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शिव और विष्णु का तिल से पूजन

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रूद्र

मान्यता है कि सर्वाधिक शुभ और पवित्र मास माघ के महीने का हर दिन पुण्य फलदायी है। इस मास में दान-पुण्य के अतिरिक्त किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। माघ के महीने में तिल से संबंधित विशेष रूप से चार त्योहार- मकर संक्रांतिसंकष्टी तिल चतुर्थी, षट तिला एकादशी, तिल द्वादशी पर्व मनाए जाते हैं।…माघ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि अर्थात बारहवीं तिथि को तिल द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में हमेशा सुख और समृद्धि बनी रहती है।

7 फरवरी -तिल द्वादशी

भारतीय पंचांग के बारह महीनों में अलग-अलग चीजों का विशेष महत्व होता है। पौष के बाद आने वाली माघ मास में तिल का विशेष महत्व है। पूजा- पाठ से लेकर खाने- पीने के लिए तिल का उपयोग माघ मास में आवश्यक माना गया है। इस मास में तिल अथवा तिल- गुड़ मिश्रित मिष्टान्न का देवपूजन में नैवेद्य के रूप में चढ़ाने, सेवन व दान करने की विस्तृत परंपरा है। तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है। तिल को मोक्षदायक होने का वरदान मिला है। तर्पण, हवन आदि से लेकर पूजा- पाठ तक में इसका उपयोग किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार तिल और गंगाजल का तर्पण मुक्तिदायक माना गया है।

मान्यता है कि सर्वाधिक शुभ और पवित्र मास माघ के महीने का हर दिन पुण्य फलदायी है। इस मास में दान-पुण्य के अतिरिक्त किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। माघ के महीने में तिल से संबंधित विशेष रूप से चार त्योहार- मकर संक्रांति,  संकष्टी तिल चतुर्थी, षट तिला एकादशी, तिल द्वादशी पर्व मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहा जाता है, इस दिन देश भर में तिल स्नान और दान का विधान है। इस दिन लोग भगवान सूर्य की कृपा पाने के लिए तिल अथवा तिल मिश्रित मिष्टान्न का सेवन व दान करते हैं।

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी तिल चतुर्थी मनाया जाता है। इस दिन गणेश भगवान और माता पार्वती की विशेष पूजा और व्रत रखा जाता है। तिल के लड्डू और तिल से बनी मिठाई का भोग इस दिन भगवान गणेश और माता पार्वती को लगाया जाता है। व्रती भी तिल से बनी चीजों का सेवन कर व्रत खोलते हैं। माघ के महीने में पड़ने वाली पहली एकादशी अर्थात माघ कृष्ण एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इस दिन तिल का 6 प्रकार से उपयोग किया जाता है। उबटन, तिल स्नान, तिल का प्रसाद लगाना, तिल का सेवन, तिल का हवन में इस्तेमाल करना और तिल का दान विशेष माना गया है। षट तिला एकादशी के दूसरे दिन माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान नारायण की पूजा की जाती है। नारद और पद्म पुराण के अनुसार तिल मिले जल से विष्णु की पूजा और तिल से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार षट् तिला एकादशी के अगले दिन माघ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि अर्थात बारहवीं तिथि को तिल द्वादशी के नाम से जाना जाता है। और इस तिथि को तिल द्वादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में हमेशा सुख और समृद्धि बनी रहती है। तिल द्वादशी को भीष्म द्वादशी या गोविंद द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन तिलों के तेल से भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पुण्यसलिला नदियों में स्नान और दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। तिल द्वादशी व्रत करने वालों को माघ कृष्ण द्वादशी के दिन प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेकर उत्तर दिशा की ओर अभिमुख होकर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखकर विधि विधान से उनका पूजन करना चाहिए। भगवान को पंचामृत से अभिषेक करवाकर उन्हें मौली, फल, फूल, रौली, अक्षत, धूप, गंध आदि समर्पित करने चाहिए और उन्हें तिल से बने लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए। पीले वस्त्र धारण करके भगवान नारायण का पूजन करणे से विशेष फल प्राप्त होने की मान्यता है।

ब्रह्म पुराण के अनुसार तिल द्वादशी को स्नान, प्रसाद, हवन, दान व भोजन में तिल का और दीपक में तिल के तेल का उपयोग करने वाले व्यक्ति की सम्पूर्ण व्याधि दूर होती है। पूरे माघ महीने में स्नान करने का सामर्थ्य और अनुकूलता न होने पर त्रयोदशी से पूर्णिमा तक स्नान, दान, व्रत आदि पुण्यकर्म करने से सम्पूर्ण माघ स्नान का फल मिल जाता है। तिल द्वादशी के दिन पितृ तर्पण करने का भी विधान है। पितृ की प्रसन्नता वरदान बनकर जीवन को आसान व निष्कण्टक बनाती है। पितरों की प्रसन्नता के बाद देवी-देवताओं तक पहुंचने वाली प्रार्थनाओं और मंत्रों का असर तीव्र वेग और गति प्राप्त कर लेता है और भक्त के संकल्पों को सिद्धि मिल जाती है। इस दिन को भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं का स्वरूप माना है। ऐसे में इस दिन श्रीविष्णु की विशेष पूजा करने वाला व्यक्ति जीवन के सभी बंधनों से मुक्त होकर बैकुंठ जाता है।

एकादशी की तरह द्वादशी तिथि भी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और इस दिन भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस वर्ष 2024 में माघ कृष्ण द्वादशी की तिथि का प्रारंभ 06 फरवरी को अपराह्न 04.07 बजे से होगी और तिथि का समापन 07 फरवरी 02.02 बजे को होगी। इसलिए तिल द्वादशी व्रत 07 फरवरी 2024 दिन बुधवार को मनाई जाएगी। तिल द्वादशी को भगवान शिव और विष्णु दोनों की एक साथ पूजा करने का दिन माना जाता है। इस दिन तिल और गुड़ से बने पकवान का ही विष्णु और शंकर को भोग लगाना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने से व्यक्ति को अपने समस्त जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है इसके अलावा उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। माघ मास की द्वादशी तिथि को उपवास करके भगवान की पूजा करने से व्यक्ति को अपने जीवन में राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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