प्रधानमंत्री मोदी ने खाड़ी में जंग से ठिक पहले इज़राइल की संसद केनेस्सेट में खड़े होकर भारत-इज़राइल संबंधों को “विशेष सामरिक साझेदारी” तक बढ़ाने की घोषणा कर 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा ज़रूरत से जुआं खेला। ड्रोन और निगरानी प्रणालियों को उस तेल जीवनरेखा पर प्राथमिकता दी जिस पर भारत का जनजीवन निर्भर है। इजराइल यात्रा का निर्णय आज रणनीतिक साहस से कम और एक गंभीर भूल अधिक दिखता है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान की जवाबी कार्रवाई से टैंकरों की आवाजाही लगभग रेंगती हुई है, बीमा प्रीमियम में उछला हैं और ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत फिर 100 डॉलर के आसपास मंडरा रही है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता भारत के लिए यह दूर का भू-राजनीतिक संकट नहीं है। यह उस ईंधन पर सीधा वार है जिससे पंजाब के ट्रैक्टर चलते हैं, बिहार की बसें दौड़ती हैं और 1.4 अरब लोगों की रसोई जलती है।
यह सब उस समय हो रहा है जब कुछ ही हफ्ते पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल की संसद केनेस्सेट में खड़े होकर भारत-इज़राइल संबंधों को “विशेष सामरिक साझेदारी” तक बढ़ाने की घोषणा कर चुके थे और कह चुके थे कि भारत इज़राइल के साथ “दृढ़ता से” खड़ा है। समय का यह मेल दुर्भाग्य नहीं था। यह उस दशक भर के झुकाव का परिणाम था जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित सैन्य तकनीकों के बदले गिरवी रख दिया गया।
भारत ने अपनी शहरी अभिजात वर्ग को आकर्षित करने वाले ड्रोन और निगरानी प्रणालियों को उस तेल जीवनरेखा पर प्राथमिकता दी जिस पर आम जनता निर्भर है। यह निर्णय आज रणनीतिक साहस से कम और एक गंभीर भूल अधिक दिखता है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 89 प्रतिशत आयात करता है—करीब 58 लाख बैरल प्रतिदिन। नीति निर्माताओं ने वर्षों तक स्रोतों के विविधीकरण की बात की, और 2022 के बाद रूस के सस्ते उरल्स तेल ने झटका भी कम किया। लेकिन 2026 की शुरुआत में, जब वाशिंगटन से दबाव बढ़ा, नई दिल्ली ने चुपचाप रूसी तेल की मात्रा घटा दी। इसके बाद खाड़ी आपूर्तिकर्ता—इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत—फिर से भारत की टोकरी का आधे से अधिक हिस्सा बन गए, और यह तेल लगभग पूरा का पूरा होर्मुज़ की संकरी जलधारा से होकर गुजरता है।
जब 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल हमले में ईरान के शीर्ष नेतृत्व की हत्या हुई, तब भारत 1973 के तेल संकट के बाद सबसे अधिक जोखिम में खड़ा था।
लेकिन दांव केवल तेल का नहीं है। खाड़ी देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं—दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय। उनकी कमाई से आने वाला धन भारत-इज़राइल व्यापार से कहीं अधिक है। उनकी सुरक्षा और रोज़गार स्थिर अरब राजतंत्रों पर निर्भर हैं, न कि इज़राइली हथियार प्रणालियों पर। फिर भी मोदी के केनेस्सेट भाषण ने दुनिया को यह संकेत दिया कि भारत की प्राथमिकताएँ कहीं और हैं।
जिस वैश्विक दक्षिण में भारत कभी नैतिक नेतृत्व का दावा करता था, वहाँ इस भाषण को एक टूटन की तरह देखा गया।
यह विचारधारा का सवाल नहीं है। यह गणित का सवाल है।
भारत-इज़राइल व्यापार लगभग पाँच अरब डॉलर का है। मोदी की यात्रा के दौरान घोषित रक्षा समझौते 8.6 से 10 अरब डॉलर तक बताए गए। उपयोगी हैं—हेरॉन ड्रोन और बाराक मिसाइलें पाकिस्तान और चीन के खिलाफ सामरिक लाभ देती हैं। साथ ही वे उन लगभग दस करोड़ शहरी भारतीयों को संतुष्ट करती हैं जो अंग्रेज़ी मीडिया देखते हैं और ताकत के प्रदर्शन पर गर्व करते हैं।
लेकिन 1.4 अरब लोगों के देश के लिए यह विलासिता है, जीवनरेखा नहीं।
असमानता साफ है। कच्चे तेल की कीमत में हर एक डॉलर की वृद्धि भारत के आयात बिल में लगभग दो अरब डॉलर जोड़ देती है। होर्मुज़ में लंबा व्यवधान महँगाई बढ़ा सकता है, रुपया कमजोर कर सकता है और सब्सिडी का बोझ बढ़ा सकता है—जिसका सबसे अधिक असर ग्रामीण गरीबों पर पड़ता है।
एलपीजी आयात और भी नाजुक है। इसका 80 से 85 प्रतिशत खाड़ी से आता है और करोड़ों भारतीय परिवार अब भी रियायती सिलेंडरों पर निर्भर हैं। रक्षा क्षेत्र में “आत्मनिर्भरता” का जश्न मनाने वाली सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को उस संघर्ष के सामने खुला छोड़ दिया जिसे उसने समय और चुप्पी से वैधता दी।
असल विफलता कूटनीतिक विश्वसनीयता की है।
दशकों तक भारत ने संतुलन साधा। 1988 में फ़िलिस्तीन को मान्यता दी, ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह पर काम किया, संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम के पक्ष में वोट दिया और साथ ही चुपचाप इज़राइल से हथियार खरीदे। यह संतुलन सम्मान दिलाता था।
2014 के बाद “डी-हाइफनेशन” की नीति—इज़राइल को सामान्य साझेदार की तरह देखना—सिद्धांततः सही थी। व्यवहार में यह धीरे-धीरे दिखावे की साझेदारी बन गई। 2017 की मोदी यात्रा संतुलित थी; 2026 की यात्रा, युद्ध की पूर्वसंध्या पर, लापरवाह दिखी।
भारत ने सुरक्षा परिषद में ईरान-विरोधी प्रस्तावों का समर्थन किया, जबकि संयम की अपील बहुत हल्की रही। परिणाम यह हुआ कि वैश्विक दक्षिण में भारत अब कई देशों को बहुमत की आवाज़ नहीं, बल्कि शक्तिशाली देशों की गूंज जैसा लगता है।
इस युद्ध ने एक और मिथक भी तोड़ा है—अमेरिका और इज़राइल की अजेयता का मिथक। रूस की तकनीक और चीन की कूटनीति के समर्थन के साथ ईरान ढहा नहीं है। उसने क्षैतिज जवाब दिया है—खाड़ी में हमले, समुद्री यातायात बाधित करना और अमेरिकी ठिकानों को खाली कराना।
जिस नेतृत्व-वध हमले को कुछ भारतीय टिप्पणीकारों ने उत्साह से देखा, उसी ने युद्ध को लंबा कर दिया। इज़राइल की वैश्विक छवि सिकुड़ गई है। पश्चिमी देशों में जनमत बदल रहा है। अमेरिका में भी पुरानी धारणाएँ चुनौती झेल रही हैं।
भारत ने क्षण को गलत पढ़ा।
उसने मान लिया कि अमेरिकी शक्ति और इज़राइली खुफिया क्षमता स्थायी हैं। दोनों कमजोर निकलीं। तकनीक नेताओं को मार सकती है, लेकिन उनके मरने के बाद उठने वाले राष्ट्रवाद का अनुमान नहीं लगा सकती।
भारत के लिए सबक और कठोर है।
जहाँ 80 करोड़ लोग प्रतिदिन 3.65 डॉलर से कम पर जीवन जीते हैं, वहाँ अभिजात साहसिकता का खर्च देश नहीं उठा सकता। टीवी स्टूडियो और थिंक टैंक में बैठी “दस करोड़ भारत” की आकांक्षी शहरी दुनिया तकनीकी गठबंधनों से महाशक्ति बनने का सपना देखती है। लेकिन 1.4 अरब लोगों का भारत सस्ता ईंधन, स्थिर प्रवासी आय और खाद्य सुरक्षा चाहता है।
विदेश नीति को उसी भारत की सेवा करनी चाहिए।
अब नई दिल्ली को क्या करना चाहिए?
नाटकीय पलटाव नहीं—वह घबराहट का संकेत होगा। लेकिन सावधानी से दिशा-सुधार जरूरी है।
पहला, ऊर्जा यथार्थवाद। रूसी आयात बढ़ाना—मार्च में वे पहले ही 50 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अमेरिकी आपूर्ति से स्रोतों का विस्तार करना होगा। रणनीतिक भंडार 74 दिनों से आगे बढ़ाना होगा।
दूसरा, कूटनीतिक मरम्मत। ईरान के साथ संवाद फिर शुरू करना होगा। चाबहार मध्य एशिया तक पहुँच की कुंजी है। खाड़ी देशों को भरोसा देना होगा।
तीसरा, वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व फिर पाना होगा।
अंत में, घरेलू ईमानदारी। महाशक्ति बनने का सपना अपनी जगह है, लेकिन उसे राष्ट्रीय हित का मुखौटा नहीं बनना चाहिए। महान रणनीति फोटो अवसरों से नहीं मापी जाती। वह इस बात से मापी जाती है कि डीज़ल की कीमत स्थिर रहती है या नहीं, प्रवासी धन आता रहता है या नहीं, और सबसे गरीब भारतीय बिना डर के खाना पका सकते हैं या नहीं।
महाशक्तियाँ अक्सर गलत जीवनरेखा पर दांव लगाने की कीमत चुकाती हैं। भारत को इज़राइली तकनीक छोड़ने की जरूरत नहीं है। उसे केवल इतना याद रखना होगा कि अधिकांश भारतीयों के लिए असली रणनीतिक संपत्ति आसमान में उड़ता ड्रोन नहीं, बल्कि टैंक में भरा ईंधन और खाड़ी में स्थिरता है।
चुनाव कभी ड्रोन बनाम तेल का नहीं था।
चुनाव हमेशा अभिजात वर्ग और राष्ट्र के बीच था।
अब समय राष्ट्र को चुनने का है।


