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नागरिक तो सिर्फ सरकारी अधिकारी!

इस देश का नागरिक कौन है? यह सवाल फिर 140 करोड़ लोगों के सामने है। अब तक मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआऱ के मामले में बार बार यह कहा जा रहा था कि आधार या वोटर आईडी कार्ड नागरिकता का आधार नहीं है। यह सिर्फ पहचान या वोट डालने के लिए है। लेकिन अब सरकार ने कहा है कि पासपोर्ट भी नागरिकता प्रमाणित करने वाला दस्तावेज नहीं है। सोचें, पासपोर्ट बनाते समय कितनी तरह की जांच होती है, कितने तरह की पूछताछ होती है, जन्म स्थान से लेकर अस्थायी पते तक की जांच की जाती है और तब उसमें प्रामाणिक तौर पर नागरिकता कॉलम के सामने भारतीय लिखा जाता है। लेकिन अब सरकार उसे भी नागरिक होने का आधार नहीं मान रही है। तभी सवाल है कि इस देश के नागरिक कैसे प्रमाणित करेंगे कि वे नागरिक हैं?

असल में भारत का कोई भी आम आदमी नागरिक है ही नहीं। वैसे भी उसको कोई नागरिक अधिकार तो मिले नहीं हैं। वह पूरी तरह से इस देश के सरकारी अधिकारियों के रहमो करम पर निर्भऱ है। हैरानी की बात है कि सिर्फ आम आदमी हीं नहीं, राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री सहित इस देश के तमाम चुने हुए प्रतिनिधि भी स्थायी नागरिक नहीं हैं। वे भी अस्थायी नागरिक हैं। उनकी भी अस्थायी नागरिकता का प्रमाण कोई न कोई सरकारी अधिकारी जारी करता है। किसी सरकारी अधिकारी के सामने खड़े होकर राष्ट्रपति के उम्मीदवार को भी नामांकन दाखिल करना होता है और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को भी नामांकन दाखिल करना होता है। वह नामांकन स्वीकार करता है और उसकी जांच करके उसे मंजूरी देता है। वह चाहे तो नामांकन खारिज कर दे। इसी तरह चुनाव जीतने के बाद सांसदों, विधायकों सहित सभी जन प्रतिनिधियों को कोई न कोई अधिकारी ही प्रमाणपत्र जारी करता है। प्रखंड कार्यालयों से लेकर जिला कार्यालय और राज्यों से लेकर केंद्र तक में चुनाव आयोग में सरकारी अधिकारी बैठे हैं, जो चुने हुए प्रतिनिधियों को अस्थायी नागरिकता का प्रमाण पत्र देते हैं।

सो, सरकारी अधिकारी स्थायी नागरिक है और चुने हुए प्रतिनिधि अस्थायी नागरिक हैं। ऐसा होने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि आम आदमी या 140 करोड़ की भीड़ से अलग कुछ हजार या लाख लोगों के पास एक अतिरिक्त दस्तावेज होता है। अधिकारियों के पास नियुक्ति का और जन प्रतिनिधियों के पास चुने जाने का। उसी आधार पर वे नागरिक होते हैं। जिन लोगों के पास वह अतिरिक्त दस्तावेज नहीं है वह नागरिक हो ही नहीं सकता है चाहे उसका जन्म 1987 से पहले हुआ या उसके बाद हुआ हो और चाहे उसके पास जन्म से लेकर आवास और पढ़ाई के प्रमाणपत्र हों या आधार, वोटर आईकार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट कुछ भी हो।

दूसरा कारण यह है कि सरकारी अधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों को ही नागरिक सुविधाएं मिलती हैं। व्यावहारिक रूप से देखें तो जिन लोगों को नागरिक सुविधाएं प्राप्त हैं उन्हीं को तो नागरिक कहेंगे बाकी लोग तो ऐसे ही भीड़ हैं। भीड़ का क्या अधिकार होता है! नागरिक अधिकार का मतलब है कि आपको अच्छी नौकरी हो, जिसमें नियमित वेतन मिलता हो, आपके लिए आवास की व्यवस्था हो, बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था हो, अच्छी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो, पीने का साफ पानी मिलता हो, आवागमन के लिए सुगम यातायात की व्यवस्था हो, संकट के समय सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान हो, यह सब इस देश में कितने लोगों को मिलता है! यह सब सिर्फ सरकारी अधिकारियों और सांसदों, विधायकों आदि को मिलता है। इसलिए वे नागरिक हैं। सामान्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित किसी व्यक्ति को भला कैसे नागरिक कहा जा सकता है?

सरकारी अधिकारी यानी स्थायी नागरिक और चुने हुए प्रतिनिधि यानी अस्थायी नागरिकों को नागरिक सुविधाओं से अलग भी ढेरों सुविधाएं मिलती हैं। ऊपर जिन नागरिक सुविधाओं की बात की गई है वह सब इन लोगों को लगभग मुफ्त में मिलती हैं। इसके अलावा उनको विशेषाधिकार मिलते हैं। हर सेवा में उनको प्राथमिकता मिलती है। मंदिरों में पूजा पाठ करने से लेकर विमान में चढ़ने उतरने तक में उनके लिए खास व्यवस्था होती है। अधिकारी तो कुत्ता घुमाने के लिए पूरा स्टेडियम खाली करा लेते हैं। उन्हे भ्रष्टाचार का विशेषाधिकार भी मिला होता है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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