राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

अमेरिका में मस्क, भारत में अंबानी-अडानी

बेचारे इलॉन मस्क! मस्क किसी डोनाल्ड ट्रंप या किसी अन्य राष्ट्रपति की कृपा से बने क्रोनी उद्योगपति नहीं हैं। उनको दुनिया का नंबर एक फ्यूचरिस्टिक उद्यमी माना जाता है। बैटरी की कार, सेटेलाइट से इंटरनेट, रियूजेबल सेटेलाइट व्हीकल, मंगल पर बस्ती जैसी परियोजनाएं उनकी है। भारत का कोई उद्यमी ऐसा नहीं है, जो कुछ नया कर रहा हो। भारत में सरकार माई बाप की कृपा से खरबपति बने हैं या बन रहे हैं। इसके बावजूद अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की क्रोनी कैपिटलिस्ट प़ॉलिसी का चेहरा मस्क बने। मस्क की अध्यक्षता में एक कमेटी बना कर उन्होंने सरकारी विभागों से लोगों की छंटनी कराई। उसके बाद ऐसा मैसेज बना, जैसे ट्रंप खास फेवर मस्क को कर रहे हैं। हालांकि मस्क का सारा ध्यान अपने परिवार की संपत्ति बढ़ाने में था। उनके बेटे, दामाद और खुद उन्होंने खूब जम कर संपत्ति बनाई।

इन सबके बीच जिस तरह भारत में अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर दिखाई जा रही है और सात फीसदी की दर से जीडीपी बढ़ने का ढोल पीटा जा रहा है वैसा ही कुछ अमेरिका में भी हो रहा था। अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी छलांग मार रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसे घोड़े पर सवार होकर शेयर बाजार और आर्थिकी सरपट दौड़ रहे हैं। लेकिन किसी भी क्रोनी कैपिटलिज्म वाली व्यवस्था में होता है वैसे ही अमेरिका में सारी कमाई और संपत्ति चुनिंदा लोगों के पास इकट्ठा होने लगी और मस्क उसका चेहरा बने क्योंकि वे दुनिया के पहले ट्रिलिनेयर बने थे। एक तरफ चुनिंदा लोग बेहिसाब संपत्ति बना रहे थे तो दूसरी ओर लोगों की आय कम हो रही थी या स्थिर हो गई थी और महंगाई बढ़ रही थी। तभी लोगों ने न तो ट्रंप की ओर से पांच हजार डॉलर दिए जाने की घोषणा को याद रखा और न मस्क की ओर से स्पेसएक्स का एक एक शेयर बच्चों को देने की घोषणा से प्रभावित हुए। उन्होंने ट्रंप को हराया।

इसी तरह भारत में अंबानी और अडानी की स्थिति है। हालांकि मस्क और इन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। फिर भी नरेंद्र मोदी की क्रोनी कैपिटलिस्ट पॉलिसी के सबसे बड़े लाभार्थी ये दोनों हैं और इसलिए ये दोनों ही आम भारतीय की नजर में विलेन बने हैं। ये दोनों भी तमाम तरह के उपाय कर रहे हैं, अपनी छवि बदलने के लिए दस तरह के काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र के करजत में रिलांयस समूह की ओर से नीता मुकेश अनंत आश्रय बनवाया जा रहा है, जहां अनाथ व बेसहारा बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को रखने की व्यवस्था होगी। ऐसे ही वनतारा में पशुओं का पुनर्वास हो रहा है। ऐसे ही महाकुंभ के समय गौतम अडानी ने विशाल भंडारा लगाया और कई दिन तो खुद खड़े होकर श्रद्धालुओं की सेवा करते रहे।

इस किस्म की तमाम ब्रांडिंग और पीआर एक्सरसाइज के बावजूद अंबानी और अडानी दोनों नरेंद्र मोदी की सरकार की क्रोनी कैपिटलिज्म वाली नीतियों का प्रतीक बने हैं। इन दोनों के ऊपर सत्ता परिवर्तन का कितना असर होगा यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन इन दोनों के कारण नरेंद्र मोदी की सरकार और पूरी भाजपा कठघरे में है। अमेरिका की तरह भी भारत में कोई भी व्यक्ति किसी आर्थिक आंकड़े से प्रभावित होता नहीं दिख रहा है। उसके लिए सात फीसदी की विकास दर या पांच फीसदी की महंगाई दर का क्या मतलब है, जब उसकी आय नहीं बढ़ रही है और वह महंगाई से परेशान है! भारत में भी लोग मान रहे हैं कि सत्ता की तरह संपत्ति का भी केंद्रीकरण हुआ है। बिना एआई जैसी किसी क्रांति के चुनिंदा कारोबारियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है और उनकी संपत्ति बेहिसाब बढ़ रही है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment