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ट्रंप क्यों भारत को जलील कर रहे हैं?

ट्रंप

समझ में नहीं आने वाली बात है। भारत से ट्रंप का ऐसा क्या दुराव जो एक दिन वे भारत के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र कपड़ा उद्योग से आयात करने की उदारता दिखाते हैं और अगले दिन बांग्लादेश से वह व्यापार संधि करते हैं, जिससे भारत के कपड़ा उद्योग की जान निकल जाए! दक्षिण एशिया में भारत अपने आपको अमेरिका का पसंदीदा देश भी न कह सके और बांग्लादेश-पाकिस्तान खिलखिलाएं! भारत की व्यापार, विदेश कूटनीति का सबसे बड़ा झटका अमेरिका की बांग्लादेश से व्यापार संधि है। भारत सोच रहा था बांग्लादेश का पत्ता कटा। उसके वस्त्र उद्योग की जगह भारत के वस्त्र उद्योग के अच्छे दिन लौटेंगे। लेकिन ट्रंप ने तुरंत भारत की जगह अमेरिका से कपास और धागा खरीदने का बांग्लादेश का रास्ता बनवाया। बदले में अपना बाज़ार बांग्लादेश निर्मित रेडीमेड कपड़ों के लिए खोल दिया।

यह क्या भारत को ठेंगा दिखाना नहीं? जाहिर है ट्रंप चिढ़े हुए हैं। भारत से या नरेंद्र मोदी से? सवाल इसलिए है क्योंकि भारत और अमेरिका के संबंध मोदी और ट्रंप के पहले से ही भावनात्मक थे। अमेरिका में ही भारतीय बसना पसंद करते हैं। वहीं भारत के डॉक्टर हों या प्रोफेसर या आईटी, मैनेजमेंट कर्मी, सभी का अमेरिका में दिल खोल स्वागत हुआ है।

मतलब नरेंद्र मोदी से पहले भारत में अमेरिका के प्रति अपनापन था। याद करें कैसे डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार दांव पर लगाकर अमेरिका से एटमी करार किया था। पीवी नरसिंह राव ने कैसे बिल क्लिंटन के संग कूटनीति में पाकिस्तान का अमेरिका से छिटकाव बनाया और आईटी कर्मियों के लिए नए वीजा बनवाए!

जबकि नरेंद्र मोदी के कारण, ट्रंप के रवैए से भारत के किसानों, मजदूरों से लेकर कुलीनों में अमेरिका के प्रति कितनी निगेटिविटी बन रही है? राहुल गांधी ने लोकसभा में बेबाकी से कहा कि मोदी सरकार ने भारत माता को बेच दिया। और सरकार के पास जवाब इसलिए नहीं है क्योंकि ट्रंप का दो टूक ऐलान है कि भारत से आए सामान पर अमेरिका टैरिफ वसूलेगा, वहीं भारत जीरो टैरिफ पर अमेरिकी सामान आने देगा!

क्या कोई स्वाभिमानी देश ट्रंप की ऐसी जिद, मनमानी को बरदाश्त करेगा?

इसलिए ट्रंप के सभी बयान देखें, हर बार नरेंद्र मोदी का नाम होता है, ग्रेट नेता, ग्रेट फ्रेंड जैसे जुमलों में। जाहिर है ट्रंप माइंड मोदी-फोकस्ड है। उन्होंने धारण किया हुआ है कि मोदी ऐवें ही हैं। तभी तो यह डायलॉग भी कि मैं मोदी का राजनीतिक करियर खत्म करना नहीं चाहता! (I don’t want to destroy his political career)। तभी मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की विश्व नेताओं के आगे लल्लचपो की कूटनीति से ट्रंप मान बैठे हैं कि मोदी ऐवें ही हैं। ऐसी जब सोच बने तो दंभी नेता परपीड़ा-सुख यानी सैडिस्टिक प्लेज़र में भी जीता है। ऐसा ट्रंप का अंदरूनी राजनीति में व्यवहार है तो विदेश नीति में भी है।

तभी मोदी और ट्रंप की राम-मिलाई जोड़ी है। आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने भी तो पिछले 12 वर्षों में विपक्षी नेताओं, मीडिया और लुटियन दिल्ली तथा देश भर के कुलीनों को तरह-तरह से डरा कर वैसे ही परपीड़ा का सैडिस्टिक प्लेज़र लिया है, जैसे ट्रंप उनकी बोलती बंद किए रखते हैं। मेरा मानना है, तभी नरेंद्र मोदी इन दिनों ट्रंप और राहुल गांधी को लेकर दिन-रात सोचते होंगे कि इनका क्या करें, इनसे कैसे निपटें? क्यों नहीं ट्रंप के यहां भी ईडी, सीबीआई भेज देते!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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