nayaindia Shri Kaal Bhairav Mandir शत्रु व संकट नाशक काल भैरव
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शत्रु व संकट नाशक काल भैरव

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भारत में भैरव की अनेक विख्यात मंदिरें हैं, लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर से पौने दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक राग का नाम इन्हीं के नाम पर भैरव रखा गया है।…इसे कालभैरव जयन्ती, भैरवाष्टमी, भैरव जयंती, भैरव अष्टमी, कालाष्टमी आदि नामों से भी जाना जाता है। शत्रुओं के नाश और जीवन में सफलता, शांति व समृद्धि प्राप्ति के लिए मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव की पूजा करने की पौराणिक परिपाटी है।

5 दिसम्बर -काल भैरव अष्टमी

शिरोभूषण के रूप में चन्द्रमा और सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, दिगम्बर वेश में  नारद आदि योगियों के समूह द्वारा वंदनीय दुष्टों को दंड देने वाले और भक्तों की रक्षा करने वाले देवता भैरव भगवान शिव के पंचम अवतार माने जाते हैं। भैरव को दण्डपाणी, स्वस्वा, भैरवीवल्लभ, दंडधारि, भैरवनाथ, बटुकनाथ आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है। भैरव का शाब्दिक अर्थ है- जो देखने में भयंकर हो अथवा जो भय से रक्षा करता है। भीषण, भयानक अथवा आनंदमय। भैरव अर्थात भरण-पोषण करने वाला, जो भरण शब्द से बना है। भैरव को काल भैरव के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन शैव मत में भैरव शिव के विनाश से जुड़े एक उग्र अवतार हैं। पौराणिक वर्णनों में भैरव को कोलतार से भी गहरा काला रंग, विशाल प्रलंब, स्थूल शरीर, अंगारकाय त्रिनेत्र, काले डरावने चोगेनुमा वस्त्र, रूद्राक्ष की कण्ठमाला, हाथों में लोहे का भयानक दण्ड, डमरू, त्रिशूल और तलवार, गले में नाग, ब्रह्मा का पांचवां सिर, चंवर और काले कुत्ते की सवारी करते हुए चित्रण किया गया है। त्रिक प्रणाली में भैरव परम ब्रह्म के पर्यायवाची, सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके हाथ में दंड होने के कारण उन्हें दंडपाणि और उनका वाहन कुत्ता अर्थात श्वान होने के कारण स्वस्वा कहा जाता है।

पौराणिक ग्रंथों के साथ ही रुद्रयामल तंत्र और जैन आगमों में भी काल भैरव के संबंध में विस्तृत वर्णन अंकित है। हिन्दू और जैनी तो भैरव की पूजा करते ही हैं। भैरव भारत, श्रीलंका और नेपाल के साथ तिब्बती बौद्ध धर्म में भी उपासनीय व पूज्य हैं। वज्रयान बौद्ध धर्म में उन्हें बोधिसत्व मंजुश्री का एक उग्र वशीकरण माना जाता है। और उन्हें हरुका, वज्रभैरव और यमंतक भी कहा जाता है। भैरव उग्र कापालिक सम्प्रदाय के देवता हैं। तंत्रशास्त्र में उनकी आराधना को ही प्राधान्यता प्राप्त है। तंत्र साधक का मुख्य भैरव भाव से अपने को आत्मसात करना होता है। उपासना की दृष्टि से भैरवनाथ एक दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं, तथा उज्जैन में मदिरा पान करने वाली भैरव बाबा की जागृत प्रतिमा है। भारत में भैरव की अनेक विख्यात मंदिरें हैं, लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर से पौने दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक राग का नाम इन्हीं के नाम पर भैरव रखा गया है।

करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान, संसार सागर से तारने वाले, श्रेष्ठ, नीले कण्ठ वाले, अभीष्ट वस्तु को देने वाले, तीन नयनों वाले, काल के भी महाकाल, कमल के समान नेत्र वाले तथा अक्षमाला व त्रिशूल धारण करने वाले काशी नगरी के स्वामी अविनाशी कालभैरव की पूजा- आराधना समस्त भारत में होती है, और अलग-अलग अंचलों में उन्हें पृथक- पृथक नामों से जाना -पहचाना जाता है। महाराष्ट्र में खंडोबा के रूप में उनकी पूजा-अर्चना ग्राम-ग्राम में होती है। दक्षिण भारत में उन्हें शास्ता के नाम से जाना जाता है। लेकिन हर स्थान पर उन्हें एक भयदायी और उग्र देवता के रूप में ही मान्यता प्राप्त है। और स्थान-स्थान पर अनेक प्रकार की मनौतियाँ भी उनके नाम से प्रचलित हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में की जाती है। विविध रोगों और आपत्तियों, विपत्तियों के वह अधिदेवता माने जाते हैं। शिव प्रलय के देवता भी हैं। इसलिए विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं- महाभैरव। भय नामक यह सेनापति बीमारी, विपत्ति और विनाश के पार्श्व में उनके संचालक के रूप में सर्वत्र ही उपस्थित दिखायी देता है।

शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्याह्न काल में भगवान शिव के रुधिर अर्थात रक्त से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इस तिथि को शिव का इस भूमि पर काल भैरव रूप में अवतरण होने के कारण इस दिन को कालभैरव अष्टमी कहा जाता है। इसे कालभैरव जयन्ती, भैरवाष्टमी, भैरव जयंती, भैरव अष्टमी, कालाष्टमी आदि नामों से भी जाना जाता है। शत्रुओं के नाश और जीवन में सफलता, शांति व समृद्धि प्राप्ति के लिए मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव की पूजा करने की पौराणिक परिपाटी है। 2023 में मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 5 दिसम्बर दिन मंगलवार को पड़ने के कारण इस दिन कालभैरव अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन कालभैरव की पूजा का शुभ मुहूर्त रात्रि 9:59 बजे से रात्रि 12:37 बजे तक, 6 दिसम्बर तक है। भैरव की उपासना के लिए भैरव अष्टोत्तर शतनामावली भी प्रचलित है। कालभैरवाष्टकम् शंकराचार्य द्वारा रचित भी स्तोत्र भी प्रचलन में है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार प्राचीन काल में एक समय अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सभी सीमाएं पार कर गया। घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव के ऊपर भी आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा। तब उसके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। कतिपय पौराणिक आख्यानों में ब्रह्मा के द्वारा शिव के अपमान स्वरूप भैरव की उत्पत्ति होने की बात कही गई है। एक कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में एक समय भगवान विष्णु और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मध्य इस विषय पर विवाद उत्पन्न हो गया कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है? इस विवाद के समाधान के लिए भगवान शिव ने ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध- संत आदि की एक सभा का आयोजन किया। सभा में सर्वसम्मति से एक निर्णय लिया गया, जिसे विष्णु ने तो स्वीकार कर किया, लेकिन ब्रह्मा इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हुए। और वे महादेव का अपमान करने लगते हैं।

ब्रह्मा ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों की रूपसज्जा देख कर शिव को तिरस्कारयुक्त वचन कहे। शांतचित शिव यह अपमान सहन न कर सके और उन्होंने रौद्र रुप धारण कर लिया। भगवान शंकर के प्रलय के रौद्र रुप को देखकर तीनों लोक भयभीत हो कांपने लगा। शिव के इस रूद्र रूप से श्वान पर सवार क्रोध से कंपायमान विशाल दण्डधारी भगवान भैरव प्रकट हुए। हाथ में दण्ड होने के कारण वे दण्डाधिपति कहे गये। भैरव के अत्यंत भयंकर रूप को देखकर ब्रह्मा को अपनी ग़लती का अनुभव हुआ। वह भगवान भोलेनाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे। ब्रह्मा एवं अन्य देवताओं, साधुओं द्वारा वंदना करने और शंकर द्वारा मध्यस्थता करने पर भैरव शांत हो जाते हैं। रूद्र के शरीर से उत्पन्न उसी काया को महाभैरव का नाम मिला। बाद में शिव ने उसे अपनी पुरी काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया। मान्यतानुसार ब्रह्मा के पाँच मुख हुआ करते थे तथा ब्रह्मा पाँचवे वेद की भी रचना करने जा रहे थे। सभी देवों के कहने पर महाकाल भगवान शिव ने ब्रह्मा से वार्तालाप तो की, परन्तु नहीं समझने पर महाकाल से उग्र, प्रचंड रूप भैरव प्रकट हुए। और उन्होंने नाख़ून के प्रहार से ब्रह्मा का पाँचवा मुख काट दिया। इस पर भैरव को ब्रह्मा हत्या का पाप भी लगा।

मान्यता है कि भगवान शंकर ने मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था, इसलिए यह दिन भैरव अष्टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा। भैरव अष्टमी काल का स्मरण कराती है। इसलिए मृत्यु के भय के निवारण हेतु लोग भैरव की उपासना करते हैं। भैरव की पत्नी देवी पार्वती की अवतार भैरवी हैं। जब भगवान शिव ने अपने अंश से भैरव को प्रकट किया था, तो उन्होंने माता पार्वती से भी भैरव की पत्नी के रूप में उनकी एक शक्ति उत्पन्न करने को कहा। तब माता पार्वती ने अपने अंश से देवी भैरवी को प्रकट किया, जो शिव के अवतार भैरव की पत्नी हैं।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार अपने हाथों में शूल, टंक, पाश और दण्ड धारण करने वाले आदिदेव, अविनाशी और आदिकारण, त्रिविध तापों से रहित महान पराक्रमी, सर्वसमर्थ, विचित्र ताण्डव नृत्य प्रिय काशी नगरी के अधीश्वर श्याम वर्ण कांतियुक्त कालभैरव की आराधना देवी- देवता सभी करते हैं। इनके पवित्र चरणकमल की सेवा देवराज इन्द्र सदा करते रहते हैं, लेकिन कालान्तर में भैरव-उपासना की दो शाखाएं- बटुक भैरव तथा काल भैरव के रूप में प्रसिद्ध हुईं। बटुक भैरव अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात हैं, तो काल भैरव आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हैं। काल भैरव को भैरवनाथ का युवा रूप तो बटुक भैरव को भैरवनाथ का बाल रूप कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रुद्र भैरव, कालभैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड़ भैरव तथा चंद्रचूड़ भैरव नामक आठ पूज्य भैरवों का वर्णन अंकित है।

इनकी पूजा करके मध्य में नवशक्तियों की पूजा करने का विधान बताया गया है। शिवपुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का ही पूर्णरूप बताया गया है। कालिका पुराण में भैरव को नंदी, भृंगी, महाकाल, वेताल की भांति शिव का एक गण बताया गया है, जिसका वाहन कुत्ता है। तंत्रशास्त्र में अष्टभैरव- असितांग भैरव, रुद्र भैरव, चंद्रभैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाली भैरव, भीषण भैरव तथा संहार भैरव का उल्लेख है। बटुक भैरव के ध्यान हेतु इनके सात्विक, राजस व तामस रूपों का वर्णन अनेक शास्त्रों में मिलता है। सात्विक ध्यान जहां अपमृत्यु का निवारक, आयु-आरोग्य व मोक्षफल की प्राप्ति कराता है, वहीं धर्म, अर्थ व काम की सिद्धि के लिए राजस ध्यान की उपादेयता है। कृत्या, भूत, ग्रहादि के द्वारा शत्रु का शमन करने वाला तामस ध्यान कहा गया है। गृहस्थ को सदा भैरव के सात्विक ध्यान को ही प्राथमिकता देने के लिए कहा गया है।

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पदार्थ तथा भाव के प्रतीक उपलब्ध हैं। यह प्रतीक उभयात्मक हैं, अर्थात स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी। सूक्ष्म भावनात्मक प्रतीक को ही देवता कहा गया है। भय भी एक भाव है, उसकी भावनात्मक उपस्थिति है। इसलिए भय भी एक प्रतीक है। भय का भी एक देवता है। और उस भय के देवता हैं- महाभैरवेश्वर। यही कारण है कि शैवभक्त धर्मसेतु पालक, अधर्म नाशक, कर्मपाश से मुक्ति प्रदायक, प्रशस्त कल्याण प्रदायक, व्यापक, स्वर्ण वर्णयुक्त अंगमंडल शेषनाग सुशोभित, मलरहित स्वच्छ- निर्मल, अविनाशी, अद्वितीय, सभी के इष्ट देवता काल भैरव की प्रार्थना करते हुए मृत्यु के अभिमान को नष्ट करने तथा काल के भयंकर दांतों से मोक्ष दिलाने की कामना करते हैं।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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