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आरक्षण – नेता को लाभ, समाज की हानि

प्रतिभा बल पर कोई समाज आगे बढ़ता है, भीड़ बल पर नहीं। पर हमारे नेता अपने स्वार्थ में उलटा बना रहे हैं। इस से समाज की दूरगामी और बड़ी हानि कर रहे हैं। यह हर क्षेत्र में और लगातार बढ़ते पैमाने पर किया जा रहा है। फिर भी हर रंग के नेताओं का इस पर बोलने से बचना यह संकेत है कि स्वदेशी-राज में कुछ सड़ता गया है।… पिछली जनवरी से, जाति-भेदभाव करने वाली यूजीसी निर्देशों के बाद से कुछ मुखर लोग उस के विरोध के साथ-साथ अब आरक्षण की समीक्षा की माँग कर रहे हैं।

आरक्षण बढ़ाने में लगे नेता — जैसा अभी मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 73% आरक्षण वैध ठहराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने में दिखा — नहीं बताते कि ऐसी नीतियों से अब तक क्या हासिल हुआ? सभी दलों के बीच मानो चोर-चोर मौसेरे भाई जैसा समझौता है, जो कुछ नीतियों की समीक्षा से भी बचते हैं।

पर पिछली जनवरी से, जाति-भेदभाव करने वाली यूजीसी निर्देशों के बाद से कुछ मुखर लोग उस के विरोध के साथ-साथ अब आरक्षण की समीक्षा की माँग कर रहे हैं। न्याय दृष्टि से यह माँग बड़ी सीमित और उचित है। आखिर, एक ऐसी सुविधा जो केवल सबसे दबे-छूटे वर्ग को दी गई थी, अब कई शक्तिशाली संपन्न जातियों को भी दे दी गई है। कई शिक्षा संस्थानों, उच्च अध्ययन कोर्स में प्रवेश के लिए न्यूनतम योग्यता अंक भी हटा दिये गये हैं। इस से, तथा अन्य राजनीतिकरण से भी, उन कामों, पदों , संस्थानों की गुणवत्ता गिर रही है।

इस पर सोचने के बजाए, परिणाम-निरपेक्ष रूप से आरक्षण की मात्रा व दायरा बढ़ाया जा रहा है। इस पर समीक्षा करने से इन्कार भी संकेत है कि कुछ छिपाया जा रहा है।

यह कोई रहस्य नहीं कि आरक्षण मामले में नेताओं की चुप्पी/जिद चुनावी राजनीति के कारण है। इस में कोई राष्ट्रीय हित नहीं। तभी आरक्षण स्थायी रखने और बढ़ाने पर चर्चा रोकने में लफ्फाजी और गर्मा-गर्मी का प्रयोग होता है। सो, अब यह साफ छीन-झपट सा मामला है।

आरक्षण को संशोधित करने की माँग पर उन्माद दिखाना, जैसा सब से बड़े नेता ने “जब तक मैं जिन्दा हूँ…” वाले अंदाज से दिखाया, भी संकेत है कि चालू नीति के लिए कोई ठोस दलील नहीं है। यही स्थिति जातिगत अन्य राजकीय भेदभाव के साथ भी है। जिस का सब से विकट रूप एस.सी.-एस.टी. एक्ट के मनमाने प्रावधान और उस के व्यापक दुरुपयोग के बाद भी उस में सुधार को जबरन रोकना है। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में दी गई राहत भी संसद के माध्यम से फौरन पलटवा दी गई। सर्वविदित है कि यह सब एक-दो नेताओं की मर्जी से हुआ, न कि किसी विवेकशील आकलन, विश्लेषण से।

यह सब समाज के लिए हानिकारक है। बिना न्यूनतम योग्यता अंक रखे शिक्षा, शोध, चिकित्सा, आदि क्षेत्रों में नियुक्ति देने, बढ़ाने और ऐसी नीति स्थायी बनाने से विभिन्न क्षेत्रों में खासी संख्या में अनुपयुक्त लोग जिम्मेदार पदों पर पहुँच और बढ़ते जा रहे हैं। क्या वह समाज के हित में है?

आज तेजी से अधिक बुद्धि व ज्ञान पर निर्भर होती जा रही दुनिया में ठीक इन्हीं क्षेत्र को अयोग्य लोगों से भरना अपने हाथों देश को अपाहिज बनाने जैसा है। आरक्षण और राजनीतिकरण, दोनों से शिक्षा क्षेत्र में योग्य उपेक्षित कर अयोग्य बढ़ाए जा रहे हैं। फलतः अनेक प्रतिभाएं अवसर न मिलने से बेकार जा रही हैं। जबकि अयोग्य लोग शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, सांसद, आदि बन रहे हैं। इस से देश लाचार स्थायी रूप से दूसरों का पिछलग्गू ही रह जाएगा।

यह न डॉ. अंबेडकर की कल्पना थी, न संविधान सभा की। उस के विमर्श में कोई वक्तव्य नहीं मिलता, जो आरक्षण बढ़ाने के उन्माद और सामान्य वर्ग के विरुद्ध नए-नए राजकीय भेदभाव गढ़ने का समर्थन करता हो। जैसे, बिना किसी न्यूनतम अंक के तकनीकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने वाला आरक्षण; पदोन्नतियों में आरक्षण; परंपरागत संपन्न व शक्तिशाली जातियों को आरक्षण; जाति-भेदभाव करते यूजीसी निर्देश; और यही सब स्थायी बना देना। इन में से किसी के पक्ष में संविधान सभा के विचारों में शायद ही कुछ मिले। उन की भावना आज के नेताओं से मूलतः भिन्न थी।

हमारे चालू नेता यह सब समझते हैं। इसीलिए समीक्षा से भागते हैं। अपनी कुर्सी और वोट से बढ़कर वे किसी ऊँचे उद्देश्य की नहीं सोचते। उन के तमाम भाषण यही दिखाते हैं। वे घृणा, लालच, ईर्ष्या, द्वेष, आदि नीच भावनाएं उकसाते हैं। संविधान निर्माताओं ने ऐसी किसी भावना का सहारा नहीं लिया था।

इन बातों पर विचार करना जरूरी है। हर वर्ग में, जिनमें आरक्षण से लाभान्वित होने वाले भी हैं, व्यापक हित और न्याय की समझ रखने वाले विवेकशील लोग है। नेता ही अपने स्वार्थ में उन्हें गलत दिशाओं में डालते रहे हैं।

वरना, ऐसा मार्ग मिल सकता है, जिस से सब को लाभ हो तथा किसी को हानि न पहुँचे। यदि आरक्षण के लाभार्थी वर्गों के विचारशील प्रतिनिधियों को ही जिम्मेदारी दी जाए कि वे वैकल्पिक उपाय खोजें, तो वह संभव है।

किन्तु इस पर चर्चा से ही इनकार करना रोग को बिगड़ने छोड़ देना है। आरक्षण के तीनों पहलुओं पर चुप्पी रखी जाती है — मूल उद्देश्य, संदर्भ, और अब तक परिणाम। आरक्षण का मूल प्रावधान देने वालों — डॉ. अंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद समेत — के विचार भी याद नहीं किये जाते। क्योंकि वे आरक्षण स्थायी रखने और उस का विस्तार करने के प्रतिकूल थे।

आज जो हो रहा है, उस का डॉ. अंबेडकर ने समर्थन नहीं किया होता। उन की व्यापक दृष्टि को देखते हुए यही लगता है। डॉ. अंबेडकर ने 1946 ई. में अपने ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी’ के अंतर्गत सिद्धार्थ कॉलेज खोले तो उन में लेक्चररों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर की। जिस से ब्राह्मण और सामान्य वर्ग के लेक्चरर ही अधिक नियुक्त हुए।

अतः वर्तमान आरक्षण के रूप और जाति-भेदभाव नीति संविधान निर्माताओं की दृष्टि से विपरीत हैं। इस ने ‘दबे’ ‘पिछड़े’ की संज्ञा का अर्थ बदल दिया है। अब कथित ‘दबे’ बने रहने में निहित स्वार्थ पैदा हो गया है। क्योंकि यह किसी वास्तविक स्थिति के बदले विशेषाधिकारी पद बना दिया गया है। जबकि आज जातियों की सामाजिक स्थिति सौ वर्ष पहले जैसी बिल्कुल नहीं रह गई। अनेक नेता बातचीत में मानते हैं कि आरक्षण का मामला दुष्चक्र बन गया है।

अतः इस की पूरी, संयत समीक्षा होनी चाहिए। ताकि कोई उपयुक्त समाधान मिले। यह असंभव नहीं है। एक सदी पहले भी डॉ. अंबेडकर या बाबू जगजीवन राम आरक्षण नहीं, अपितु योग्यता से ऊँचे पहुँचे थे। सभी जातियों में प्रतिभाशाली, परिश्रमी और स्वाभिमानी लोग हैं। जगजीवन राम ने दिखाया था कि योग्यता या बुद्धि किसी जाति विशेष पर निर्भर नहीं है। उन्होंने दूसरों के साथ योग्यता में समान आधार पर परखा जाना चुना, न कि बिना अर्जित किए अतिरिक्त अंक लेना।

यदि जगजीवन राम सौ वर्ष पहले ऐसा कर सकते थे, तो आज यह अधिक आसान है। अधिकांश बाधाएँ दूर हो चुकी हैं। पिछली सामाजिक परंपराएं, कामकाज की स्थितियाँ, और जीवनशैली बुनियादी बदल चुकी है। जो अपवाद घटनाएं होती भी हैं, उसे संपूर्ण आबादी तथा एक तरह की कुल घटनाओं के अनुपात में देखना चाहिए। यह डॉ. लोहिया ने छ: दशक पहले ही ध्यान दिलाया था, कि हिन्दू कुरीतियों को अतिरंजित रूप में देखा जाता है जो केवल अवशेष हैं। वह अब सामाजिक चलन नहीं है।

इसलिए, सभी जातियों के समान उत्थान का रास्ता अपनाया जा सकता है। जैसा जवाहरलाल नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र (27 जून 1961) में कहा था, कि किसी समूह की स्थिति केवल योग्यता और प्रतिभा से ही ऊँची उठती है। नौकरियों में आरक्षण से किसी को तत्काल लाभ भले मिल जाए, लेकिन इस से बुनियादी उन्नति नहीं होती। वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब पूरा समाज आगे बढ़े।

नेहरू की बात का अर्थ यही है कि देश की प्रतिभाओं की हानि करके लाभ संभव नहीं है। अतः यह कहना कि एक के साथ अन्याय किए बिना दूसरे को न्याय देना असंभव है, अज्ञान या मानसिक आलस्य है। पर आरक्षण का दर्शन अब यही हो गया है। इसे बदला जा सकता है और बदलना चाहिए।

आगे भारतीय नेता जो करें, यह निर्विवाद है कि आज वैज्ञानिक-आर्थिक प्रगति कर रहे समाजों में सभी के लिए समान अवसर खुले रहते हैं। अपने नागरिक ही नहीं, बल्कि विदेशी प्रतिभा को भी प्रतिस्पर्धा में स्थान दिया जाता है। यह तब, जब यूरोप अमेरिका में भी बेरोजगारी है। फिर भी वहाँ विदेशी प्रतिभाओं के लिए विश्वविद्यालयों और कंपनियों के दरवाजे खुले रहते हैं। बल्कि, छात्रवृत्तियाँ देकर प्रोत्साहित करते हैं!

कारण यही है कि प्रतिभा वस्तुत: समाज के संसाधनों में वृद्धि करती है। इसलिए, उसके रास्ते कोई बाधा नहीं रखनी चाहिए। प्रतिभा बल पर कोई समाज आगे बढ़ता है, भीड़ बल पर नहीं। पर हमारे नेता अपने स्वार्थ में उलटा बना रहे हैं। इस से समाज की दूरगामी और बड़ी हानि कर रहे हैं। यह हर क्षेत्र में और लगातार बढ़ते पैमाने पर किया जा रहा है। फिर भी हर रंग के नेताओं का इस पर बोलने से बचना यह संकेत है कि स्वदेशी-राज में कुछ सड़ता गया है।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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