इस सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिल्ली से हल्ला होगा कि भारत उनकी कमान में AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता – नकली बुद्धि) का विश्व गुरु बना। देखो, दुनिया आई है और भारत से ज्ञान ले रही है! सवाल है इस नकली बात का असल क्या है? वही है जो इस 12 फरवरी को देश के कई इलाकों में मज़दूर संघों और किसान संगठनों के नारों में गूंजा। इनका नारा था- नरेंद्र मोदी, सरेंडर मोदी। सो, भले इस सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी को फोटोशूट से फुरसत नहीं हो। उन्हें फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला के गले लगना है। वैश्विक हस्तियों के साथ फोटो खिंचवानी है। पर इस सबके पीछे भारत चुपचाप इक्कीसवीं सदी की उस एआई क्रांति के यूज़र बाज़ार बनने के लिए गर्दन हिलाता हुआ होगा, जिससे भारत माता की बुद्धि पूरी तरह वैश्विक (अमेरिकी) कंपनियों के सर्वरों से प्रसारित नकली बुद्धि में दक्ष आरंभ करने लगे!
कैसे? जवाब है वैसे ही जैसे अमेरिकी गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा कंपनियों के ढांचे के प्लेटफॉर्म, एप्लिकेशनों में भारत की 140 करोड़ आबादी आज निर्भर है। कल्पना करें- यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया, विंडोज़ या एप्पल या एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम यदि किसी दिन भारत के बाज़ार से गायब हो जाएं, वे काम करना बंद कर दें, तो भारत का जीवन कितना रुक जाएगा? तथ्य है कि भारत इनका सबसे बड़ा बाज़ार है। इनका भारत पर एकाधिकार है। इससे विज्ञापन, सब्सक्राइबर और खरीद के ज़रिए भारत के लोगों ने अमेरिकी कंपनियों का अरबों डॉलर का मुनाफ़ा बनवाया है।
और भारत माता की संतानों को यह भी जानना चाहिए कि ऐसा चीन ने नहीं होने दिया। चीन में गूगल नहीं है। उसका खुद का सर्च इंजन चीन द्वारा ही निर्मित तथा चीनी भाषा केंद्रित है। आईटी-इंटरनेट की पहली क्रांति में चीन ने गूगल, फेसबुक जैसी अमेरिकी कंपनियों को अपने बाज़ार में घुसने नहीं दिया। उसने अपने सभी प्लेटफॉर्म खुद बनाए। खोज इंजन, अपने क्लाउड, अपने सोशल नेटवर्क- सब अपना। चीन ने सार्वभौमिकता की रक्षा के लिए सरकार-नियंत्रित वह डिजिटल दीवार बनाई, जिससे घरेलू तकनीकी कंपनियां दिग्गज अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले खड़ी हों।
वैसे ही अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चौथी मानव क्रांति में चीन ने सर्वोच्चता बनाने के लिए खुद बड़े पैमाने पर निवेश किया। बाहर की कंपनियों को आने नहीं दिया। उसने दूरदृष्टि के साथ बहुत पहले दुर्लभ खनिज के खनन से लेकर सेमीकंडक्टर निर्माण की रिसर्च-तकनीक, औद्योगिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ढांचा बनाया। वही उसने क्लाउड, डेटा सेंटर, निगरानी प्रणाली, सैन्य एआई प्रणालियां, औद्योगिक स्वचालन, इन सबको एक समेकित रणनीति के तहत विकसित किया है।
चीन में सब कुछ चीन का है। उसकी प्रतिस्पर्धा उन्नत चिप तकनीक के मामले में केवल अमेरिका से है। और वह लगभग आत्मनिर्भर है। उसने सब कुछ यानी पूरी संरचना खड़ी की है। वही निर्माता है। उसके बाज़ार में अमेरिकी ओपनएआई, गूगल डीपमाइंड व एंथ्रोपिक जैसे फाउंडेशन मॉडल के उपयोग की ज़रूरत नहीं है। चीन ने स्वयं मूलभूत एआई अनुसंधान, प्रतिष्ठान, प्रोडक्ट, कंप्यूटिंग क्षमता, चिप निर्माण का वह इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया है, जिसके बूते भविष्य में वह दुनिया के बाज़ारों में वैसे ही छाएगा, जैसे दुनिया की फैक्टरी बनकर वह मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात में सिरमौर बना है।
जबकि भारत क्या करता हुआ है? वह भारत की भीड़, उसके लिए बने आधार, यूपीआई, कोविन जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना आदि (Aadhaar, UPI, CoWIN-style infrastructure) की परतों में डिजिटल क्षमता, स्टार्टअप ऊर्जा और तकनीकी भविष्य के जुमलों से विदेशी कंपनियों को न्योता दे रहा है। इसी से दिल्ली के वैश्विक एआई सम्मेलन में नगाड़े का यह शोर होगा कि भारत नए तकनीकी युग यानी एआई का अगुवा है। जबकि तथ्य है कि भारत केवल एआई का बड़ा उपयोगकर्ता है। विशाल जनसंख्या, तेजी से बढ़ता डिजिटल बाज़ार, बहुभाषी समाज, ये सब विदेशी एआई कंपनियों के लिए अवसर हैं। पता है, भारत ओपनएआई कंपनी का पहले ही विशाल ग्राहक बाज़ार हो गया है।
भारत में एआई का काम उच्च स्तरीय अमेरिकी एआई मॉडल पर आश्रित है। मतलब तकनीक की हर ऊपरी या बुनियादी परत (चिप, मूल मॉडल, वैश्विक प्लेटफॉर्म) में भारत का कुछ भी अपना नहीं है। वह हर तरह से निर्भर है। भारत उन्नत GPU और सेमीकंडक्टर आयात कर रहा है, तो उसकी भीड़ का डेटा भी उस क्लाउड संरचना में जमा है, जिन पर बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण है। सवाल है, भारतीय कंपनियां, स्टार्टअप कंपनियां क्या कर रही हैं? मोटामोटी विदेशी एआई मॉडल पर परत चढ़ाकर स्थानीय एप्लीकेशन बना रही हैं।
तभी गंभीरता से सोचें, इक्कीसवीं सदी में भारत विकसित होगा या विकसित गुलामी (वह भी कृत्रिम बुद्धि से नियंत्रित) का विकसित बाज़ार?


