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पुतिन ने पांच लाख रूसी सैनिकों को मरवा दिया!

कभी रूस भी महाशक्ति हुआ करता था! मगर मात्र एक नेता पुतिन के कारण उसने भी वह गंवा दिया है जो महाशक्ति की शान थी। बुधवार को ब्रितानी खुफिया एजेंसी (GCHQ) की प्रमुख ने चौंका दिया। बताया कि पिछले चार वर्षों में कोई पांच लाख रूसी सैनिकों ने जान गंवाई! सोचें, इस संख्या पर। पहले निर्वासित रूसी मीडिया संस्थानों का अनुमान 3.52 लाख मौतों का था। इन संस्थानों का आधिकारिक मृतक उत्तराधिकार (प्रोबेट) अभिलेखों के आधार पर अनुमान था।

पर ब्रिटेन की खुफिया प्रमुख ऐन कीस्ट-बटलर के अनुसार यूक्रेन आक्रमण के बाद से रूस लगभग पांच लाख रूसी सैनिक गंवा चुका हैं। अब यूक्रेन के भीतर युद्धक्षेत्र में रूसी सेना पीछे हटती दिख रही है। पश्चिमी देशों के अनुमानों में अप्रैल महीने तक रूसी सेना के हताहतों (मृतक और घायल) की संख्या प्रतिमाह औसतन 30 हजार थी। हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने भी कहा है कि रूस के 15 से 20 हजार सैनिक हर महीने मारे जा रहे हैं।

तभी आश्चर्य नहीं जो रूस में सैनिकों की कमी है। रूसी मोर्चे पर उत्तर कोरिया, अफ्रीकी देशों से लेकर पाकिस्तान, भारत आदि के लोगों के मोर्चे में मरने, घायल होने की खबरें भी आईं। एक अनुमान के अनुसार रूस प्रतिदिन लगभग आठ सौ से एक हजार नए सैनिक भर्ती कर रहा है, यानी प्रति माह 25 से 31 हजार के बीच। रूसी परिवारों में फौज में भर्ती से नौजवानों को बचाने के लिए क्या-क्या होता है, इसकी आए दिन खबरें आती हैं।

सोचें, रूस कथित महाशक्ति है और यूक्रेन उसे चार साल से छका रहा है। ईरान और यूक्रेन की तुलना नहीं हो सकती है लेकिन ट्रंप इन दिनों जैसी हताशा में हैं, कभी सर्द-कभी गर्म हैं तो अर्थ क्या है? बावजूद इसके ट्रंप आदत से मजबूर हैं। सो, अभी भी कभी क्यूबा, कभी ओमान व लातीनी अमेरिकी देशों को धमकाते हुए हैं। यूरोप से यूक्रेन को मदद है इसलिए विश्व राजनीति में यूरोप की उपस्थिति चुपचाप अपनी जगह कायम है। लेकिन अमेरिका और रूस तो कही के नहीं हैं! और इन दोनों का फिलहाल कौन सहारा है? चीन और पाकिस्तान!

उफ! विश्व राजनीति का यह मुकाम। पाकिस्तान को हल्का नहीं लेना चाहिए। उसने ट्रंप का भरोसा जीता हुआ है तो चीन का भी जीत रख रहा है। मामूली बात नहीं है कि ईरान की कूटनीति करते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ बीजिंग गए और शी जिनपिंग से मुलाकात की तो दोनों ने भारत के खिलाफ साझा बयान दिया। बाद में एक-सवा घंटे की क्वाड बैठक के बहाने अमेरिका के विदेश मंत्री ने भारत की चार दिन की यात्रा की लेकिन उससे भारत का एक हित नहीं सधा।

जो हो, पुतिन से रूस अब एकदम अप्रासंगिक हैं। भारत न तीन में न पांच में। नई हैसियत पाकिस्तान की है। वह चीन, अमेरिका और रूस तीनों का पिट्ठू है तो सऊदी अरब, खाड़ी देशों में अपने सैनिकों को तैनात कर रहा है। इतना ही नहीं ईरान का भरोसा बना कर होर्मुज खाड़ी की चौकीदारी, इस्लामी देशों की सुरक्षा ठेकेदारी संभालने के दांवपेंच भी चल रहा है। यह सब कुछ करते हुए उसने दुनिया की मुस्लिम बिरादरी के आगे दो टूक ऐलान किया है कि वह किसी कीमत पर इजराइल को देश नहीं मानेगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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