nayaindia Dr. Rajendra Prasad भाषा, संस्कृति के प्रति समर्पित रहे डॉ.राजेंद्र प्रसाद
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भाषा, संस्कृति के प्रति समर्पित रहे डॉ.राजेंद्र प्रसाद

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ग्रामीण भारत,सनातन संस्कृति,मातृभाषा भोजपुरी से प्रेम,संविधान सभा के अध्यक्ष,दो दो बार राष्ट्रपति,स्वतंत्रता सेनानी,गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनुयायियों में एक महान राजेंद्र बाबू जी की चरित्र गाथा युगों युगों तक भारत वर्ष की आने वाली पीढ़ियों को उत्प्रेरित करती रहेंगी।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी का नाम लेते ही मन मस्तिष्क में एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि झिलमिलाने लगती है, जिसकी सादगी,विद्वता, सरलता,श्रेष्ठता के अनेकों किस्से देश की स्मृतियों में जीवंत बने हुए हैं।इनकी इसी छवि के कारण इन्हें ‘सादा जीवन,उच्च विचार’ के कहावत के सटीक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन्हें तीव्र बुद्धिमान सफल छात्र के रूप में भी आम लोक मानस में सदैव याद किया जाता है। हर शिक्षक,हर परिवार अपनी संतान को डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी जैसा विधार्थी बनाने का स्वप्न देखता है।

राजेंद्र प्रसाद का जन्म तीनदिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले में हुआ था। 1907 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद,उन्होंने कलकत्ता लॉ कॉलेज में कानून की पढ़ाई की और कलकत्ता उच्च न्यायालय में अभ्यास किया। इसी पढ़ाई के दौरान एक किस्सा बहुत चर्चित है कलकत्ता विश्वविद्यालय,वर्ष 1906 में उनकी पढ़ाई के दौरान एक परीक्षक ने राजेंद्र बाबू को परीक्षक से बेहतर बताया था और कॉपी मूल्यांकन के दौरान ‘एग्जामिनी इज बेटर देन एग्जामिनर’लिख दिया था। बाद में,वे पटना उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हो गए, जहा उन्होंने बिहार लॉ वीकली की स्थापना की। 1920 के दशक की शुरुआत में,वे एक हिंदी साप्ताहिक ‘देश’ और एक अंग्रेजी द्विसाप्ताहिक, ‘सर्चलाइट’ के संपादक बने।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1911 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने थे और बाद में तीन बार इसके अध्यक्ष रहे। उन्होंने 1920 में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए अपना कानूनी करियर छोड़ दिया और 1931 में नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए। 1946 में,राजेंद्र प्रसाद खाद्य और कृषि मंत्री के रूप में भारत की अंतरिम सरकार में शामिल हुए।कृषि उत्पादन को अधिकतम करने में दृढ़ विश्वास रखने वाले के रूप में,उन्होंने “अधिक भोजन उगाओ” का नारा दिया था।

उन्हें बिहार प्रांत से संविधान सभा के सदस्य के रूप में चुना गया, जहां उन्होंने 1946 से 1950 तक संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। इस दौरान, वे चार समितियों के अध्यक्ष भी थे। संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका में वस्तुनिष्ठता,निष्पक्षता, धैर्य और बुद्धिमत्ता के गुणों के लिए उनकी हमेशा प्रशंसा की गई। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार श्री राम बहादुर राय ने संविधान निर्माण के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा की गई गुप्त टिप्पणियों के आधार पर पुस्तक लिखी है, जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमोचन किया था इसमें कुछ ऐसी अनकही कहानियां है जो देश को जानना चाहिए। 24 जनवरी 1950 को,संविधान सभा के आखिरी सत्र में,डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी को भारत के राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए फिर से चुने जाने वाले एकमात्र राष्ट्रपति होने का गौरव प्राप्त हुआ।

एक घटना, जिसका जिक्र जरूरी समझता हूं कि अपनी मातृभाषा भोजपुरी के प्रति डॉ.राजेंद्र प्रसाद जी का कितना गहरा लगाव था वो इस घटना से उधृत होता है। प्रसिद्ध सिने अभिनेता नासिर हुसैन की भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी से आकस्मिक मुलाकात के परिणामस्वरूप देश की पहली भोजपुरी फिल्म, कालजयी “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” बनी। फिल्म विद्वान और आलोचक आलोक कहते हैं,राष्ट्रपति होने के बावजूद,राजेंद्र बाबू हमेशा भोजपुरी भाषी क्षेत्रों के लोगों से अपनी मातृभाषा में बात करते थे और जब नासिर साहब उनसे मिले,तो उन्होंने भोजपुरी भाषा में एक फिल्म निर्माण की इच्छा व्यक्त की थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले हुसैन साहब के लिए ये मुलाकात एक उत्प्रेरक साबित हुई, जिसने एक सपने को जुनून में बदलने में मदद की।

कुमकुम अभिनीत और लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाजों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों वाली यह फिल्म 1963 में आलोचनात्मक और व्यावसायिक प्रशंसा के साथ रिलीज हुई थी,जो आज भी भोजपुरी समाज और सिनेमा के लिए गौरव का विषय है। 1962 में अपने गिरते स्वास्थ्य के कारण सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त होने के बाद देशरत्न राजेंद्र बाबू को ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया। अपने अंतिम दिन पटना के सदाकत आश्रम में बिताने के बाद 28 फरवरी 1963 को उनका स्वर्गवास हुआ। ग्रामीण भारत,सनातन संस्कृति,मातृभाषा भोजपुरी से प्रेम,संविधान सभा के अध्यक्ष,दो दो बार राष्ट्रपति,स्वतंत्रता सेनानी,गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनुयायियों में एक महान राजेंद्र बाबू जी की चरित्र गाथा युगों युगों तक भारत वर्ष की आने वाली पीढ़ियों को उत्प्रेरित करती रहेंगी।(लेखक विश्व भोजपुरी सम्मेलन संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष और साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य,भोजपुरी भाषा,संस्कृति, इत्यादि विषयों के जानकार हैं।)

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