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बंगाल में सुवेंदु युग का आरंभ

संगठन के स्तर पर तृणमूल को चुनौती देना आसान नहीं था। सुवेंदु अधिकारी ने वह चुनौती भी दी और वैचारिक स्तर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया।  सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के हिंदू मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि इस बार भाजपा चुनाव जीतने जा रही है। इसके साथ ही उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया कि चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद कोई हिंसा नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल में राजनीति के नए युग का आरंभ हो गया है। सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करते ही प्रदेश की राजनीति का मूल चरित्र बदल गया है। आने वाले दिनों में शासन व प्रशासन की मूल अवधारणा भी बदल जाएगी। इस निष्कर्ष का कारण हमको केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस भाषण में खोजना होगा, जो उन्होंने सुवेंदु अधिकारी के नेता चुने जाने के समय विधायक दल की बैठक में दिया था। उन्होंने कहा था कि एक सौ वर्षों की वैचारिक यात्रा के बाद यह लक्ष्य प्राप्त हुआ है। ध्यान रहे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष चल रहा है। तभी अमित शाह के कहने का अर्थ यह था कि भारतीय जनता पार्टी और उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की स्थापना के बहुत वर्ष पहले से पश्चिम बंगाल में एक वैचारिक संघर्ष चल रहा था, जिसकी परिणति भारतीय जनता पार्टी को जीत के रूप में हुई है।

इसलिए पश्चिम बंगाल की विजय और भाजपा का मुख्यमंत्री बनना दूसरे किसी भी राज्य की विजय से भिन्न है। यह सिर्फ एक राजनीतिक या चुनावी विजय नहीं है, बल्कि वास्तविक अर्थों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विजय है। एक विचार की विजय है। इस विजय के पीछे हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी का अनथक परिश्रम मुख्य कारक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति का भी बड़ा हाथ है। इसके साथ ही सुवेंदु अधिकारी के संघर्ष का भी बड़ा योगदान है, जिसने भाजपा की इतनी बडी जीत सुनिश्चित की। सुवेंदु अधिकारी को 2021 के चुनाव में बहुत समय नहीं मिल पाया था। तभी बहुत उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद भाजपा उस समय चुनाव नहीं जीत पाई थी। इसके बाद भी वे लगातार पांच साल तक जमीन पर तृणमूल कांग्रेस के विरोध में लड़ते रहे। उनकी लड़ाई कई स्तरों पर थी। संगठन के स्तर पर तृणमूल को चुनौती देना आसान नहीं था। सुवेंदु अधिकारी ने वह चुनौती भी दी और वैचारिक स्तर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया।

सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के हिंदू मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि इस बार भाजपा चुनाव जीतने जा रही है। इसके साथ ही उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया कि चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद कोई हिंसा नहीं होगी। ये दोनों बातें बहुत अहम हैं और उन्होंने भाजपा की जीत की पटकथा लिखी। वे लोगों को भरोसा दिलाने में इसलिए सफल रहे क्योंकि उन्होंने 2007 में नंदीग्राम और सिंगुर के आंदोलन में ममता बनर्जी की मदद करके वाम मोर्चा के हार की पटकथा लिखी थी। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराया था। इस बार वे नंदीग्राम के साथ साथ ममता बनर्जी के गढ़ भबानीपुर में जाकर लड़े। उनको अपने इस जोखिम भरे कदम की कीमत भी चुकानी पड़ी है। उन्होंने भबानीपुर में ममता बनर्जी को हरा दिया लेकिन उसके बाद उनके निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मार कर हत्या कर दी गई।

पश्चिम बंगाल की विजय कितनी बड़ी है और सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना कितनी बड़ी बात है इसको समझने के लिए सिर्फ एक पैमाना काफी है कि स्वंय अमित शाह उनको नेता चुनवाने गए थे। अमित शाह ने भाजपा विधायक दल की बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में हिस्सा लिया और सुवेंदु अधिकारी के विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा की। इसका अर्थ है कि उनको भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का बिना शर्त समर्थन है और अब उनको पश्चिम बंगाल में भाजपा की समावेशी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाली राजनीति को आगे बढ़ाना है। उनके कंधों पर 2029 के लोकसभा चुनाव की बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। वे 2029 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की लगातार चौथी जीत का मार्ग प्रशस्त करेंगे। ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। 2019 में जब भाजपा को 18 सीटें मिली थीं तब कुल संख्या 303 पहुंच गई थी। परंतु पिछली बार इसमें आठ सीटों की कमी आई और भाजपा की सीटों की संख्या 240 रह गई। अगले चुनाव में केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की सरकार बनाने में पश्चिम बंगाल का बड़ा योगदान हो यह सुनिश्चित करने की जवाबदेही सुवेंदु अधिकारी के ऊपर होगी।

इसको ध्यान में रखते हुए ही उनके मंत्रिमंडल का गठन होगा। वैसे पहले पांच मंत्रियों से ही स्पष्ट हो गया है कि भाजपा का मंत्रिमंडल हर समूह को जोड़ने वाला होगा। सुवेंदु अधिकारी के मंत्रिमंडल में दो सबसे प्रमुख दलित जातियों के दो प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। कोच राजबंशी समाज से निशिथ प्रमाणिक और नामशुद्र मतुआ समाज से अनिल कीर्तनिया को शामिल किया गया है। आदिवासी समाज से खुदीराम टुडू, ओबीसी समाज से दिलीप घोष और महिला व भद्रलोक की प्रतिनिधि के तौर पर अग्निमित्रा पॉल को शामिल किया गया है। ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस बार भाजपा ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षित 84 सीटों में से 67 पर जीत हासिल की है। अनुसूचित जनजाति की सभी 17 सीटें भाजपा ने जीती हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटों में भाजपा ने 75 प्रतिशत सीटें जीती हैं। यह इस बात का संकेत है कि भाजपा को लेकर जो एक स्टीरियोटाइप छवि गढ़ी गई थी वह पूरी तरह से टूट गई है। अब भाजपा व्यापक हिंदू समाज में सहज स्वीकृत पार्टी है।

इस पृष्ठभूमि में यदि भाजपा की जीत के कारणों का विश्लेषण करें तो कई बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं। इन्हें बिंदुवार प्रस्तुत किया जा सकता है।

  1. बांग्लाभाषी हिंदू समाज भाषा और संस्कृति के आधार पर अपने को मुस्लिम समुदाय के नजदीक पाता था। इसलिए उसका समर्थन तृणमूल कांग्रेस को और पहले वाम मोर्चा को मिलता था। इस बार बंगाली हिंदुओं को लगा कि जनसंख्या की बदलती संरचना उनके बच्चों के भविष्य के लिए खतरा है। उन्हें यह भी लगा कि गैर बांग्लाभाषी हिंदू तो अपने राज्य लौट जाएंगे। लेकिन वे कहां जाएंगे। इसलिए उन्होंने इस बार भाजपा को चुना।
  2. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बंगाल की जनता के प्रति जो सम्मान है वह भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण बना। शपथ समारोह के दिन भी उन्होंने मंच से बंगाल की जनता को दंडवत प्रणाम किया। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, बंगाल की जनता से उनका जुड़ाव और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनथक परिश्रम ने भाजपा की जीत का रास्ता बनाया।
  3. बंगाल का आम आदमी खास कर आम हिंदू शासन की कुव्यवस्था, लूट, भ्रष्टाचार, रंगदारी वसूली, अराजकता, से परेशान हो गया था और वह कानून के राज की बहाली चाहता था ताकि गुंडा संस्कृति समाप्त हो और वह शांतिपूर्ण तरीके से जीवन व्यतीत कर सके।
  4. बांग्ला मानुष इस बात से भी परेशान था कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी हमेशा केंद्र के साथ हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी शब्दावली में लड़ाई सबसे प्रिय शब्द हो गया था। दूसरे, वे हमेशा प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और दूसरे गणमान्य नेताओं के बारे में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते थे। इसे भी बांग्ला संस्कृति में स्वीकार नहीं किया गया।
  5. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री को नरेंद्र और गृह मंत्री को अमित कह कर संबोधित करते थे। देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के लिए गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल की जाती थी। उनको धमकी दी जाती थी। इतना ही नहीं मतदाताओं को भी धमकाया जाता था। इससे भी आम लोगों के अंदर नाराजगी बढ़ी।
  6. मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल के लोग लंबे समय से परेशान थे। पिछले कुछ वर्षों में इसकी तीव्रता बढ़ गई थी। ममता बनर्जी की सरकार आम लोगों के हितों के ऊपर मुस्लिम हित को रखती थीं। तभी इस बार के चुनाव से पहले जिस स्तर पर मुस्लिम ध्रुवीकरण दिखाई दिया उसकी प्रतिक्रिया में उसी तीव्रता से हिंदू ध्रुवीकरण भी हुआ। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव परिणामों में देखने को मिला।
  7. पश्चिम बंगाल में उद्योग, रोजगार और कामकाज की कमी से युवाओं का बड़ी संख्या में पलायन हुआ है। राज्य में रहने वालों की बड़ी आबादी बुजुर्गों की है। परंतु देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले युवाओं ने उन राज्यों की प्रगति देखी और इस बार उन्होंने इसकी चाहना में अपने राज्य में भी भाजपा को वोट देकर चुनावा जिताया। बुजुर्गों को भी लगा कि अगर इस बार मौका चूके तो फिर बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
  8. घुसपैठ एक बड़ी चिंता का मुद्दा हमेशा रहा है। लोगों ने जब यह तथ्य जाना कि राज्य सरकार जमीन उपलब्ध नहीं करा रही है ताकि बांग्लादेश की सीमा पर बाड़ लगाई जाए और घुसपैठियों को रोका जाए, तब उन्होंने सत्ता बदलने का निर्णय किया। उनको पता था कि घुसपैठ की वजह से जनसंख्या संरचना बदल रही है।
  9. महिला सुरक्षा लोगों की चिंता के केंद्र में रहा। आरजी कर अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार के बाद हत्या की घटना और उसके बाद दोषियों को बचाने का जैसा बेशर्म प्रयास सरकार की ओर से किया गया उससे आम लोगों और खास कर महिलाओं का मोहभंग हुआ। उसके बाद दक्षिण कोलकाता के लॉ कॉलेज की घटना और दुर्गापुर की बलात्कार की घटना से लोगों का गुस्सा और बढ़ाया। लोग संदेशखाली भी नहीं भूले थे।
  10. युवाओं में नाराजगी इस बात को लेकर थी कि ममता बनर्जी की सरकार उनके लिए रोजगार की व्यवस्था नहीं कर रही है। उलटे ममता बनर्जी तेले भाजा यानी पकौड़ी तलने को भी उद्योग बता रही हैं।
  11. भाजपा की इतनी बड़ी जीत में एक बड़ा कारण उसकी रणनीति और उसके नेताओं के परिश्रम का रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने को पूरी तरह से प्रचार में झोंका। अमित शाह ने लगातार कोलकाता में कैम्प किया। प्रधानमंत्री की अनेक रैलियां और रोड शो हुए। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने खूब मेहनत की। इनके अलावा भाजपा को चुनाव लड़ा रहे बड़े चेहरों में भूपेंद्र यादव, सुनील बंसल, मंगल पांडेय आदि शामिल थे। अलग अलग राज्यों से अलग अलग समुदायों में अपील रखने वाले नेताओं को बुलाया गया। परंतु भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि गैर बांग्लाभाषी नेता जनता के बीच कम से कम दिखें। वे परदे के पीछे से रणनीति बनाएं और उसे लागू कराएं। भाषण देने और जनसभा करने का काम स्थानीय नेताओं पर छोड़ा गया। सुवेंदु अधिकारी के साथ साथ दिलीप घोष, शामिक भट्टाचार्य, सुकांत मजूमदार, राहुल सिन्हा आदि को आगे रखा गया। प्रचार की सारी सामग्री बांग्ला भाषा में तैयार की गई। इसका असर यह हुआ कि ममता बनर्जी को बाहरी और भीतरी का नैरेटिव बनाने का मौका नहीं मिला।
  12. ममता बनर्जी राजनेता हैं, कविता लिखती हैं, पेंटिंग करती हैं, वकील हैं, संगीतज्ञ हैं, लेखक, गायक और डॉक्टर भी हैं। वे अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझती हैं। वे किसी नए आइडिया को स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं। राज्य में किसी नए बदलाव का विजन भी उनके पास नहीं था। ऐसा लग रहा था कि वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुकी हैं, जिसके बाद उनके पास बंगाल को देने के लिए कुछ नहीं था। उनकी हार में यह भी एक बड़ा कारण बना।
  13. तृणमूल कांग्रेस की स्थिति अब एआईएमआईएम की तरह हो गई है। उनकी पार्टी से जीते 80 विधायकों में 42.5 फीसदी विधायक मुस्लिम हैं। दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों से अपना नेता चुनने की अपील की है। अगर राज्य की 27 फीसदी मुस्लिम आबादी को यह लगता है कि हिंदू वोट पूरी तरह से भाजपा के साथ रहेंगे तो मुस्लिम तृणमूल के साथ साथ कांग्रेस और लेफ्ट को छोड़ कर मुस्लिम पार्टी का समर्थन करेंगे। सो, यह ममता बनर्जी के साथ साथ दूसरी पार्टियों के लिए भी अस्तित्व का संघर्ष बन गया है।
  14. अगर इस पूरी प्रक्रिया में चुनाव आयोग की भूमिका की चर्चा न हो तो बात पूरी नहीं होगी। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के जरिए मतदाता सूची की सफाई की। इससे तृणमूल कांग्रेस का छापा वोट शून्य हुआ। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व तैनाती से भी चुनाव आयोग ने मतदाताओं में भरोसा बनवाया कि वे खुल कर निकलें और वोट करें। इन दोनों का मिला जुला असर यह हुआ कि पश्चिम बंगाल में पहली बार 93 फीसदी वोट पड़ा।

निश्चित रूप से इसके अलावा भी कुछ और कारण होंगे, जिनका योगदान भाजपा की जीत में रहा। लेकिन ये बुनियादी कारण हैं। हिंदू वोटों का ऐतिहासिक ध्रुवीकरण इस जीत का केंद्रीय तत्व है और इसे केंद्रीय तत्व बनाने में शुभेंदु अधिकारी की भूमिका ऐतिहासिक है। उन्होंने पहले चरण के मतदान से पहले कहा कि 80 प्रतिशत हिंदू भाजपा को वोट कर रहा है। उन्होंने बहुत साफ शब्दों में कहा, ‘जो हमारे साथ, हम उनके साथ’। अब इसमें यह जुड़ गया है, ‘जो हमारे साथ नहीं, हम उनके साथ नहीं’। अगले पांच साल तक यह नारा उनकी सरकार के कामकाज का मंत्र रहने वाला है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं)

By NI Desk

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