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ट्रंप जैसे मोदी भी डुबाएंगे!

ट्रंप

किसको? जवाब है- भाजपा, संघ परिवार और उस लोकतंत्र को, जिसके कारण 2014 से पहले वैश्विक लोकतांत्रिक बिरादरी में भारत का नाम सम्मान के साथ लिया जाता था। तब हिंदुओं का अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप सभी तरफ बढ़ता जलवा था। जबकि 2014 के बाद से शुरू समय में आज क्या है? वैसे ही जैसे ट्रंप के हाथों अमेरिका की प्रतिष्ठा और मागा आंदोलन से जुड़े ईसाई दक्षिणपंथी भक्तों की आज बदनामी है। इसलिए मोदी के शासन में समाज, लोकतंत्र, राजनीति और आर्थिकी की दशा से आगे राष्ट्रवादी हिंदुओं, भाजपा और संघ की प्रतिष्ठा का बाजा बजना भी तय है। मोदी ने ट्रंप की तरह देश को तेरे-मेरे में बांटा है, नफरत और बदले की राजनीति फैलाई है। सो, परिणाम वही होगा जैसा अमेरिका में ट्रंप का हुआ है। हां, ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नारेबाजी वाले ट्रंप के समर्थकों की चुनाव नतीजों के बाद अब जो स्थिति बनी है, उसका भारत के संदर्भ में भी भारी मतलब है।

अमेरिका में जैसे ट्रंप के खिलाफ मन ही मन निश्चय बना, वैसे ही भारत में माहौल पकता हुआ है। ट्रंप के छह साल और नरेंद्र मोदी के बारह साल का फर्क इतना भर है कि ढाई सौ साल पहले लिखे गए अमेरिकी संविधान में नागरिकों, राज्यों के अधिकारों, अदालत, संसद, मीडिया आदि की स्वतंत्रता की जड़ें बहुत गहरी बनाई गईं। वैसा भारत में नेहरू-पटेल-आंबेडकर और संविधान सभा ने नहीं किया। तभी नरेंद्र मोदी ने भारत के लोकतंत्र की जड़ें बेरहमी से खोदी। लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं की नौटंकी बनवा दी।  समाज को उन्होंने जैसा बांटा है, हिंदू घरों में भी भक्त बनाम विवेकी परिवारजनों में जो विग्रह बनाया है तो भविष्य में परिणाम भी वैसे ही भुगतने होंगे। उस नाते अमेरिका में ट्रंप के बाद रिपब्लिकन पार्टी भले जिंदा रहे। वह फिर पांच-दस साल बाद जलवा बना लेगी। लेकिन मोदी-शाह की बदौलत भाजपा और संघ की भारत में वह दुर्दशा होगी जैसे समकालीन इतिहास में हिंदू महासभा की या रामराज्य परिषद, स्वामी करपात्री की हुई थी।

अमेरिका के मध्यावधि चुनावों ने वही बताया है जिसका भारत अनुभव करता हुआ है। ट्रंप की तरह नरेंद्र मोदी-अमित शाह-मोहन भागवत की आंखों पर भी सत्ता की पट्टी बंधी है। जबकि भारत के अपने इतिहास का सत्य है कि लोकतंत्र में लोग किसी को जिताने से पहले सत्ता में बैठे चेहरे को हराने का संकल्प धारते हैं। लोगों का मन हराने की ठानता है। पर सत्ता की पट्टी से नरेंद्र मोदी-अमित शाह-मोहन भागवत या अमेरिका में ट्रंप का ख्याल था और है कि यदि सामने लल्लू, पप्पू हैं तो लोग तो उन्ही के सर्वशक्तिमान चेहरे पर ही वोट करेंगे। लेकिन भारत के अनुभव में जरा सोचें, 1977 में इंदिरा गांधी, 1989 में राजीव गांधी और फिर वाजपेयी व मनमोहन सिंह पर फैसला क्या चुनावों में लोगों के इस मौन इरादे को बताता नहीं था कि इस प्रधानमंत्री को तो अब हराना है। इंदिरा गांधी को अनुशासित भारत का, वाजपेयी को शाइनिंग इंडिया पर घमंड था। दोनों के आगे विकल्प का एक भी ताकतवर चेहरा नहीं था। न ही पार्टी थी (हां, मार्च 1977 के चुनाव से ठीक पहले जनवरी में नेताओं ने जनता पार्टी बनाई, जबकि 2004 में वाजपेयी के सामने सोनिया थीं और वाजयेपी को हराने के बाद यूपीए बना था)। फिर भी भारत के मतदाताओं ने इंदिरा, वाजपेयी को वैसे ही हराया जैसे अभी ट्रंप को अमेरिकियों ने हराया है। 2014 में भी मोदी की जीत इसलिए थी क्योंकि लोगों का मन तब मनमोहन सरकार को हराने के लिए पका था।

अमेरिका के चुनाव में सर्वशक्तिमान ट्रंप (छप्पन इंची छाती के मोदी से भी अधिक ताकतवर, भक्तों के मसीहा) के आगे एक भी राष्ट्रीय स्तर का डेमोक्रेटिक चेहरा नहीं है। पर चुनाव ने अपने आप एक साथ प्रादेशिक स्तर पर ऐसे ट्रंप विरोधी नेताओं को उभारा जैसे हाल में भारत में कॉकरोच पार्टी के दीपके, चितले, सौरव दास, रांका, शिंदे आदि पैदा हुए। गुरुवार को जब अमेरिकी चुनाव के नतीजे आ रहे थे तभी मुझे अरुणाचल प्रदेश से आई यह खबर पढ़ने को मिली कि राज्य के गृहमंत्री मामा नातुंग ने यूनिवर्सिटी के छात्रों के कार्यक्रम में जब कहा कि कॉकरोच पार्टी बाहरी लोगों (विदेशी) की मदद से युवाओं को भटका रही है तो मौजूद छात्रों ने उनका जोरदार विरोध किया। हंगामा हुआ।

सो, ठेठ अरुणाचल हो या लद्दाख या दिल्ली, मुंबई अब 65 प्रतिशत युवा आबादी के प्रतिनिधि छात्रों, नौजवानों का जज्बा सोशल मीडिया, मीम्स के साथ जंतर-मंतर पर लाठी खाने को भी तत्पर हैं। क्या इससे अपने आप बदलाव, मोदी को हराने का मन नहीं बन रहा होगा? घरों में चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया एक गोलमाल की तरह चर्चित महै। वोटों की हेराफेरी से चुनाव जीतने की धारणा आम हो गई है। इसी तरह की बातों से ट्रंप के खिलाफ भी घर-घर माहौल बना। तभी किसी भी चुनावी सर्वे में ट्रंप की इतनी बुरी हार का अनुमान नहीं था। ट्रंप की पूरी मशीनरी, उनका बेइंतहां पैसा खर्च, सोशल मीडिया-टीवी चैनलों की भक्ति से लेकर चुनाव-मतदान प्रक्रिया को दस तरह से प्रभावित करने की उनकी तिकड़मों के बावजूद रिपब्लिकन पार्टी का जैसा सूपड़ा साफ हुआ है वह सभी लोकतांत्रिक देशों के लिए सबक है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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