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इस ईद को मुसलमान नहीं भूलेगा!

और सभी तरह के मुसलमान। शिया हो या सुन्नी, देवबंदी हो या बरेलवी, कश्मीर के अब्दुल्ला-मेहबूबा-इंजीनियर हों या हैदराबाद के ओवैसी या फिर मलेशिया-खाड़ी में दुबके जाकिर नाईक हों या दाऊद, या इस्लामाबाद में फील्ड मार्शल मुनीर से लेकर लादेन, बगदादी के तमाम तरह के अनुयायी। सभी गरजने और भौकाल बनाने वाले! पृथ्वी पर छितरे इस्लाम के सवा दो अरब बंदों को तरह-तरह से बहकाते हुए। जैसे यह कि अल्लाह ने अपनी पवित्र भूमि में रेत से अधिक धन बिखेरा। पानी की जगह तेल दिया। मुझे ध्यान है, कुछ दशक पहले भारत में ट्रकों के नीचे की तेल की टंकी पर लिखा मिलता था, ‘इराक का पानी’! पैग़म्बर के जन्मदिन के मिलाद जुलूस में भी ग्लोब यानी दुनिया का नक्शा हरे रंग में रंगा हुआ सबसे आगे दिखता था! अर्थात दूसरे धर्मों को यह सियासी मैसेज कि देखो, देखो दुनिया वालों, हरे रंग में पृथ्वी रंग रही है!

मगर सोचें, इस सदी के 9/11 से 28 फरवरी 2026 या 23 अक्टूबर 2023 को पैराग्लाइडर से उतरे हमास के आतकियों की तारीखों पर। पिछले ढाई दशकों का क्या लब्बोलुआब है?

जवाब में भारत में मुसलमानों के झंडाबरदार रहे डॉ. जाकिर नाईक निश्चित ही बोलेंगे कि यह सब खुदा की प्लानिंग है! या यह वाक्य कि खुदा अपने बंदों की परीक्षा ले रहा है! पर जनाब डॉ. नाईक, जिस मलेशिया देश में शरण लिए हुए हैं, उसके प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस सप्ताह क्या गुहार लगाई? “अंतरराष्ट्रीय कानून और मानव गरिमा” का हवाला देते हुए उन्होंने रोना रोया कि रमज़ान के आख़िरी दिनों और ईद के दौरान भी इज़राइल ने अल अक्सा मस्जिद को नमाज़ के लिए बंद कर रखा है!

यह मस्जिद मक्का, मदीना जैसा इस्लाम का पवित्र स्थान है। यही शुरुआती इस्लाम में पहली क़िबला (नमाज़ की दिशा) थी। पैग़म्बर मोहम्मद के मिराज (स्वर्गारोहण) से जुड़ी स्मृति का स्थल है। सोचें, इस हकीकत पर इस ईद आधुनिक इस्लाम (मक्का-मदीना) का संरक्षक, दुनिया में वहाबी इस्लाम की कट्टरता को मुस्लिम घरों में पहुंचाने वाला, अंधविश्वासों के बुर्कों में धर्म को बंद कराते हुए लादेन, बगदादी, इमरान खान, जनरल मुनीर पैदा करने वाला सऊदी अरब क्या-क्या कर रहा है? वह या तो राष्ट्रपति ट्रंप से उस ईरान से अपने बचाव की गुहार कर रहा है, जिसने अल अक्सा मस्जिद को कब्जाने, बंद करने, फिलिस्तीनियों को बेरहमी से मारने के खिलाफ धमकियां दीं। इज़राइल के आगे अपने आपको कागजी शेर की तरह खड़ा किया।

तभी यह ईद कैसी-कैसी विडंबनाओं से भरी है! मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि खाड़ी-अरब के शेख, किंग, प्रिंस सभी मिलकर ईद के बाद ईरान पर खुद ही सीधे मिसाइल, ड्रोन मारना शुरू कर दें।

कल्पना करें, भारत के मुसलमान एक बाबर की मस्जिद का रोना बनाए बैठे थे। वही इज़राइल अल अक्सा मस्जिद तथा सऊदी अरब मक्का-मदीना मस्जिद की मूल धर्म स्मृति के स्थल होने के बावजूद इस्लाम के बंदों के साथ कैसा धोखा-छल करते हुए है? सऊदी अरब-खाड़ी देशों ने दुनिया के मुसलमानों को हर तरह से बहकाया। इज़राइल के खिलाफ भी बहकाया। फर्जी शिक्षा के दुनिया भर में मदरसे खोले। अंधविश्वासों के वायरस से नायक-ओवैसी से लेकर लादेन, बगदादी, खुमैनी, मुनीर इस थीसिस के पैदा किए कि हम साथ-साथ नहीं रह सकते। पूरी मानवता को हमें काले बुर्कों में, हरे रंग में ढालने की जिहाद करनी है। कितने हवा में उड़ रहे थे! पचास साल पहले खुमैनी को सत्ता मिली नहीं कि पहले दिन से इज़राइल को नक्शे से मिटाने की घोषणा की।

मैं यहूदी-इज़राइल समर्थक रहा हूं, इसलिए क्योंकि कुछ भी हो, एक प्राचीनतम धर्म के लोगों को उनकी मूल जमीन में दो गज जमीन तो मिलनी चाहिए। यही सनातन सोच का मनुष्य विवेक है। इसलिए इज़राइल को बनाना या उसका बनना गलत नहीं था, लेकिन बनते ही अरब देशों ने अपनी चौधराहट में उससे लड़ाई छेड़ी। तभी से इज़राइल अपनी बुद्धि के बल से सुरक्षा में सतत खोया रहा है! मेरा अब मानना है कि इस ईद से नेतन्याहू ग्रेटर इज़राइल बनाने (यानी नाइल से यूफ्रेट्स-यरूशलम-गाज़ा-वेस्ट बैंक) के ऐतिहासिक-आध्यात्मिक मिशन को पूरा कराने की दिशा में देश को बढ़ा देंगे!

पर उससे पहले क्या होगा? संभवतः ईरान बनाम खाड़ी-अरब देशों में सीधी लड़ाई। सो, ऐसी ऐतिहासिकता भरी ईद को क्या कोई भुला सकता है?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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