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पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग से क्या होगा ?

पर्यावरण को फायदा, ऊर्जा सुरक्षा की मज़बूती और किसानों की आय में बढ़ोतरी कुछ फ़ायदे ज़रूर हैं। लेकिन इसके साथ ही आम आदमी की जेब और पुराने वाहनों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर नीति संतुलित रही, तो यह विन-विननिर्णय साबित हो सकता है। वरना, माइलेज का नुकसान और महंगाई का बोझ आम आदमी पर पड़ेगा।

पिछले कुछ दिनों से केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% (E20) से अधिक बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) को बढ़ावा देने का संकेत दिए है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के बीच यह कदम तेल आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और स्वच्छ ईंधन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।

पेट्रोलियम मंत्रालय की एक संयुक्त सचिव ने संकेत दिए कि सरकार जल्द ही E85 (85% इथेनॉल) से E100 (100% इथेनॉल) तक के वाहनों के टेस्टिंग नॉर्म्स अधिसूचित करने वाली है। ऑटोमेकर्स पहले से ही इसके प्रोटोटाइप तैयार कर चुके हैं। देखना यह होगा कि सरकार का यह फैसला आम आदमी की जेब, पर्यावरण और वाहनों पर क्या असर डालेगा?

भारत ने 2025 में E20 कार्यक्रम को पूरा कर लिया है। अप्रैल 2026 तक देशभर में E20 पेट्रोल उपलब्ध है। अब सरकार E85 या इससे ऊंचे ब्लेंड की ओर आगे बढ़ रही है। फ्लेक्स-फ्यूल वाहन किसी भी अनुपात (E20 से E100 तक) में इथेनॉल चला सकते हैं। ब्राजील इसका सफल उदाहरण है, जहां FFVs सालों से चल रहे हैं। भारत में यह कदम ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है।

सरकार का दावा है कि EBP कार्यक्रम से अब तक 4.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल बचाया गया और 1.65 लाख करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा की बचत हुई। 2014 से अब तक 69.8 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कम हुआ। लेकिन क्या यह आम आदमी के लिए फायदेमंद है?

दावा है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को है। इथेनॉल नवीकरणीय स्रोत (गन्ना, मक्का, चावल) से बनता है। नीति आयोग के अनुसार, गन्ने से बने इथेनॉल से GHG उत्सर्जन 65% और मक्के से 50% कम होता है। टेलपाइप पर CO, HC और पार्टिकुलेट मैटर (PM) कम निकलते हैं। E20 से CO2 में 6-8% कमी आती है, जबकि E85 या E100 पर यह और ज्यादा। अध्ययनों से पता चलता है कि इथेनॉल ब्लेंड से वाहन प्रदूषण 20-30% तक घट सकता है।

वहीं इसके नुकसान भी हैं। गन्ना आधारित इथेनॉल पानी-गहन है। एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 2860 लीटर पानी लगता है। भारत में गन्ना पहले से ही 70% सिंचाई पानी का उपभोग करता है। ज्यादा इथेनॉल के लिए अगर गन्ना या खाद्यान्न (मक्का, चावल) का इस्तेमाल बढ़ा तो ‘फूड बनाम फ्यूल’ विवाद खड़ा हो सकता है। इसके साथ ही भूमि उपयोग भी बढ़ेगा, मिट्टी की उर्वरता घट सकती है और कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। दूसरी पीढ़ी (2G) इथेनॉल (कृषि अपशेष से) पर जोर देने की जरूरत है, जो पर्यावरण के लिए बेहतर है। कुल मिलाकर, अगर नीति सतर्क रही तो पर्यावरणीय फायदा साफ है, कम आयात, कम प्रदूषण, लेकिन पानी और भूमि प्रबंधन बिना तो नुकसान भी हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है, इसलिए ब्लेंडेड पेट्रोल का प्रति लीटर दाम कम रहता है। सरकार ने E20 के लिए कीमत कम रखने की सिफारिश की थी। लेकिन इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से 30% कम है, इसलिए इससे वाहन का माइलेज घटता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पुराने E10 वाहनों में E20 से 6-7% (4-व्हीलर) या 3-4% (2-व्हीलर) माइलेज गिरावट हो सकती है। मतलब, अगर आपकी कार 15 किलोमीटर प्रति लीटर की खपत करती है तो E20 पर 14.1-14.5 किलोमीटर हो जाएगी।

गौरतलब है कि आप E85 या E100 चुन सकते हैं, अगर वह सस्ता हो। ब्राजील में FFVs पर इथेनॉल सस्ता होने से उपभोक्ता बचत करते हैं। लेकिन भारत में अभी इंफ्रास्ट्रक्चर (अलग पंप) और कीमत निर्धारण स्पष्ट नहीं है। नए FFV थोड़े महंगे हो सकते हैं, हालांकि लंबे समय में इंसेंटिव से बचत हो सकती है। पुराने वाहन वाले उपभोक्ता (2012-2023 तक बने) को माइलेज नुकसान और संभवतः मेंटेनेंस खर्च बढ़ सकता है।

कुल मिलाकर, जेब पर तुरंत असर नकारात्मक हो सकता है, लेकिन अगर सरकार टैक्स छूट और सब्सिडी दे तो लंबे समय में यह फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं किसान समुदाय को इसका फायदा जरूर होगा, गन्ना और मक्का की खरीद बढ़ेगी, तो आय निश्चित ही बढ़ेगी।

वाहनों की बात करें तो उनके लिए इसका असर मिश्रित है। अप्रैल 2023 से बने वाहन E20 कंप्लायंट हैं, वे 20% इथेनॉल मिश्रित ईंधन से अपने वाहन आसानी से चला सकते हैं। अप्रैल 2025 से बने वाहन पूर्ण E20 अनुकूलित हैं। लेकिन 2023 से पहले के वाहनों में रबर पार्ट्स, गैस्केट्स और प्लास्टिक पर इथेनॉल का बुरा असर हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह मामूली है और सर्विसिंग में ठीक हो जाता है। E20 से ऑक्टेन नंबर बढ़ता है (91 से 95 तक), इसलिए एक्सेलरेशन बेहतर हो सकता है।

कुछ जानकर मानते हैं कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सबसे अच्छे विकल्प हैं, इन्हें किसी भी ब्लेंड पर चलाया जा सकता है। लेकिन अभी इसका कमर्शियल उत्पादन शुरू नहीं हुआ। पुराने वाहनों में E85+ ब्लेंड से समस्या ज्यादा हो सकती है। ARAI और SIAM अध्ययनों के अनुसार, सही ट्यूनिंग से परफॉर्मेंस बनी रहती है। कुल मिलाकर, नए वाहन खरीदने वालों के लिए यह अच्छी खबर है, लेकिन पुराने वाहन वालों को काफ़ी हद तक सावधानी बरतनी होगी। सरकार का यह फैसला दूरदर्शी है, लेकिन क्रियान्वयन ही असली परीक्षा है।

पर्यावरण को फायदा, ऊर्जा सुरक्षा की मज़बूती और किसानों की आय में बढ़ोतरी कुछ फ़ायदे ज़रूर हैं। लेकिन इसके साथ ही आम आदमी की जेब और पुराने वाहनों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर नीति संतुलित रही, तो यह ‘विन-विन’ निर्णय साबित हो सकता है। वरना, माइलेज का नुकसान और महंगाई का बोझ आम आदमी पर पड़ेगा। क्योंकि सतर्क और पारदर्शी रोलआउट ही सफलता की कुंजी है। इसलिए सरकार को हर पहलू पर गंभीरता से विचार करने के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए।

By रजनीश कपूर

दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक। नयाइंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर।

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