हर साल सैकड़ों फ़िल्में बनाने वाला हमारा हिंदी फिल्म उद्योग पता नहीं मुस्लिम कथा को उचित शोध और ईमानदारी से क्यों नहीं चित्रित कर पाता है। शुक्र है निर्देशक अनुषा रिज़वी ‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली‘ लेकर आ चुकी हैं, जिसकी स्ट्रीमिंग एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हो रही है।
आज के सिने-सोहबत में अनुषा रिज़वी की नवीनतम फ़िल्म ‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ के बहाने एक बेहद दिलचस्प और ज़रूरी मुद्दे पर विमर्श करते हैं। वैसे ये बहुत ही अजीब बात है कि हिंदी फिल्मों में मुस्लिम किरदारों का चित्रण हमेशा से काफ़ी स्टीरिओटीपिकल रहा है। हर साल सैकड़ों फ़िल्में बनाने वाला हमारा हिंदी फिल्म उद्योग पता नहीं मुस्लिम कथा को उचित शोध और ईमानदारी से क्यों नहीं चित्रित कर पाता है। शुक्र है निर्देशक अनुषा रिज़वी ‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ लेकर आ चुकी हैं, जिसकी स्ट्रीमिंग एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हो रही है।
हालांकि बॉलीवुड के इतिहास में कुछ ऐसी शानदार फ़िल्में देखने को ज़रूर मिली हैं, जिन्होंने मुस्लिम अनुभवों को बखूबी दर्शाया गया है जैसे ‘गर्म हवा’, ‘मक़बूल’, ‘ज़ख्म’, ‘बॉम्बे’, ‘फ़िराक़’, ‘ब्लैक फ्राइडे’, ‘हैदर’ इत्यादि लेकिन फिर भी उनकी संख्या ज़रा कम ही है। ‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ एक मुसलमान परिवार के एक अटपटे, पर दिल से जुड़े हुए दिन को बड़े ही मानवीय, सरल और कभी-कभी तीखे हास्य के साथ परदे पर लाती है। अनुषा रिज़वी, जिन्हें हम ‘पीपली लाइव’ जैसी आलोचनात्मक रूप से सराही गई फ़िल्म के निर्देशन के लिए जानते हैं, इस बार एक फ़ैमिली ड्रामा के साथ वापस आई हैं। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं कृतिका कामरा, श्रेया धनवंतरी, फ़रीदा जलाल, शीबा चड्ढा, डॉली अहलुवालिया, पु्रब कोहली, नुशांक वर्मा आदि।
अगर हम ‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ की कहानी की बात करें तो इस फ़िल्म की कहानी पूरी तरह एक दिन के इर्द-गिर्द घूमती है। बानी (कृतिका कामरा) एक स्वतंत्र, नौकरी तलाशती और जीवन के कई सामाजिक दबावों से जूझती हुई महिला है। उसी दिन, उसकी शांति भंग हो जाती है जब एक-एक कर उसके घर पर रिश्तेदार आते हैं, हर कोई अपनी समस्या लेकर। छोटी-सी अपार्टमेंट की सेटिंग एक थिएटर की तरह काम करती है, जिसमें हर पात्र के संघर्ष और हास्यपूर्ण पल जिंदगी जैसी सजीवता से उभरते हैं।
फ़िल्म में न केवल पारिवारिक तकरारें और भावनाएं दिखती हैं, बल्कि सामाजिक पहचान, धार्मिक अवसर, पेशागत संघर्ष, और परंपरा बनाम आत्मनिर्णय जैसे विषयों को भी सूक्ष्म रूप से स्पर्श किया गया है। इस फ़िल्म की एक बेहद ही खूबसूरत बात ये लगती है कि फ़िल्म के सभी पात्र हमारे इर्द-गिर्द के किरदार ही लगते हैं। हमेशा ये महसूस होता है जैसे इन्हें अपने ही शहर के मोहल्ले में कहीं न कहीं देखा है। साथ ही क़ाबिल-ए-गौर है इन सभी कलाकारों का अभिनय कौशल। सबने क्या शानदार प्रदर्शन किया है!
कृतिका कामरा ने बानी की भूमिका में एक स्थिर, संवेदनशील और मजबूत लेकिन कभी थकी हुई महिला की छवि बेहद अच्छी तरह से चित्रित की है। उनकी भूमिका इस फ़िल्म का दिल है। फ़रीदा जलाल का अभिनय एक बार फिर साबित करता है कि वे किसी भी फिल्म को गहराई और गर्मजोशी से भर देती हैं। इस फ़िल्म में भी उनकी उपस्थिति बेहद यादगार है, चाहे वह हास्यपूर्ण संवाद हो या भावनात्मक पल।
शीबा चड्ढा, डॉली अहलुवालिया, श्रेया धनवंतरी और बाकी कलाकारों ने भी अपने-अपने हिस्से को सहजता से निभाया है, और फ़िल्म के नैरेटिव को मज़बूती से आगे बढ़ाया है। यह मुख्यतः परफॉर्मेंस ओरिएंटेड फिल्म है, जहां हर किरदार का अपना रंग है।
जहां तक निर्देशन और स्क्रीनप्ले की बात है तो अनुषा रिज़वी ने फ़िल्म की स्थानीयता और पारिवारिक ऊर्जा को बड़े ही सधा-सुधा ढंग से स्क्रीन पर उतारा है। फ़िल्म में एक अपार्टमेंट की सीमित जगह का इस्तेमाल एक छोटे से थिएटर की तरह होता है, जहां पात्रों की बातचीत, झड़प और स्नेह जीवंत लगता है। संवादों में हास्य और भाव का संतुलन सहज है, और रोजमर्रा की बातचीत में भी ताकत दिखती है। हालांकि टोनल बैलेंस (हंसी और गंभीरता का संतुलन) कुछ जगह अस्त-व्यस्त महसूस होता है, लेकिन यह प्रयास की ईमानदारी को छुपा नहीं पाता। कुल मिलाकर, निर्देशन में किसी बड़े दृश्यात्मक अनुभव की अपेक्षा न रखें, बल्कि यह एक कहानी-केंद्रित, पात्र-केंद्रित फिल्म है जिसमें भावनाओं और रिश्तों का बड़ा महत्व है। यह फ़िल्म सिर्फ़ पारिवारिक तनाव या हास्य नहीं है; इसके भीतर सामाजिक संदेश भी बखूबी मौजूद है।
फ़िल्म की मुख्य किरदार’ बानी’ की स्थिति की ख़ास बात यह है कि वह घर के सभी रिश्तेदारों के भावनात्मक बोझ को अपने ऊपर ले लेती है। ये एक ऐसी भूमिका है, जिसे कई भारतीय परिवार आसानी से पहचान पाते हैं। फ़िल्म एक छोटे-से संदर्भ में यह भी संकेत देती है कि कैसे अल्पसंख्यक परिवार छोटे-छोटे सामाजिक दबावों से गुजरते हैं। हालांकि यह संदर्भ स्पष्ट रूप से नहीं उद्घाटित होता, लेकिन छोटे संवादों और पात्रों के निर्णय में साफ़ झलकता है।
रिश्तों, विवाहों और सामाजिक दवाबों के बीच व्यक्तिगत निर्णय और आत्म-पहचान की जद्दोजहद को फ़िल्म हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करती है, कभी संस्कार, कभी चुनौती के रूप में।
इस फ़िल्म की कहानी के कुछ पॉज़िटिव पहलू भी ज़रुर हैं। इसके पात्र समृद्ध हैं और हर किरदार का अपना प्रभाव है। फ़िल्म के किरदारों का प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली है विशेषकर फ़रीदा जलाल और कृतिका कामरा का। कई दृश्यों में फ़िल्म के संवाद इतने आस पास के लगते हैं कि वास्तविक जीवन के संवादों का अहसास दिला देते हैं। फ़िल्म में हिंदुस्तानी परिवारों की दैनिक समस्याओं को सरलता से दिखाया है जिसमें हास्य और भावनात्मक जुड़ाव भी भरपूर मात्रा में है ।
‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ की कमियों की तरफ़ ध्यान ले जाएं तो इसके प्लॉट की गति कुछ दृश्यों में इतनी तेज़-दौड़ती सी लगती है कि पात्रों की गहराई को बहुत आसानी से खो देती है। इसकी कहानी में असंतुलन की वजह भी बेशक़ यही है कि हल्का-फुल्का हास्य और गंभीर मुद्दों के बीच संतुलन हमेशा नहीं बैठता।
मिलाजुला कर ये एक दिल को छू जाने वाली ऐसी पारिवारिक फ़िल्म है जो अपने दर्शकों को हंसी और आंसू दोनों में बांधती है।
‘द ग्रेट शमसुद्दीन फ़ैमिली’ एक ऐसी फिल्म है जो बड़ी-बड़ी ब्लॉकबस्टर एक्शन या ड्रामेटिक कथानक की बज़ाय मानवता, पारिवारिक ऊर्जा और दैनिक जिंदगियों की बात करती है। यह फ़िल्म अपने मजबूत अभिनय, उचित हास्य, और मनुष्य-केंद्रित कथा-शैली के लिए याद की जाएगी, भले ही इसकी गति और कुछ ढांचागत निर्णय पूरी तरह परिपूर्ण न हों।
जियो हॉटस्टार पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे मशहूर बाइलिंगुअल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)।।।।


