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विनाश से विकास की ओर बंगाल

असल में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के अंदर बेचैनी पहले से थी वे छटपटा रहे थे और निकलने को बेचैन थे। लेकिन दूसरी कोई संभावना उनको नहीं दिख रही थी इसलिए वे मन मार कर ममता बनर्जी के साथ थे। जैसे ही उन्हें सुवेंदु अधिकारी के रूप में दूसरी संभावना दिखी उन्होंने खुले मन से उनके साथ जाने का फैसला किया। असल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ तृणमूल कांग्रेस के सभी नेताओं के बहुत अच्छे और निजी संबंध हैं। वे उनके साथ अपने को सहज महसूस कराते हैं।

ऐसा लग रहा है कि तृणमूल कांग्रेस समूल रूप से ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगा। इसका कारण सिर्फ यह नहीं होगा कि वे चुनाव हार गई हैं या उनकी पार्टी को इस बार सरकार बनाने का बहुमत नहीं मिला। ऐसा तो बहुत सारी पार्टियों के साथ होता है। लेकिन चुनाव हारने वाली सारी पार्टियां समाप्त नहीं हो जाती हैं और न उनमें ऐसी स्थिति पैदा होती है कि पार्टी के ज्यादातर नेता अलग होकर पार्टी पर दावा कर दें। ममता बनर्जी की पार्टी के साथ ऐसा हो रहा है तो उसके कई ठोस कारण हैं। सबसे पहला कारण तो यह है कि 15 वर्ष के लंबे शासन में ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी में जिस संस्कृति को बढ़ावा दिया वह उनकी पार्टी के ही ज्यादातर ऐसे नेताओं, जो पारंपरिक राजनीति पृष्ठभूमि के थे उनको पसंद नहीं था।

सत्ता में रहते हुए ममता बनर्जी ने लूट खसोट के मॉडल को ही चलते रहने दिया। पुराने सिंडिकेट जस के तस रहे। कटमनी, टोलाबाजी, मस्तान कल्चर, मुस्लिम तुष्टिकरण जैसी चीजें इतनी ज्यादा हो गईं कि लोगों का बुरी तरह से मोहभंग हुआ। यही कारण है कि लोगों ने ममता बनर्जी को निजी रूप से और उनकी पार्टी को न सिर्फ हराया, बल्कि हराने के बाद सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ अपना गुस्सा प्रकट करना शुरू किया। दूसरा बड़ा कारण यह रहा कि ममता बनर्जी ने आंख मूंद कर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि सारे नेता उनके सामने सिर झुकाएं। बहुत सारे नेताओं को यह पसंद नहीं था। तभी मुकुल रॉय और सुवेंदु अधिकारी जैसे पार्टी के संस्थापक नेता अलग हुए थे। उसी की परिणति अब बाकी नेताओं में देखने को मिल रही है। पार्टी के सबसे वरिष्ठ ऩेताओं में से एक कल्याण बनर्जी ने इसी की शिकायत की है।

असल में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के अंदर बेचैनी पहले से थी वे छटपटा रहे थे और निकलने को बेचैन थे। लेकिन दूसरी कोई संभावना उनको नहीं दिख रही थी इसलिए वे मन मार कर ममता बनर्जी के साथ थे। जैसे ही उन्हें सुवेंदु अधिकारी के रूप में दूसरी संभावना दिखी उन्होंने खुले मन से उनके साथ जाने का फैसला किया। असल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ तृणमूल कांग्रेस के सभी नेताओं के बहुत अच्छे और निजी संबंध हैं। वे उनके साथ अपने को सहज महसूस कराते हैं। सुवेंदु अधिकारी भी उनके साथ बराबरी का बरताव करते हैं। इसी वजह से तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और विधायकों को पार्टी का विभाजन करने में रत्ती भर संशय़ नहीं रहा। उनको पता था कि उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित होगा और जहां जा रहे हैं वहां सम्मान मिलेगा। तभी तृणमूल के 19 सांसदों ने 18 मई को ही लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिख कर अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग कर दी थी। चिट्ठी भले बाद में सामने आई। परंतु नतीजों के 14 दिन के भीतर ही चिट्ठी लिखी जा चुकी थी।

इसका अर्थ है कि नतीजों के पहले से ही इसकी तैयारी हो रही थी। पार्टी के नेताओं को लगने लगा था कि ममता बनर्जी हारने जा रही हैं और भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने वाली है। तृणमूल कांग्रेस से अलग होने की मांग करने वाले सांसदों की संख्या 19 से बढ़ सकती है और विधायकों की संख्या भी 60 से ज्यादा हो सकती है। परंतु यह प्रक्रिया यही पर नहीं रूकने वाली है कि लोकसभा और विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस का एक गुट अलग बैठने लगे। इसकी अंत परिणति तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी के हाथ से निकलने में होगी। पार्टी के दो तिहाई से ज्यादा सांसद और दो तिहाई से ज्यादा विधायक यह दावा कर सकते हैं कि असली तृणमूल कांग्रेस उनकी है। अगर ऐसी जरुरत होती है कि पार्टी के संगठन की मंजूरी ली जाए तो उसमें भी समस्या नहीं आएगी। इसलिए अब समय का इंतजार करना होगा कि कब तक ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी असली तृणमूल कांग्रेस से बाहर होते हैं। एक संभावना यह भी है कि अलग हो रहे नेता तृणमूल कांग्रेस पर अपना नियंत्रण करने के लिए बहुत उत्सुक नहीं हों क्योंकि उसका नाम बहुत बदनाम हो चुका है। अगर ऐसा होता है तभी पार्टी ममता के पास बचेगी लेकिन उसमें नाम और चुनाव चिन्ह के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल का पूरा घटनाक्रम सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक कौशल की एक मिसाल है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत से लेकर तृणमूल कांग्रेस के तिनका तिनका बिखरने तक उन्होंने जिस राजनीतिक कौशल का परिचय दिया है उसकी कम ही मिसाल मिलेगी। परंतु ऐसा नहीं है कि चार मई को चुनाव जीतने और नौ मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से वे सिर्फ राजनीतिक कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं। महज एक महीने की अवधि में उनका प्रशासनिक कौशल भी बेहतरीन रूप में सामने आया है। उन्होंने एक महीने के भीतर राज्य की कानून व्यवस्था को पटरी पर ला दिया है। अब पुलिस पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर वसूली करने या लोगों को परेशान करने के काम नहीं कर रही है, बल्कि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है। कानून व्यवस्था में ऐसा सुधार हुआ है कि तृणमूल कांग्रेस के शासन में संगठित अपराध में शामिल रहे नेता देश छोड़ कर भागना चाह रहे हैं और पकड़े जा रहे हैं। तृणमूल के पूर्व विधायक शौकत मुल्ला को बांग्लादेश भागने के क्रम में और फालता के तृणमूल उम्मीदवार जहांगीर खान को नेपाल भागने के क्रम में गिरफ्तार किया गया। कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक करने के साथ साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले भी हो गए हैं। सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन देने का मामला हो या चिकन नेक के पास की जमीन बीएसएफ को ट्रांसफर करने का मामला हो या अवैध घुसपैठियों की पहचान कर सीधे बीएसएफ को सौंपने का मामला हो या आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीय योजनाओं को लागू करने का मामला हो, सरकार सब कुछ कर चुकी।

इसके बाद सुवेंदु सरकार ने आर्थिक व औद्योगिक विकास पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। मंत्रियों के बीच विभागों के बंटवारे से ही इसके संकेत मिल गए थे। मुख्यमंत्री ने बहुत सोच समझ कर मंत्रियों की चयन किया यानी टीम बनाई और उन्हें उनकी योग्यता व क्षमता के हिसाब से विभाग बांटे। बंगाल के आर्थिक व औद्योगिक विकास के लिए सबसे अहम वित्त और उद्योग मंत्रालय हैं। सुवेंदु अधिकारी ने स्वप्न दासगुप्ता को वित्त और तापस रॉय को उद्योग मंत्री बनाया। दोनों के अनुभव, ज्ञान, प्रतिद्धता और निजी संपर्कों का लाभ प्रदेश को मिलेगा। एक और खास बात यह है कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी सही अर्थों में सबके मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। वे किसी के साथ भेदभाव नहीं कर रहे हैं और प्रशासनिक बैठकों में सबकी बात ध्यान से सुन रहे हैं। इससे दूसरी पार्टियों के नेताओं में भी उनके प्रति भरोसा बढ़ा है और वे विकास प्रक्रिया में भागीदार बनने के लिए आगे आए हैं। असल में ममता बनर्जी की सरकार ने पिछले 15 साल में संवाद और समावेशन को पूरी तरह से समाप्त कर ही दिया था साथ ही बंगाल में उद्योग की संस्कृति को भी पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। उनके शासन में धीरे धीरे उद्योग धंधे बंद होते गए और कारखाने दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गए। नए युग की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में उन्होंने कोई निवेश नहीं किया। खनिज संपदा से संपन्न होने और समृद्ध बंदरगाहों के बावजूद राज्य में व्यापार और विकास की संभावना को समाप्त कर दिया। आर्थिक व औद्योगिक विकास के नाम पर सिर्फ दिखावा हुआ और सरकारी खजाने की लूट हुई।

सुवेंदु अधिकारी की सरकार इस प्रक्रिया को वापस पटरी पर लाना चाहती है। तभी टाटा समूह को वापस लाने की बात हो रही है। मुख्यमंत्री ने निवेश आकर्षित करने के नाम पर हुए इवेंट में सरकारी खजाने के दुरुपयोग की जांच की भी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार ने 635 करोड़ रुपए एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को दिए। हालांकि ऐसे इवेंट से प्रदेश को क्या लाभ हुआ यह किसी को पता नहीं है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की नई सरकार बंगाल का गौरव वापस लौटाने के लिए काम कर रही है। बंगाल में व्यापार और उद्योग का समृद्ध इतिहास रहा है। अगर सरकार देश के उद्योगपतियों और निवेशकों को भरोसा दिलाने में कामयाब हो जाती है तो राज्य में पिछले कई दशकों में जो कुछ भी खराब हुआ है उसे सुधारने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। सुवेंदु के नेतृत्व में बंगाल में निवेश भी आएगा, उद्योग धंधे भी लगेंगे और साहित्य, कला, सिनेमा की समृद्ध विरासत भी वापस लौटेगी।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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