को लागू करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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