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वीबी जी रामजी के नाम पर

हिसाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मनरेगा योजना खत्म करनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद 2015 में उन्होंने कहा था यह योजना कांग्रेस की विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है। आजादी के 60 साल बाद भी कांग्रेस गरीबों को गड्ढे खोदने का काम दे रही थी और यह उनकी विफलता को दर्शाता है। पर उसके बाद क्या हुआ? मोदी सरकार ने बिना काम के लोगों को सब्सिडी, पैसा बांटना शुरू किया। कोई सौ करोड़ लोगों को सीधे लाभार्थी बनाया, नोट के बदले वोट की राजनीति पकाई। और इस एक जुलाई को पुरानी मनरेगा योजना का नया नाम ‘वीबी जी रामजी’ (विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण या VB-G RAM G) दे कर लागू किया है।

इसमें कहने के लिए कांग्रेस से आगे बढ़ कर एक सौ की बजाय 125 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है। लेकिन खर्च का चालीस प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारों के मत्थे मढ़ दिया है। राज्य सरकारें पहले से ही वित्तीय संकट में है। केंद्र सरकार खुद बुरी दशा में है और वह राज्यों को उनके हक का पैसा देने में भी कंजूसी, टालमटोल का रवैया अपनाए हुए है। मार्च 2026 तक राज्यों को केंद्र की कोई 17 हजार करोड़ रुपए की देनदारी थी, जिसमें 78 सौ करोड़ रुपए मनरेगा मजूदरी के थे। अब एक जुलाई से केंद्र सरकार ने मनरेगा का नाम बदल कर जी राम जी कर गांव-देहात के राम, राम सा बोलने वाले लोगों में नई ब्रांडिंग शुरू की है। पर असल में उसके पीछे होगा क्या?

हाल में मुझे देहात में नई रियलिटी मिली। खेतीहर घर के एक माली का बताना था किसान सब्सिडी के दो हजार रुपए तो आ गए हैं लेकिन मुख्यमंत्री ऐसा निकम्मा है जो उसके साथ राज्य से आने वाले हजार रुपए अभी तक नहीं भेजे। फिर अपनी जीविका का ब्योरा देते हुए बताया बुढ़िया (मां) गांव ही रहती है, मनरेगा में रजिस्टर्ड है, तीन सौ रुपए के हिसाब से दस-पंद्रह दिन का काम हर महीने आ जाता है। पर अब बता रहे है नई ‘जी राम जी’ नाम से नया कुछ हो रहा है। पता नहीं आगे क्या हो।

सोचें, योजना को हल्का (मनरेगा के रजिस्टर मजूदरों की नई मुश्किलों में) करके उस पर ‘जी राम जी’ का नाम चस्पायां है। पर पैसा पहले की तरह नहीं बंटेगा। तब लोग क्या महसूस करेंगे? ‘जी राम जी’ के नाम पर यह कैसी ठगाई! कांग्रेस में महात्मा गांधी के नाम की मनरेगा और हिंदू राष्ट्र के समय में ‘जी राम जी’! इससे रामजी का नाम बनेगा या बिगड़ेगा?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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