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पच्चीस साल, एक अभिनेता और अनंत इवेंट

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तो अगले एक महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे-मोहरे का अखिल भारतीय प्रोपेगेंडा होगा। हां, सप्ताह में खबर थी कि मोदी ने भाजपा संगठन, नेताओं, मंत्रियों को सात सितंबर से सात अक्टूबर के बीच पच्चीस साला मोदी पावर की इवेंट के कार्यक्रमों का खाका बनवाया है। मतलब मोदी का जन्मदिन (17 सितंबर) उत्सव, सेवा सप्ताह, सेवा पखवाड़ा, रक्तदान शिविर, मोदी के कामों पर सेमिनार और व्याख्यान आदि-आदि। इसी के लिए दिल्ली में ब्रिक्स बैठक का आयोजन भी है। रूस के पुतिन, चीन के शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री सहित 21 देशों के नेताओं को भारत ने न्योता दिया है। ये आएंगे भी क्योंकि जब दुनिया पुतिन, मसूद पेज़ेशकियान के गले लगने को तैयार नहीं तो दिल्ली में लालकालीन स्वागत, फोटोशूट का मौका कोई क्यों चूके। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी उज्बेकिस्तान जाएंगे और उसके बाद किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भी शामिल होंगे।

ध्यान रहे इन दोनों संगठनों को पश्चिमी देश, अमेरिका चीन का हितधारक मानते हैं। नवंबर में जी-20 की अमेरिका मेजबानी करेगा और डोनाल्ड ट्रंप आए दिन ब्रिक्स के खिलाफ बोलते रहते हैं। पर मोदी के लिए विश्व राजनीति की दिशा-दशा, भारत, उसकी विदेश नीति के दीर्घकालीन हितों का कोई अर्थ नहीं है। उनका मात्र उद्देश्य दुनिया के नेताओं से गले लगने, लगाने और ट्रंप-शी जिनपिंग, पुतिन आदि के साथ फोटो खिंचाने का होता है ताकि भक्त हिंदू उन्हें विश्व नेता की तरह पूजते रहें। और समय-अवसर क्योंकि 25 साला सत्ता का धूमधड़ाका बनाने का है तो विश्व नेताओं के साथ फोटोशूट तो सोने में सुहागा है।

सोचें, मोदी से पहले 1947 से 2014 तक के हर प्रधानमंत्री पर? क्या नेहरू, वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह किसी ने भी जनता को उल्लू बनाने के लिए ऐसा कोई तमाशा किया कि वे इतने-इतने साल सत्ता में रहे तो कांग्रेस या भाजपा और सरकार उनकी महिमा में सेवा सप्ताह, सेवा पखवाड़ा, सेमिनार और व्याख्यान आयोजित करें! कैबिनेट के मंत्री, मुख्यमंत्री सभी प्रधानमंत्री की आरती उतारें, उनका प्रोपेगेंडा करें!

तो मोदी ऐसा क्यों करते हैं? बकौल लालकृष्ण आडवाणी (अप्रैल 2014)- “I will not call Narendra bhai my protégé, but I have never seen a more brilliant and efficient event manager than him.” (मैं नरेंद्र भाई को अपना चेला नहीं कहूंगा, लेकिन मैंने उनसे अधिक प्रतिभाशाली और कुशल इवेंट मैनेजर कभी नहीं देखा।) भक्त मूर्ख जन भले न मानें लेकिन नरेंद्र मोदी की सत्ता के 25 साल (13 साल सीएम-12 साल पीएम) में एक-एक साल का, एक-एक महीने की सुर्खियों का हिसाब लगाएं तो 9,130 दिनों में लोगों को बहकाने, भाषण देने, झांकियां दिखाने, नए-नए वादे करने, इवेंट आयोजित करने का मोदी रिकॉर्ड ही निकलेगा।

हां, नरेंद्र मोदी ने भारत को सचमुच दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक इवेंट-ग्राउंड बनाया है। और मंच कभी खाली नहीं रहता। आज शिलान्यास, कल उद्घाटन; आज संकल्प, कल गारंटी; आज अमृतकाल, कल विकसित भारत। एक पर्दा गिरने से पहले दूसरा उठ जाता है। जनता को हिसाब लगाने की फुर्सत ही नहीं मिलती, उसके आगे अगली झांकी आ जाती है। उस नाते नरेंद्र मोदी वह राजनीतिक केस स्टडी हैं, जिसमें सत्ता चौबीसों घंटे चलते रंगमंच में बदल गई। हर कुछ सप्ताह में नया सेट, नया नारा, नई झांकी, नया संकल्प और नया भविष्य; केवल नायक स्थायी। दर्शक पिछले दृश्य का हिसाब पूछें, उससे पहले अगला पर्दा उठ चुका होता है।

और इस तथ्य को नोट रखें कि नरेंद्र मोदी का गुजरात का मुख्यमंत्री दफ्तर हो या दिल्ली का प्रधानमंत्री दफ्तर, वह केवल और केवल नौकरशाहों-अफसरों से चलता आया है। नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, या नरसिंह राव, डॉ. मनमोहन सिंह की सत्ता इनके स्वंय के लिखाए नोट, लिखित निर्देशों, विचारों मतलब प्रधानमंत्री के निज दिमाग से चलती थी। नेहरू के 17 वर्षों के कार्यकाल में दफ्तर हो या तीन मूर्ति आवास, दर्जनों स्टेनोग्राफर होते थे। फाइल आती, निर्देश होता तो खुद फाइल पर लिखते या स्टेनोग्राफर से नोट बनवा कर कैबिनेट सचिवों, मंत्रियों, सचिवों को भेजते। और उनके कार्यकाल के आर्काइव की फाइलें इसका प्रमाण हैं।

शास्त्री ने एलके झा को अपने प्रधानमंत्री सचिवालय में रखा लेकिन वे स्वयं अंग्रेजी-हिंदी ड्राफ्ट देखते और सरकार चलाते थे। नरेंद्र मोदी ठीक विपरीत हैं। उनके सीएमओ, पीएमओ के पच्चीस सालों की फाइलें जब आर्काइव में पहुंचेंगी तो उनका राज वैसा ही निकलेगा जैसा बिहार में राबड़ी देवी का था। ध्यान रहे देश के दूसरे बड़े प्रांत बिहार में राबड़ी देवी का साढ़े सात साल शासन रहा। वे भी अफसरों के बनाए नोट, फाइलों, कैबिनेट बैठकों के एजेंडा (राज्यों में मुख्य सचिव और दिल्ली में कैबिनेट सचिव) की उस सत्ता से चलती थीं, जैसे नरेंद्र मोदी चलते हैं। राबड़ी देवी को सलाह देने वाली अधिकारी राजबाला वर्मा हुआ करतीं। वे नोट बनाती थीं, फाइल प्रोसेस करती थीं, मुख्यमंत्री के दस्तखत की जगह लाइन खींच देती थीं और उस जगह राबड़ी देवी जैसे-तैसे दस्तखत करती थीं।

ऐसे ही नरेंद्र मोदी के गांधीनगर सीएमओ में 2001 में उनके प्रमुख सचिव डॉ. पीके मिश्रा थे तो वे आज भी प्रधानमंत्री दफ्तर में उनके प्रमुख सचिव हैं। जैसे लालू-राबड़ी या नीतीश कुमार के 1990 से 2025 तक 35 वर्षों के चंद अफसरों से बिहार की दशा-दिशा, नियति बनी, वही मोदी के 25 साला गुजरात-भारत की दशा-दिशा और सेहत का समय है। यह रियलिटी भारत की मंडल, कमंडल राजनीति में हिंदुओं की उस दशा को जाहिर करती है, जिसका डीएनए है ‘कोऊ नृप होउ हमहि का हानी’ या जो सत्तावान है वही हुकूम है, मेरे तो गिरधर गोपाल हैं!

इसमें नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत की राजनीति में मील के पत्थर हैं। क्योंकि उन्होंने अफसरों को शासन का कोर बना कर सरकार याकि प्रधानमंत्री के पद को ऐसा रंगमंच बनाया है, जिसमें अभिनेता एक ही है और वह हर महीने, हर दिन नया सेट, नया संवाद, नया उद्घाटन, नई झांकी से भक्तों को रिझाता रहता है। उनके शासन का भाषण, घोषणा अगली घोषणा तक जीवित रहती है, फिर नया पर्दा उठता है और पिछला दृश्य, दिखाया सपना यादगार से आउट हो जाता है। उनकी राजनीति मदारी, जादूगर जैसी नहीं, बल्कि एक आधुनिक स्टूडियो जैसी है। कब गले लगेंगे, रोशनी कहां पड़ेगी, कैमरा कहां रहेगा और दर्शक किस ओर देखेगा, इसकी पहले तैयारी होती है। वे स्वयं मंच-निर्देशक हैं, अभिनेता हैं और सरकार उनकी पटकथा। नौकरशाही प्रोडक्शन टीम और हर बड़ी तारीख एक नया प्रीमियर। सो, अगला सितंबर का शो ब्रिक्स है और सात सितंबर से सात अक्टूबर के बीच देश भर में मोदी की पच्चीस साला सत्ता का भगवा कीर्तन!

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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