nayaindia डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर: आधुनिक राजनीति का आदर्श
अजीत द्विवेदी

वीपी सिंह नए अम्बेडकर हैं!

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डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर इस समय भारतीय राजनीति और कुछ हद तक समाज के भी सबसे बड़े आईकॉन हैं। छह दिसंबर को उनको महापरिनिर्वाण दिवस पर संसद में उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करने की जैसी कतार लगी वह मिसाल है। पहले सिर्फ कांशीराम और मायावती को उनकी जरुरत थी या रिपब्लिकन पार्टी के अलग अलग धड़े उनके नाम की माला जपते थे। लेकिन अब सबको उनकी जरुरत है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने तो सरकारी कार्यालयों में महात्मा गांधी की तस्वीरें उतरवा कर अम्बेडकर की तस्वीरें लगा दी हैं।

बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यू ने भीम संसद यात्रा निकाली और 26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर पटना में भीम संसद रैली की। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने डॉक्टर अम्बेडकर की तस्वीरों के साथ दलित गौरव यात्रा निकाली। कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों के साथ-साथ प्रादेशिक पार्टियां और दलित राजनीति में उभर रहे नए युवा चेहरे भी उनके नाम की राजनीति कर रहे हैं। डॉक्टर अम्बेडकर इस समय वोट दिलाने वाला सबसे प्रभावी नाम हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि यह स्थिति हमेशा थी। आजादी से पहले डॉक्टर भीमराव अम्बेडकरर ने दलित और उसके साथ साथ तमाम पिछड़े और वंचित समूहों के लिए बहुत काम किया। उन्होंने आजादी की लड़ाई के समानांतर दलितों, पिछड़ों, वंचितों की लड़ाई लड़ी और संविधान में उनको अधिकार दिलाए। लेकिन आजादी के बाद अम्बेडकर बड़ी राजनीतिक शख्सियत नहीं बन पाए। वे हर बार लोकसभा का चुनाव हारे। नेहरू की कृपा से सांसद और मंत्री बने फिर नाराज होकर इस्तीफा भी दिया। हालांकि तब भी वे दलित उत्थान की अपनी राजनीति करते रहे। निधन के बाद कोई तीन दशक तक वे इतिहास की अतल गहराइयों में दबे रहे।

अस्सी के दशक में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया और जय भीम के नारे के साथ राजनीति शुरू की तो डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के योगदान पर चर्चा शुरू हुई। हालांकि वह भी कम मुश्किल काम नहीं था। कांशीराम और मायावती उतर प्रदेश के गांवों में अम्बेडकर की मूर्तियां लगाते थे और जातीय अहंकार में कही ऊंची जाति के लोग तो कहीं पिछड़ी जाति के लोग उन्हें तोड़ देते थे। समय का चक्र ऐसा चला कि इस साल अक्टूबर में अमेरिका के मेरीलैंड में डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की 19 फीट ऊंची प्रतिमा लगी, जिसे स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी का नाम दिया गया और 26 नवंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट में उनकी मूर्ति का अनावरण किया।

डॉक्टर अम्बेडकर के बारे में इतनी लंबी भूमिका लिखने का मकसद यह जानकारी सामने लाना है कि इतिहास की अतल गहराइयों से उनको निकाल कर भावी इतिहास के पहले पन्ने पर लाने वालों में कांशीराम और मायावती के अलावा तीसरे व्यक्ति विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ वीपी सिंह थे, जिनके प्रधानमंत्री रहते मार्च 1990 में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। अब स्थितियां ऐसी बनी हैं कि अपने आप यह सवाल उठ रहा है कि क्या इतिहास अपने को दोहराएगा?

बिल्कुल डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की तरह इतिहास की अतल गहराइयों में दबा दिए गए वीपी सिंह के भी दिन लौटेंगे और देश पिछड़ों के उत्थान के लिए किए गए उनके फैसले को याद करेगा और उन्हें सम्मानित करेगा? वीपी सिंह ने बरसों से दबी मंडल आयोग की रिपोर्ट को झाड़-पोंछ कर निकाला था और उसे लागू कर दिया था। उन्होंने देश की 52 फीसदी पिछड़ी आबादी को सरकारी संस्थानों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की। इसके लिए उन्हें अपनी सत्ता गंवानी पड़ी और अपने ही समाज के लोगों के बीच अपमानित होना पड़ा। लेकिन उनका वह फैसला देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाला साबित हुआ।

वीपी सिंह ने जो काम डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के लिए किया था लगभग उसी तरह का काम डीएमके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वीपी सिंह के लिए किया है। स्टालिन ने पिछड़ों का मसीहा और उद्धारक बताते हुए चेन्नई में उनकी मूर्ति लगवाई है। यह एक बार फिर देश की राजनीति में आने वाले बदलाव और उसमें वीपी सिंह की मौजूदगी के नए दौर की शुरुआत है। जिस तरह वीपी सिंह ने भांप लिया था कि अब अम्बेडकर की राजनीति का समय आ रहा है उसी तरह स्टालिन को पता चल गया है कि अब वीपी सिंह की राजनीति का समय आ रहा है।

पूरे देश में पिछड़ी जातियां जिस अदांज में अपनी सामाजिक पहचान उजागर करके अपना स्वाभाविक स्पेस हासिल कर रही हैं और सामाजिक पहचान को राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर रही हैं उससे लग रहा है कि उनको भी उसी तरह एक मसीहा की जरुरत है, जैसे अस्सी-नब्बे के दशक में दलित समूहों की थी। उस जरुरत की पूर्ति डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर से हुई तो मौजूदा जरुरत की पूर्ति वीपी सिंह से हो सकती है।

ध्यान रहे इस समय पूरे देश में पिछड़ी जातियों की सामाजिक व राजनीतिक चेतना उभार पर है। बिहार में जाति गणना के आंकड़े सामने आने और उस आधार पर आरक्षण की सीमा बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले से सोशल डायनेमिक्स और राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलेंगे। इसे भांप पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूरे देश में जाति गणना कराने का वादा कर रहे हैं और उन्होंने राममनोहर लोहिया, कांशीराम आदि की तर्ज पर एक नारा दिया है- जितनी आबादी उतना हक।

आबादी के अनुपात में दलितों को उनका हक दिलाने की शुरुआत अगर डॉक्टर अम्बेडकर ने की थी तो पिछड़ों को उनका हक दिलाने की शुरुआत वीपी सिंह ने की। हो सकता है कि अम्बेडकर के साथ दलित समुदाय जैसा आत्मिक जुड़ाव महसूस करता है वैसा वीपी सिंह के साथ पिछ़ड़ी जातियां नहीं महसूस करें इसके बावजूद पार्टियों की राजनीतिक मजबूरी वीपी सिंह को व्यापक समाज में स्वीकृति और वह स्थान दिला सकती है, जिसके वे सचमुच हकदार थे। वे ठाकुर समाज से थे और राज परिवार से आते थे लेकिन आजाद भारत के पहले नेता था, जिनके लिए यह नारा लगा कि ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’।

भारत की तकदीर एक बार फिर अपनी दिशा बदल रही है। हो सकता है कि इससे स्थापित सामाजिक व्यवस्था टूटती दिखे लेकिन जब इसमें ठहराव आएगा तो हो सकता है कि उसके नतीजे सुखद हों। आज पारंपरिक रूप से दबंग और अगड़ी मानी जाने वाली जातियां अपने को पिछड़ों में शामिल कराने की लड़ाई लड़ रही हैं और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल रही है। अगर जाटों, मराठों और यहां तक की बिहार के भूमिहारों को भी पिछड़ी जाति में शामिल होना है तो यह कोई मामूली बात नहीं है। इसका मतलब है कि भारतीय समाज में कोढ़ की तरह मौजूद अगड़ी-पिछड़ी और दलित जातियों का ढांचा टूट सकता है। जिस सामाजिक समरसता के लिए समाज सुधारक और कई सांस्कृतिक-धार्मिक संगठन दशकों से काम करते रहे वह जाति गणना, आरक्षण की सीमा बढ़ाने और वीपी सिंह के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लौटने से हासिल हो सकता है।

एमके स्टालिन ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को बुला कर प्रतिमा का अनावरण कराया तो वह सिर्फ इसलिए नहीं था कि अखिलेश उत्तर प्रदेश के हैं और वीपी सिंह भी उत्तर प्रदेश के थे। वह इसलिए था क्योंकि अखिलेश मंडल की राजनीति से निकली पार्टी के नेता हैं। वे देश के सबसे बड़े प्रदेश में पिछड़ी जातियों की राजनीति का प्रतिनिधि चेहरा हैं। अब अखिलेश उस मुहिम को आगे बढ़ाएंगे, जिसे स्टालिन ने शुरू किया है और धीरे धीरे मंडलवादी राजनीति की सभी पार्टियां ऐसा ही करेंगी। मजबूरी में कांग्रेस और भाजपा को भी इस राजनीति को आगे बढ़ाना होगा। कांग्रेस निजी कारणों से वीपी सिंह के प्रति द्वेष भाव रखती है। लेकिन पिछड़ों के हक की बात करने और उनकी राजनीति करने के लिए देर-सबेर वीपी सिंह को याद करना ही होगा।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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