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बदलता भारत, झुकता विश्व

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भारत 1947 में राजनीतिक, 1991 में आर्थिक, तो 2014 में सांस्कृतिक रूप से स्वतंत्र हुआ है। भले ही अंग्रेज 1947 में देश छोड़कर चले गए थे, परंतु कालांतर में गुलाम और बाह्य मानसिकता से प्रेरित वर्ग (राजनीतिज्ञ-नौकरशाह) के हाथों देश का नेतृत्व चला गया, जिसमें अपनी मूल सनातन संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली के प्रति घृणा का भाव था। उसी औपनिवेशिक दृष्टिकोण की एक-एक कड़ी को ध्वस्त करके वर्तमान मोदी सरकार सुदृढ़ आर्थिक प्रगति के साथ भारत को उसकी मौलिक सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।

हालिया मालदीव प्रकरण का निहितार्थ क्या है? यह ठीक है कि मालदीव पांच लाख की आबादी वाला सूक्ष्म इस्लामी देश है, जिसकी आर्थिकी मुख्यत: पर्यटन पर निर्भर है। वह भारत रूपी बड़ी आर्थिक शक्ति के समक्ष किसी भी मामले में नहीं टिकता। परंतु जिस प्रकार मालदीव सरकार के मंत्रियों द्वारा प्रकट भारत-मोदी विरोधी वक्तव्यों के खिलाफ देश का बड़ा वर्ग एकजुट होकर खड़ा हुआ— वह वैश्विक विमर्श में भारत की बढ़ती शक्ति, राष्ट्र के रूप में भारत की एकता, अखंडता और उसकी सुरक्षा व सम्मान के प्रति सजगता को रेखाकिंत करता है। आखिर इस आमूलचूल परिवर्तन का कारण क्या है? कहा जा सकता है कि भारत 1947 में राजनीतिक, 1991 में आर्थिक, तो 2014 में सांस्कृतिक रूप से स्वतंत्र हुआ है। भले ही अंग्रेज 1947 में देश छोड़कर चले गए थे, परंतु कालांतर में गुलाम और बाह्य मानसिकता से प्रेरित वर्ग (राजनीतिज्ञ-नौकरशाह) के हाथों देश का नेतृत्व चला गया, जिसमें अपनी मूल सनातन संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली के प्रति घृणा का भाव था। उसी औपनिवेशिक दृष्टिकोण की एक-एक कड़ी को ध्वस्त करके वर्तमान मोदी सरकार सुदृढ़ आर्थिक प्रगति के साथ भारत को उसकी मौलिक सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। मालदीव के भारत-विरोधी चिंतन के खिलाफ देश के बहुत बड़े वर्ग का प्रतिकार— इसी उपक्रम का परिणाम है।

सुधी पाठकों को विदित होगा कि मालदीव के वर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू चीन की गोद में बैठकर भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं। परंतु यह इस प्रकार और इतनी तीव्रता के साथ धराशायी हो जाएगा, इसका अनुमान स्वयं राष्ट्रपति मुइज्जू और उनकी सरकार को भी नहीं रहा होगा। आखिर यह पूरा प्रकरण क्या है? चार जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लक्षद्वीप दौरे के अनुभव को तस्वीरों-वीडियों के माध्यम से ‘एक्स’ पर साझा किया था। इसमें जब प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव का नाम लिए बिना लक्षद्वीप को पर्यटन का अच्छा विकल्प बताया, तब पहले भारत-विरोधी नीतियों में लिप्त मालदीव की मुइज्जू सरकार के तीन मंत्रियों— मरियम शिऊना, मालशा शरीफ और हसन जहान ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ भारत के लिए विषवमन प्रारंभ कर दिया। देखते ही देखते इसके विरुद्ध सोशल मीडिया पर असंख्य भारतीयों का गुस्सा भड़का, देश के कई लोकप्रिय हस्तियों ने मालदीव को आईना दिखाना, सैंकड़ों भारतीयों और पर्यटन कंपनियों द्वारा मालदीव प्रवास का पूर्वनिर्धारित पंजीकरण व हवाई टिकटें रद्द करना शुरू किया, वैसे ही मालदीव का भारत-विरोधी सत्ता-अधिष्ठान घुटनों पर आ गया और अपने उन्हीं मंत्रियों को निलंबित कर दिया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मालदीव आने वाले पर्यटकों में एक तिहाई हिस्सेदारी भारतीयों की है। अब चूंकि मालदीव के भारत-विरोधी उपक्रम के खिलाफ असंख्य भारतीयों ने मालदीव के बहिष्कार का निर्णय किया है, इसलिए अपनी आर्थिकी को बचाने के लिए मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने चीनी समकक्ष के आगे अधिक से अधिक चीनी पर्यटकों को मालदीव भेजने की भीख मांगी है।

यह कोई पहला मामला नहीं है। चाहे संकटग्रस्त क्षेत्रों में सैन्य अभियान चलाकर अपने लोगों की सुरक्षित देश-वापसी हो, रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवाने हेतु विश्व के बड़े देशों का प्रधानमंत्री मोदी से मध्यस्था का आह्वान हो या फिर जी20 सम्मेलन में देश की कूटनीतिक सफलता— यह सब दुनिया में भारत की भू-राजनीति में मौलिक परिवर्तन को प्रामाणित करता है। भ्रष्टाचार-मुक्त जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वन और आर्थिक-सामाजिक सरोकारों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में मोदी सरकार ने अभूतपूर्व प्रगति की है। 2014 से पहले दिल्ली, राजस्थान, मुंबई, पुणे, वडोदरा आदि नगरों में जिहादियों द्वारा बम धमाके आम थे। परंतु कश्मीर-पंजाब रूपी अपवादों को छोड़कर बीते 10 वर्षों एक भी घातक आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। आज देश में सुरक्षा की स्थिति यह है कि यदि सीमापार से किसी ने दुस्साहस का प्रयास किया, तो उसे उचित जवाब मिलता है। 2016-2019 में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक और गलवान-तवांग प्रकरण में चीन की हेकड़ी को तोड़ना— इसका प्रमाण है।

देश के पूर्व राजनयिक और पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे अजय बिसारिया ने अपनी पुस्तक ‘एंगर मैनेजमेंट: द ट्रबल डिप्लोमेटिक रिलेशनशिप बिटवीन इंडिया एंड पाकिस्तान’ में खुलासा किया है कि फरवरी 2019 में बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में फंसे भारतीय लड़ाकू पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान की सुरक्षित वतन-वापसी के लिए भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर नौ घातक मिसाइलें तान दी थी। यह घटना 27 फरवरी 2019 की थी, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कत्ल की रात’ कहकर संबोधित किया था। इससे पहले भारतीय नेतृत्व की क्या स्थिति थी, वह पाकिस्तान से आए आतंकवादियों द्वारा वर्ष 2008 के भीषण 26/11 मुंबई हमले से स्पष्ट हो जाता है, जिसमें प्रतिकार को तैयार भारतीय सेना का मनोबल तत्कालीन मनमोहन सरकार ने तोड़ दिया था।

मई 2014 से पहले कुछ अपवादों (पोखरण-2 परिक्षण सहित) को छोड़कर भारतीय नेतृत्व के दृष्टिकोण में आत्मसम्मान का अभाव था। तब हमारा रवैया कैसा था, यह स्वतंत्रता के बाद देश पर लगभग 50 वर्षों तक प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से शासन करने वाली कांग्रेस के वर्तमान शीर्ष नेता राहुल गांधी के विचारों से स्पष्ट है। 2 अप्रैल 2021 को पूर्व अमेरिकी राजनयिक निकोलस बर्न्स से ऑनलाइन चर्चा करते हुए राहुल इस बात से असंतुष्ट हो गए थे कि भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिका अब कुछ नहीं बोलता। ऐसा ही विचार 1972 बैच के भारतीय विदेश सेवा अधिकारी (सेवानिवृत्त), पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) और चीन आदि देशों में भारतीय राजदूत रहे शिवशंकर मेनन ने भी एक विदेशी पत्रिका को लिखे कॉलम में प्रस्तुत किया था। तब राहुल और मेनन के विचारों का मर्म यह था कि अमेरिका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘सही रास्ते’ पर लाने और अमेरिकी नीति के अनुसार काम करवाने का प्रयास नहीं कर रही है। अनुमान लगाना कठिन नहीं कि इसी गुलाम मानसिकता से ग्रस्त होकर प्रारंभिक और कालांतर में भारतीय नेतृत्व तथा भारतीय नौकरशाहों ने कितनी बार राष्ट्रहित के साथ समझौता किया होगा। इस पृष्ठभूमि में वर्तमान भारतीय नेतृत्व दुनिया को वास्तविक भारत से परिचय कराते हुए अपने हितों को ध्यान में रखकर विदेश-नीति को आकार दे रहा है। भारतीयों द्वारा मालदीव को उसका स्थान दिखाना— इसका परिणाम है।

By बलबीर पुंज

वऱिष्ठ पत्रकार और भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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