nayaindia ram mandir inauguration श्रीराम मंदिर की इतनी प्रतीक्षा का अर्थ
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श्रीराम मंदिर की इतनी प्रतीक्षा का अर्थ

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उस समय उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत, राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री, शीर्ष अधिकारी के.के. नायर और गुरुदत्त सिंह के साथ मुख्य सचिव भगवान सहाय और स्थानीय कांग्रेस नेता (बाबा राघव दास सहित) किसी विवाद के बजाय सोमनाथ मंदिर की भांति रामजन्मभूमि क स्थायी समाधान अर्थात् मंदिर पुनर्निर्माण के पक्ष में थे। यही नहीं, जब बाबरी ढांचे के भीतर 22-23 दिसंबर 1949 को चमत्कारिक रूप से रामलला की मूर्ति प्रकट हुई और 50-60 रामभक्त हर्षोल्लास के साथ भजन-कीर्तन करने लगे, तब किसी भी स्थानीय मुस्लिम ने न तो कोई बाधा डाली और न ही इसके खिलाफ कोई मामला दर्ज कराया।

आगामी 22 जनवरी को अयोध्या में शताब्दियों पूर्व मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त और अब पुनर्निर्मित श्रीराम मंदिर का उद्घाटन होगा। भव्य कार्यक्रम में कई गणमान्यों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पावन कार्य को पूरा करेंगे। स्वाभाविक है कि इतनी प्रतीक्षा के बाद करोड़ों रामभक्त इससे प्रसन्न होंगे। किंतु यह समय आत्मचिंतन करने का भी है। आखिर स्वतंत्रता के बाद भारत, जहां 78 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदुओं की है और प्रधानमंत्री पद पर हमेशा सनातनी विराजित, तो उत्तरप्रदेश में सदैव हिंदू समाज से मुख्यमंत्री रहा है— तब वहां करोड़ों हिंदुओं को अपने मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के लिए कुछ एकड़ भूमि को वापस लेने में 77 वर्षों का समय क्यों लग गया?

इस्लाम का जन्म 1400 वर्ष पहले अरब में हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप में आज हम जिस मुस्लिम जनसंख्याकीय को देखते है, उसमें 99 आबादी के पूर्वज हिंदू और बौद्ध थे, जो 8वीं शताब्दी के बाद कालांतर में इस्लामी तलवार के भय से या लालच में आकर मतांतरित हो गए। इसी में मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने विषाक्त ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ (1888) की अलगाववादी नींव पर 1930-33 में इस्लाम के नाम पर अपने लिए अलग देश मांग लिया और उन्हें लगभग डेढ़ दशक में हिंदुओं के भीषण नरसंहार (कलकत्ता डायरेक्ट एक्शन डे सहित), 20 लाख लोगों के मारे जाने व 2 करोड़ लोगों के विस्थापित होने के बाद भारत का एक चौथाई भूखंड— पाकिस्तान के रूप में मिल गया। परंतु हिंदू बहुल खंडित भारत में हिंदुओं को रामजन्मभूमि की 2.77 एकड़ भूमि प्राप्त करने में 77 वर्ष लग गए। यह स्थिति तब है कि जब श्रीराम इस भूखंड के लोगों की कल्पना में युगों-युगों से है, परंतु 1933 से पहले किसी भी भारतीय मुस्लिम के जुबां पर ‘पाकिस्तान’ नहीं था।

क्या पाकिस्तान की मांग करने वाले सभी मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे?— नहीं। स्वाधीनता से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम समाज का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के लिए आंदोलित था। किंतु जब 14 अगस्त 1947 में यह इस्लामी देश अस्तित्व में आया, तब कुछ मुस्लिम नेता भारत में ही रह गए, जिनमें से अधिकतर कालांतर में कांग्रेस से जुड़ गए और ‘सेकुलर’ कहलाने लगे। ऐसे लोगों का उल्लेख मैं इस कॉलम में पहले भी कर चुका हूं।

स्वतंत्रता मिलने के बाद असंख्य रामभक्तों को अपेक्षा थी कि जैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में स्वतंत्रता पश्चात सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, वैसे ही अयोध्या, काशी, मथुरा सहित अन्य ऐतिहासिक अन्यायपूर्ण कृत्य का परिमार्जन भी राजनीतिक रूप से होगा। परंतु ऐसा नहीं हुआ। 12 नवंबर 1947 को सरदार पटेल द्वारा सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा के बाद स्वतंत्र भारत की पहली कैबिनेट में इससे संबंधित परियोजना को मंजूरी मिली और इसके राजकीय वित्तपोषण पर भी चर्चा हुई। यह अलग बात है कि गांधीजी के सुझाव के बाद इस कार्य को जनता से चंदा लेकर पूरा किया गया। चूंकि यह सब भारत सरकार द्वारा प्रायोजित था, इसलिए सरदार पटेल के देहांत के बाद स्‍वतंत्र भारत के पहले खाद्य-रसद मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने मंदिर निर्माण की कमान संभाली और अंततोगत्वा 1951 में सोमनाथ मंदिर बनकर तैयार हो गया।

उस समय उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत, राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री, शीर्ष अधिकारी के.के. नायर और गुरुदत्त सिंह के साथ मुख्य सचिव भगवान सहाय और स्थानीय कांग्रेस नेता (बाबा राघव दास सहित) किसी विवाद के बजाय सोमनाथ मंदिर की भांति रामजन्मभूमि क स्थायी समाधान अर्थात् मंदिर पुनर्निर्माण के पक्ष में थे। यही नहीं, जब बाबरी ढांचे के भीतर 22-23 दिसंबर 1949 को चमत्कारिक रूप से रामलला की मूर्ति प्रकट हुई और 50-60 रामभक्त हर्षोल्लास के साथ भजन-कीर्तन करने लगे, तब किसी भी स्थानीय मुस्लिम ने न तो कोई बाधा डाली और न ही इसके खिलाफ कोई मामला दर्ज कराया। तब 12 से अधिक स्थानीय मुसलमानों ने अयोध्या के तत्कालीन नगर दण्डाधिकारी को शपथपत्र देकर बाबरी ढांचे पर हिंदू पक्ष को स्वीकार किया था। फिर भी अयोध्या में राम मंदिर का पुनर्निर्माण का मामला लंबित रहा। क्यों?

इसका कारण सोमनाथ मंदिर संबंधित उस घटनाक्रम में मिल जाता है, जिसमें भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित होने के बाद भी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर के.एम. मुंशी को पंडित नेहरू के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा था। यहां तक, पं.नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाने से रोकने का भी प्रयास किया था। वास्तव में, इस मानसिकता का विचारबीज मार्क्स-मैकॉलेवाद से प्रेरित है, जिसके दर्शन में भारत की सनातन संस्कृति के प्रति घृणा का भाव है। जहां मार्क्सवादी (1853 से अबतक) भारत के पुनर्निर्माण हेतु भारतीय सनातन संस्कृति का विनाश आवश्यक बताते है, वही थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की शिक्षा प्रणाली (1836) ने ऐसे भारतीयों को तैयार था, जो ‘रक्त और रंग से भारतीय तो रहे, परंतु नैतिक और बौद्धिक रूप से अंग्रेजों के विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाते रहे।‘ दुर्भाग्य से पं.नेहरू स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ बौद्धिक रूप से मार्क्स-मैकॉले दर्शन का मिश्रण थे।

इसी विदेशी चिंतन को आत्मसात करके पं.नेहरू ने न केवल सोमनाथ मंदिर का विरोध किया, अपितु उससे पहले 26 दिसंबर 1949 को टेलीग्राम भेजकर तत्कालीन उत्तरप्रदेश सरकार को बाबरी ढांचे से रामलला की मूर्ति को बाहर फेंकने का आदेश तक दे दिया था। कालांतर में इसी नेहरूवाद से प्रेरणा लेकर 2007 में तत्कालीन कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने शीर्ष अदालत में शपथपत्र देकर श्रीराम को ही काल्पनिक चरित्र बता दिया।

प्राचीन-सांस्कृतिक साक्ष्यों के आधार के साथ प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या ही है और उनका जन्म किस स्थान पर हुआ था, इसका उल्लेख भी प्राचीन स्कंदपुराण में है। करोड़ों हिंदुओं का विश्वास है कि रामजी भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। दुनिया में प्रसिद्ध ईसाई-इस्लामी तीर्थस्थल उनके अनुयायियों के विश्वास का परिणाम है। सभ्य समाज में विश्वास का प्रमाण नहीं मांगा जाता। परंतु हिंदुओं से श्रीराम के अस्तित्व और उनके अयोध्या के विशेष स्थान पर जन्म लेने का साक्ष्य मांगा गया। कई प्रकार के भद्दे प्रश्न पूछे गए। परंतु शीर्ष अदालत की पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने 9 नवंबर 2019 को एकमत होकर इन बेवकूफी भरे प्रश्नों को निरस्त कर दिया और रामजन्मभूमि आंदोलन को न्यायोचित ठहरा दिया।

By बलबीर पुंज

वऱिष्ठ पत्रकार और भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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