nayaindia supreme court प्रतिकूल क़ब्ज़े पर अहम फ़ैसला
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प्रतिकूल क़ब्ज़े पर अहम फ़ैसला

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gn saibaba life sentence cancelled
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सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो कोर्ट ने यह बात स्पष्ट कर दी कि मकान मालिक और किरायेदार विवाद में प्रतिकूल क़ानून लागू नहीं होता। इस मामले में कोर्ट ने तीन अहम बातें कहीं। पहला यह कि जिस भी व्यक्ति ने ज़मीन को उसकी क़ीमत अदा करके अपने सौदे को रजिस्टर करवाया है वही उसका मालिक है। किरायेदार और मकान मालिक के पुराने चलते आ रहे विवाद में किरायेदार मालिक कभी नहीं हो सकता।

यदि आप अपने मकान में किसी को किरायेदार रखते हैं तो प्रायः आप ग्यारह महीनों के लिए एक अनुबंध करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इस अवधि के बीच आप किरायेदार की नीयत से वाक़िफ़ हो जाएँ। यदि उसका रहन-सहन ठीक लगे तो आप इस अनुबंध को अगले ग्यारह महीनों के लिए बढ़ा भी सकते हैं। परंतु कोई भी मकान मालिक किसी भी किरायेदार को लम्बे समय तक अपने मकान में रहने नहीं देता।

इसके पीछे का कारण है प्रतिकूल क़ब्ज़ा या ‘एडवर्स पज़ेशन’ क़ानून। इस क़ानून के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी मकान या ज़मीन पर बारह वर्ष या उससे अधिक तक रहता है या उस जगह पर उसका क़ब्ज़ा होता है तो प्रतिकूल क़ब्ज़े क़ानून के तहत वो व्यक्ति उस जगह पर अपने मालिकाना हक़ का दावा कर सकता है। परंतु हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने प्रतिकूल क़ब्ज़े को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के संबंध में एक बड़ा फ़ैसला दिया है।

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जब भी कभी हम कोई मकान या ज़मीन ख़रीदते हैं तो इस बात को सुनिश्चित कर लेते हैं कि जो भी व्यक्ति हमें अपना मकान या अपनी ज़मीन बेच रहा है वही उसका मालिक है और वो प्रॉपर्टी उसी के क़ब्ज़े में है। परंतु यदि कोई आपको अंधेरे में रख कर कोई विवादित ज़मीन बेच दे तो आप ठगा महसूस करेंगे। ऐसा ही कुछ हुआ बृज नारायण शुक्ला के साथ।

1966 में उत्तर प्रदेश के हरदोई में शुक्ला ने एक ज़मीन राय बहादुर मोहन लाल से ख़रीदी। जब 1975 में वे उस ज़मीन पर कुछ निर्माण करने लगे तो उन्हें निर्माण करने से सुदेश कुमार ने यह कह कर रोक दिया कि इस भूमि के मालिकाना और क़ब्ज़े को लेकर एक विवाद 1944 से चल रहा है। इसी कारण प्रतिकूल क़ब्ज़े क़ानून के तहत वह ज़मीन सुदेश कुमार के क़ब्ज़े में है। मामला ज़िला अदालत में पहुँचा और फ़ैसला बृज नारायण शुक्ला के पक्ष में आया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुदेश कुमार इलाहाबाद उच्च न्यायालय गये जहां फ़ैसला उनके हक़ में आया।

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जैसे ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो कोर्ट ने यह बात स्पष्ट कर दी कि मकान मालिक और किरायेदार विवाद में प्रतिकूल क़ानून लागू नहीं होता। इस मामले में कोर्ट ने तीन अहम बातें कहीं। पहला यह कि जिस भी व्यक्ति ने ज़मीन को उसकी क़ीमत अदा करके अपने सौदे को रजिस्टर करवाया है वही उसका मालिक है। किरायेदार और मकान मालिक के पुराने चलते आ रहे विवाद में किरायेदार मालिक कभी नहीं हो सकता।

इस ऐतिहासिक फ़ैसले में दूसरी अहम बात यह कही गई कि इस विवाद के अनुसार जो किरायेदार उस ज़मीन पर क़ाबिज़ है उसने उच्च न्यायालय में यह तर्क दिया कि वे 1944 से उस ज़मीन के किरायेदार हैं इसलिए उन पर प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू होता है। उच्च न्यायालय ने भी इस तर्क को मान लिया। परंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय के इस तर्क को ग़लत करार दिया गया और यह बात स्पष्ट कर दी गई कि ऐसा कोई क़ानून किरायेदार पर लागू नहीं होता।

दरअसल जब भी कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी पर किरायेदार बन कर रहता है तो उस स्थिति में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू इसलिए नहीं होता क्योंकि वह एक रज़ामंदी के तहत किए गए अनुबंध के तहत वहाँ रहता है। यानी मकान मालिक को इस बात से कोई आपत्ति नहीं होती कि उसकी प्रॉपर्टी पर कोई व्यक्ति किराया दे कर रह रहा है। इसलिए कोई भी किरायेदार जब तक अपने मकान मालिक के साथ किए गए अनुबंध का पालन कर रहा है और नियमित रूप से किराया दे रहा है तो वह कितने भी समय तक उस प्रॉपर्टी पर रह सकता है।

यदि वह किरायेदार अनुबंध के नियम और शर्तों का पालन नहीं कर रहा तो उस स्थिति में मकान मालिक उसे नोटिस दे कर प्रॉपर्टी ख़ाली करवा सकता है। ठीक इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी यह बात स्पष्ट कर दी कि सुदेश कुमार उस ज़मीन पर ज़मीन के मालिक की मर्ज़ी से एक किरायेदार की हैसियत से थे जिस पर किसी बात को लेकर विवाद हुआ। इसलिए इस मामले में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू नहीं होता।

इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीसरी अहम बात यह कही गई कि इस विवाद में समय बाधिता (टाइम बार) भी लागू नहीं होती। जब 1966 में इस ज़मीन का सौदा हुआ उस दिन से बारह वर्ष के भीतर ही यह मामला कोर्ट के सामने आया तो समय बाधिता का नियम लागू नहीं होगा।

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सुदेश कुमार का यह दावा कि क्योंकि यह ज़मीनी विवाद 1944 से चल रहा है, इसलिए इस पर समय बाधिता लागू होगी, यह ग़लत है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिस तारीख़ को किसी ज़मीन का सौदा होता है उस दिन से बारह वर्ष के भीतर यदि कोई उस पर हुए क़ब्ज़े को लेकर आपत्ति ज़ाहिर न करे तो केवल उसी स्थिति में प्रतिकूल क़ब्ज़ा या ‘एडवर्स पज़ेशन’ क़ानून लागू हो सकता है।

जनवरी 2024 के सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फ़ैसले से सभी मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच एक अच्छा संदेश गया है। इस फ़ैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि किन परिस्थितियों में प्रतिकूल क़ब्ज़े का क़ानून लागू होगा। अब हर मकान मालिक और किरायेदार को बरसों से चले आ रहे दस्तूर को भी त्याग देना चाहिए, जहां वे अपना अनुबंध रजिस्टर नहीं करवाते थे।

यदि वे अपना अनुबंध रजिस्टर करवा लेंगे तो इस फ़ैसले के बाद उन्हें फ़िज़ूल की कोर्ट-कचहरी से भी निजाद मिल जाएगी। मकान मालिक और किरायेदार यदि एक दूसरे का सम्मान करें तो बिना किसी विवाद के लम्बे समय तक अपना रिश्ता बनाए रख सकते हैं।

By रजनीश कपूर

दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक। नयाइंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर।

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