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दक्षिण के मुख्यमंत्रियों का दिल्ली में प्रदर्शन

ByNaya India,
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सात फरवरी को दिल्ली में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमया का धरना-प्रदर्शन था और अगले दिन केरल के मुख्यमंत्री विजयन प्रदर्शन करते हुए थे। दोनों का तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन नेसमर्थन किया। दक्षिण के राज्यों का यह आरोप है कि केंद्र कीमोदी सरकार उनको उनके हक का पैसा नहीं दे रही है। केंद्रीय राजस्व से उनको नियमानुसार हिस्सा नहीं मिल रहा है।

लेखक: के वी प्रसाद

दिल्ली में पिछले सप्ताह एक अलग ही नजारा तब देखने के मिला जब लगातार दो दिनों तक राजधानी के जंतर मंतर पर, दक्षिण राज्यों के दो मु्यमंत्रियों ने अपने साथियों के संग प्रदर्शन किया। देश की राजधानी में केंद्रीय सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया। पहले तो 7फरवरी को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमया का धरना-प्रदर्शन था और अगले दिन केरल के मुख्यामंत्री पिनरई विजयन प्रदर्शन करते हुए थे। दोनों को समर्थन दिया तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने। दक्षिण के तीनो ही राज्यों का यह आरोप है कि केंद्र कीमोदी सरकार उनको जितनापैसा केंद्रीय राजस्व से मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। केंद्रीय सरकार संघीय व्यवस्था और जीएसटी के कायदे के अनुसार राज्यों को उसके हक का पैसा ट्रांसफर नहीं कर रही है।

इन राज्यों का यह भी कहना है कि 15वेंवित्त आयोग से केन्द्रीय राज्यों को 41 प्रतिशत धन आवंटन किया जाना है लेकिन राज्यों को केंद्र से क पैसा मिल रहा है। साथ ही, कुछ राज्यों का यह भी कहना है कि, केंद्र सरकार उनको बाहर से उधार पैसे में भी बाधा खड़ी कर रही है। और यह सब तब है जबदक्षिण के राज्य केंद्रीय सरकार की टैक्स वसूली में सबसेज्यादा राजस्व देते है। अन्य राज्यों की तुलना में अधिक प्रतिशत भुगतान करते हैं। दक्षिण के राज्यों के वित्त मंत्रियों का यह भी कहना है किकेंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जिसका 41 प्रतिशत राज्यों को देना होता है, उस पर केंद्रीय सरकार अलग से उपकर और अधिभार लगा रही है। मतलब अतिरिक्त राजस्व वसूल रही है जिस राज्यों को नहीं देना होता पड़ता। इन सबके चलते, राज्य को धन  पर्याप्त नहीं मिल रहा और  विकास तथा कल्याणकारी योजनाओं के लिया जो राशि चाहिए, उसे वे पूरा नहीं जुटा पा रहे है। राज्यों के दोनों दायित्व बाधित हो रहे है और जनता को कठिनाई हो रही है।

कुछ दिन पहले, जब केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया गया था, तो कर्नाटक के एक सांसद ने धन  आवंटन को लेकर एक आपत्तिजनक टिप्पणी की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उस बयान से पार्टी को अलग बताया मगर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे उत्तर-दक्षिण में विवाद खड़ा करने की राजनीति बताई। वह बात आई-गई हो गई लेकिन दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियोंका अपने विधायकों के साथ दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन  करना क्या बतलाता है।

सही है कि दक्षिण के पांच राज्यों में से दो मुख्यमंत्रियों ने दिल्ली आ कर विरोध किया है और तीसरे ने उनका समर्थन किया, लेकिन कुछ महिने पहले एक और राज्य, तेलंगाना सरकार ने भी यह मुद्दा उठाया था। इस7 फरवरी को केरल की वाम दल की गठबंधन सरकार जब सड़क पर उतरीतो उसका साथ आम आदमी पार्टी ने दिया।स्वयं मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उस प्रदर्शन में भाग लिया। पंजाब सरकार ने पहले से हीइस बात को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया हुआहै कि राज्यों को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार लेने के लिया केंद्र सरकार अनुमति नहीं दे रही है। ध्यान रहेकेरल की सरकार भी अदालत पहुंची हुई है।

राजनेता के साथ राजनीति होगी ही, लेकिन राजनीति में सही समय पर अपनी बात रखने का बहुत महत्व होता है। एक तो यह समय इस लोकसभा के अंतिम बजट सत्र का था तो ऐसे में मुख्यमंत्रियों के धरने-प्रदर्शन से, मुद्दा राष्ट्रीय स्तर की चर्चाओं में आया। दूसरी, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है किहाल ही में, केंद्रीय सरकार ने 16वें वित्त आयोग का गठन किया है। अर्थशास्त्री अरविन्द पनघड़िया की नेतृत्व में आयोग ने अपना काम शुरू कर दिया है। जाहिर है दक्षिण के राज्यों आयोग पर एक दबाव बनाने का भी प्रयास किया है।

दक्षिण के राज्यों की15वेंवित्त आयोग की गठन के समय भी यह आपत्ति रही थी की जनसँख्या के आधार पर केंद्र से राज्यों को धन आवंटन के फार्मूले का आधार वर्ष बदला जाए। आधार 1971 जनगणना नहीं हो बल्कि उसे 2011 की जनगणना पर किया जाना चाहिए।  दक्षिण के राज्यों का तर्क है कि उनेक यहांकी जनसंख्यां नियत्रण का काम उत्तर भारत  के राज्यों की तुलना में अधिक सफलता से हुआ। नतीजतन दक्षिण में जनसंख्या कम हुई। ऐसे में पुराने आधार पर केंद्र से राज्यों को धन आवंटन का फार्मूला सही नहीं है। ऐसी आपत्तियों के चलत ही पिछले वित्त आयोग ने एक और आधार जोड़ा  था जिसेसे, दक्षिण के राज्यों को कुछ फायदा मिल सकता है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने दक्षिण के राज्यों की दलीलों को ख़ारिज किया है। और कहा है किकेंद्र सरकार वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार धन आवंटन कर रही है। वैसे कुछ आंकड़े यह दर्शाते है कि दक्षिण के कुछ राज्यों को इस व्यवस्था से पहले जीतना धन मिलता था, लगभग उतना अभी मिल रहा है।  साथ ही, वे राज्य जहाँ भाजपा विरोधी पार्टियांसत्ता में हैं, उनमें यह धारणा है कि केंद्र उनकीवित्तिय संसाधनों कीकोशिशों में बाधा डाल रहा है।

कुछ ही महीनों मैं लोकसभा केचुनाव होने है इसलिए मामला राजनैतिक महत्व का है। दक्षिण के मुख्यमंत्रियों के प्रदर्शन, आरोपों से इन राज्यों में भाजपा के चुनावी माहौल पर पर क्या असर होगा, इसके अलग-अलग कयास है।

वैसे कर्नाटक को छोड़े तो दक्षिण के राज्यों मेंभाजपा की पैंठ नहीं के बराबार है। अधिकतर लोगों का मानना है, की भाजपा उत्तर भारत की हिंदीभाषी पार्टी है। चुनाव में भाजपा के लिए वित्तिय आंक़ड़ों का सहारा है। लेकिन उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीति को हवा लगती हुई है। ऐसे में यह मामला संवेदनशील है और इस पर ज्यादा राजनीति नहीं होनी चाहिए।

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