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भारत में क्या ‘डेड’, क्या जिंदा?

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की एक पहचान उनकी डोनाल्ड ट्रंप के पालने (सीएम रहते हुए उनका पालना मोहन भागवत का था) की किलकारियां भी हैं। उन्होंने मर्यादा को ताक में रख अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा तक लगाया था। मगर कैसी अनहोनी जो ट्रंप ने भारत को अब रूस से नत्थी कर कहा है कि ‘रूस जैसे ही भारत की इकॉनोमी डेड है! दोनों साथ डूबें, मुझे क्या’। सवाल है ट्रंप ने झूठ बोला या सत्य? यदि झूठ है तो क्या अब तक नरेंद्र मोदी को स्वंय साहस से जवाब दे कर यह क्या नहीं कहना था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप झूठ बोल रहे हैं? भारत की अर्थव्यवस्था जिंदा ही नहीं वह विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था होने वाली है। यदि ट्रंप की तरह नरेंद्र मोदी की भी छप्पन इंची छाती होती तो उनका यह कहना भी जायज होता कि ट्रंट अपनी इकोनॉमी को डेड बना दे रहे हैं, जबकि उन्होंने भारत को विकसित इकॉनोमी बनाने की और दौड़ा रखा है!

सोचें, पिछले ग्यारह वर्षों से नरेंद्र मोदी भारत के 140 करोड़ लोगों से (इस 15 अगस्त को फिर वे लाल किले से कहेंगे) कह रहे है कि भारत विकास की ओर दौड़ रहा है। भारत अब आर्थिक और सैनिक महाशक्ति के स्वर्णकाल, अमृतकाल में है।

मगर इन्हीं दोनों मामलों में 10 मई 2025 के बाद से डोनाल्ड ट्रंप भारत को वैश्विक तौर पर एक्सपोज कर रहे हैं। ध्यान रहे दुनिया में ट्रंप का कहा सुना जाता है न कि भारत का। दुनिया लगातार ट्रंप से सुन रही है कि ‘मैंने सीजफायर कराया’। इतना ही नहीं उन्होंने चार-पांच विमानों के धड़ाधड़ गिरने की संख्या बताते हुए भारत की सैन्य क्षमता का मखौल भी बनवाया। और बेशर्मी की इंतहां देखिए जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में दो घंटे का भाषण दिया लेकिन यह लाइन नहीं बोली कि डोनाल्ड ट्रंप का बोलना झूठ है। भारत ने एक भी विमान नहीं खोया। अमेरिका ने, ट्रंप प्रशासन ने मध्यस्थता नहीं की। ट्रंप जबरदस्ती बीच में कूद कर सीजफायर का श्रेय ले रहे है! ट्रंप और उनके प्रशासन का कोई रोल नहीं था। इसी तरह नरेंद्र मोदी को खुद दो टूक यह जवाब देना चाहिए कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत की इकॉनोमी को मरा बताया है, यह झूठ है। और ऐसा वे यदि समझते हैं तो वे मरी अर्थव्यवस्था वाले देश से व्यापार करें या नहीं करें, हमें फर्क नहीं पड़ता। अमेरिका दबाव बना कर जो चाह रहा है भारत उसे कतई नहीं मानेगा।

क्या दोनों मामलों में खुद प्रधानमंत्री मोदी को जवाब नहीं देना चाहिए? जिन मोदी ने अमेरिका की जमीन में ट्रंप को जिताने की नारेबाजी की क्या उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं जो ट्रंप को सीधे जवाब दें! सोचें, यूक्रेन के जेलेंस्की पर। उन्होंने व्हाइट हाउस में ट्रंप और उनके प्रशासन के सामने, वैश्विक मीडिया के सामने किस बेबाकी से अपना पक्ष रखा था? ट्रंप की बोलती बंद कर दी थी। अभी इन दिनों ब्राजील के राष्ट्रपति खुद ट्रंप से भिडे हुए हैं और उन्हें ट्रंप के टैरिफ की चिंता नहीं है!

पर प्रधानमंत्री मोदी नहीं बोल सकते। और वे नहीं बोल कर भी डोनाल्‍ड ट्रंप के कहे को सत्य साबित तक दे रहे हैं। उन्हें समझ आ गया है कि वे झूठ से भारत के 140 करोड़ लोगों को बहका सकते हैं मगर दुनिया और वैश्विक महाशक्तियों को नहीं। तभी ग्यारह वर्षों में भारत के झूठ में जीने का नतीजा है जो पाकिस्तान की अब वैश्विक राजनीति में तूती है। याद करें 2014 के समय की पाकिस्तान की दशा और उसके आत्मबल को। जनरल मुर्शरफ के बाद पाकिस्तान लगभग अछूत था। अफगानिस्तान की वजह से अमेरिका का व्यवहार जरूर बना हुआ था। लेकिन राष्ट्रपति ओबामा से लेकर शी जिनफिंग, पुतिन तब डॉ. मनमोहन सिंह और भारत का भरपूर मान-सम्मान करते थे। उसी बैकग्राउंड के कारण उन तीनों नेताओं ने 2014 में भारत में नए आइडिया की मोदी सरकार के आने से संभावनाएं बूझीं। उसका मोदी ने फायदा उठाया। साबरमती के किनारे शी जिनफिंन को झूला झुलाया। ओबामा को चाय पिलाई। नवाज शऱीफ के घर जा कर पकौड़े खाए। लेकिन आज क्या हकीकत है? चीन ने भारत की इक़ोनॉमी का खा लिया है। पाकिस्तान का सेना प्रमुख ट्रंप के साथ लंच कर रहा है तथा पुतिन चीन के साझे में पाकिस्तान का संरक्षक है। वही अमेरिका की निगाह में भारत ‘डेड’ है!

क्या मैं गलत हूं? नरेंद्र मोदी, अजित डोवाल, जयशंकर और भाजपा सरकार, संघ परिवार तथा भक्त कुछ भी बोलें, राहुल गांधी, विपक्ष, मीडिया को कितनी ही गाली दे कर, पोस्ट लिख-लिख कर झूठा करार दें लेकिन इस वास्तविकता को कौन अनदेखा करेगा कि भारत में सत्य ‘डेड’ (मृत) हो चुका है। अब भारत झूठमेव का वह खोखा है, जिसमें असल कुछ भी नहीं बचा। गौर करें संसद के मौजूदा सत्र पर? क्या तो प्रधानमंत्री और क्या मंत्री किसी के भी मुंह से वह सत्य निकला जो दुनिया बोल रही है या दुनिया मान रही है! इसलिए क्योंकि सत्य अब भारत में ‘डेड’ है। यों सब है लेकिन झूठ व पाखंड के खोखे में तब्दील। हां, भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है पर वह कलियुगी भगवान मोदी की आरती उतारता हुआ है! तो लोकतंत्र असल हुआ या खोखा? चुनाव है पर चुनाव आयोग बेईमान है। विपक्ष है पर ईडी, सीबीआई, लालच, लाठी मे बंधा हुआ। ऐसे ही मीडिया है लेकिन उसकी आवाज-अभिव्यक्ति खरीदी हुई है या भयाकुल। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति आदि के ढेरों संवैधानिक पद हैं लेकिन एक व्यक्ति की इच्छा-अनिच्छा से बने ये मात्र चेहरे हैं जो बन कर केवल बैठते है या मांगने पर बेचारे इस्तीफा दे देते हैं। इकोनॉमी विशाल है पर इकोनॉमी का खोखा सौ-सवा सौ करोड़ राशन-खैराती भीड़ से भागता हुआ है। और खोखे की दशा इतनी बुरी है कि यदि चीन सामान बेचना बंद कर दे तो बाजार खाली हो जाए! तो ऐसी इकोनॉमी को ‘डेड’ कहेंगे या जिंदा?

बावजूद इसके नोट रखें, प्रधानमंत्री मोदी पंद्रह अगस्त के बाद ट्रंप के साथ टैरिफ सौदा पटाएंगे। क्योंकि ट्रंप के पास गौतम अडानी नाम का वह टेंटुआ है, जिसे उन्होंने ज्योंहि मरोड़ा भारत उनकी शर्तों पर समझौता करेगा। हालांकि वे तब भी संतुष्ट नहीं होने हैं। वे पाकिस्तान के सगे होते लग रहे हैं। वे मोदी से मनमाना समझौता करा कर यदि क्वाड के लिए अक्टूबर में भारत आए भी तो संभव है पाकिस्तान होते हुए आएं। तब सोचिएगा भारत की उस विकट दुर्दशा पर, जहां पाकिस्तान-चीन दोनों मिलकर भारत से सटी पूरी सीमा पर सेनाओं का साझा ठोस मोर्चा बनाए हुए दिखेंगे वही ऊपर से ट्रंप इस्लामाबाद में जनरल मुनीर के साथ लंच करते हुए!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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