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मुफ्त की रेवड़ी पर रोक की जरूरत

चुनाव

चुनावों से पहले मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं बांटने की घोषणाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हिचक के साथ ही सही लेकिन एक पहल की है। अदालत ने मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार के साथ साथ केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक को नोटिस जारी किया है। हालांकि अदालत के मन में एक दुविधा है, जिसे उसने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जाहिर किया। सर्वोच्च अदालत ने सवालिया लहजे में कहा कि क्या चुनावी वादों पर नियंत्रण किया जा सकता है? यह बहुत जायज सवाल है और इस पर बहस भी सनातन है। जब भी मुफ्त की रेवड़ी की बात होती है तो यह सवाल उठता है कि किस चीज को मुफ्त की रेवड़ी कहेंगे और किस चीज को लोक कल्याण की योजना कहेंगे?

हर सरकार और पार्टी अपनी योजना को लोक कल्याण की योजना बताती है और कहती है कि भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है, जिसमें सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता की समस्याओं को दूर करे और जरूरतों को पूरा करे। लेकिन सवाल है कि क्या मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं बांटने से जनता की बुनियादी समस्याएं दूर हो रही हैं? हकीकत यह है कि इससे कुछ लोगों की तात्कालिक समस्याओं का समाधान तो मिलता है लेकिन समस्याओं के स्थायी निराकरण की संभावना समाप्त हो जाती है। देश या राज्य के ढांचागत विकास की प्रक्रिया इससे रूक जाती है क्योंकि पार्टियां और सरकारें चुनाव जीतने के एक आसान फॉर्मूले के तौर पर मुफ्त की रेवड़ी का इस्तेमाल करने लगती हैं। वे ढांचागत विकास और रोजगार पैदा करने वाली योजनाओं पर सोचना बंद कर देती हैं।

मुफ्त की रेवड़ी बांटने की सीधा असर राज्यों की अर्थव्यस्था पर पड़ता है। इससे एक ऐसा दुष्चक्र बनता है, जिसमें से राज्यों का निकलना दिनों-दिन मुश्किल होता जाता है। हर राज्य मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं बांटने की अपनी योजना पर अपने बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं, जिससे उनका घाटा बढ़ता जाता है। घाटा पूरा करने के लिए सरकारों को बेतहाशा कर्ज लेना होता है और जैसे जैसे कर्ज बढ़ता है वैसे वैसे कर्ज का ब्याज चुकाने पर होने वाला खर्च बढ़ता है। आज स्थिति यह है कि ज्यादातर राज्यों के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होता है। पंजाब के ऊपर अपने सकल घरेलू उत्पाद के 48 फीसदी के बराबर कर्ज है।

राजस्थान पर 40 फीसदी और मध्य प्रदेश के ऊपर जीडीपी के 29 फीसदी के बराबर कर्ज है, जबकि यह जीडीपी के 20 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। भारी-भरकम कर्ज का नतीजा यह है कि पंजाब अपनी कमाई का 20 फीसदी हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च करता है। मध्य प्रदेश भी अपनी कमाई का 10 फीसदी हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च करता है। हरियाणा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी कुल बजट आवंटन का 20 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होता है। भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 15 राज्य ऐसे हैं, जिनके ऊपर उनकी जीडीपी के 30 फीसदी से ज्यादा कर्ज है।

राज्यों के ऊपर कर्ज इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि उनको मिलने वाले राजस्व के मुकाबले उनके खर्च ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं और खर्च बढ़ने का एक बड़ा कारण मुफ्त की चीजें और सेवाओं बांटने की होड़ है। इस साल मई में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुआ तो कांग्रेस ने पांच गारंटी के तहत महिलाएं, युवाओं, किसानों सबको खुले हाथ से नकदी बांटने का ऐलान किया। कई सेवाएं मुफ्त में देने की घोषणा की।

चुनाव जीतने के बाद जब आकलन हुआ तो पता चला कि मुफ्त की चीजें और सेवाएं बांटने की घोषणा को पूरा करने में हर साल करीब 55 हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। इसे पूरा करने का नतीजा यह होगा कि राज्य का घाटा आठ फीसदी तक बढ़ेगा, जिसे पूरा करने के लिए उसे कर्ज लेना होगा। ऐसे ही पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद बिजली सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी हुई है। वह 20 हजार करोड़ रुपए के करीब पहुंच गई है। आप सरकार ने कई और वस्तुएं और सेवाएं मुफ्त में देनी शुरू की है, जिससे उसका घाटा 45 फीसदी तक बढ़ सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक कई राज्य मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं देने की अपनी घोषणा पूरी करने के लिए अपनी कमाई का 35 फीसदी तक हिस्सा खर्च कर रही हैं। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड आदि राज्य इस सूची में आते हैं। इनमें सबसे कम आठ फीसदी खर्च राजस्थान में होता है और सबसे ज्यादा 35 फीसदी पंजाब में। झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे गरीब राज्य भी क्रमशः 27 और 24 फीसदी खर्च करते हैं।

मुश्किल यह है कि राज्य एक बार मुफ्त में चीजें और सेवाएं देने की घोषणा करने के बाद चुप होकर नहीं बैठ जाते हैं। वे हर चुनाव में नई घोषणाएं करते हैं। हर चुनाव में पहले से ज्यादा बड़ी घोषणा की जाती है। जैसे अभी खबर है कि केंद्र सरकार किसान सम्मान निधि की रकम को बढ़ाने जा रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय हर साल किसानों के खाते में छह हजार रुपए डालने की योजना शुरू हुई थी और पांच साल बाद सरकार उसको बढ़ा कर आठ हजार रुपए करने जा रही है। मुफ्त में पांच किलो अनाज देने की योजना भी 31 दिसंबर के बाद बढ़ाई ही जाएगी। उधर राज्यों में नकद पैसे बांटने और मुफ्त में बिजली, पानी, बस सेवा आदि देने की होड़ अलग मची है।

तभी ऐसा लग रहा है कि अब समय आ गया है कि इस तरह की घोषणाओं पर रोक लगाई जाए। लोक कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ी के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची जाए। इसमें यह ध्यान रखना होगा कि किसी के साथ पक्षपात न हो। यह नहीं होना चाहिए कि केंद्र सरकार किसानों को नकद पैसे दे या अनाज मुफ्त में दे या रसोई गैस का सस्ता सिलेंडर दे तो उसे लोक कल्याण की योजना माना जाए और किसी दूसरी पार्टी की सरकार महिलाओं को नकद पैसे दे या बिजली व पानी मुफ्त में या सस्ती दर पर दे तो उसे मुफ्त की रेवड़ी माना जाए! ऐसा होने पर स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा प्रभावित होगी। सर्वोच्च अदालत, चुनाव आयोग और भारतीय रिजर्व बैंक को केंद्र व राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों की सहमति से इस मामले में नियम तय करने चाहिए।

सरकारों का कर्तव्य सामूहिक कल्याण सुनिश्चित करने का है, लेकिन दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय से उसे निजी कल्याण में बदल दिया गया है। एक निश्चित समूह को लक्ष्य करके मुफ्त में चीजें और सेवाएं बांटी जा रही हैं और वोट सुनिश्चित किया जा रहा है। गरीबों को दो सौ यूनिट तक बिजली फ्री करके मध्य वर्ग और अमीरों से उसकी ज्यादा कीमत वसूली जा रही है।

इसकी बजाय सरकारें बिजली का उत्पादन बढ़ा कर और वितरण बेहतर करके सबके लिए उसकी कीमत सस्ती कर सकती है। लेकिन इसका तात्कालिक लाभ नहीं मिलेगा। दिल्ली की जो सरकार हर घर में पीने का साफ पानी सुचारू रूप से नहीं पहुंचा सकती है वह पानी मुफ्त में देने की योजना का चुनावी लाभ ले रही है। सोचें, लोक कल्याणकारी राज्य भारत में देश की ज्यादातर आबादी को नल से जल नहीं मिलता है। यानी पीने का साफ परिष्कृत पानी नहीं मिल पाता है, जबकि यह सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी बनती है।

बहरहाल, अगर सरकारें ढांचागत विकास के रास्ते पर चलेंगी तो उसे फलीभूत में होने में समय लगेगा। इसलिए पार्टियां शॉर्टकट अपनाती हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि ढांचागत विकास ठप्प हो गया है। रोजगार सृजन करने वाली योजनाओं पर काम नहीं हो रहा है। अगर सरकारें गंभीरता दिखाएं तो उनके सामने इसी देश के एक राज्य केरल की मिसाल है, जहां एक के बाद एक बनी सरकारों ने चाहे वह कांग्रेस की सरकार हो या लेफ्ट की उसने संरचनागत विकास पर ध्यान दिया। इसका नतीजा यह है कि वहां मुफ्त में कुछ भी बांटने की जरूरत नहीं होती है। वहां शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक की सुविधाएं सबसे बेहतर हैं। केरल में सरकार मुफ्त में चीजें बांटने पर बजट का 0.1 फीसदी खर्च करती है। सोचें, कहां किसी राज्य में 35 फीसदी खर्च होता है और कहां एक राज्य में एक फीसदी का दसवां हिस्सा खर्च होता है!

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