चुनाव आयोग ने जब से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम शुरू किया तब से चार राज्यों के चुनाव हुए हैं। एसआईआर के बाद पहला चुनाव बिहार में हुआ और लगभग 10 फीसदी वोटिंग बढ़ गई। आमतौर पर वोटिंग बढ़ने को सरकार के बदलाव का संकेत माना जाता रहा है लेकिन बिहार में 10 फीसदी वोटिंग बढ़ी तो सत्तारूढ़ गठबंधन को ऐतिहासिक जनादेश मिला। उसके बाद एसआईआर जिन राज्यों में हुआ है उनमें से दो राज्यों केरल व असम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में मतदान हुआ है। इन तीनों राज्यों में भी मतदान प्रतिशत बढ़ा है। पुडुचेरी में पांच फीसदी मतदान बढ़ा है और पहली बार 90 फीसदी के करीब वोट पड़े हैं। केरल में पिछली बार के 75 फीसदी के मुकाबले इस बार 78 फीसदी और असम में 82 फीसदी के मुकाबले 85 फीसदी मतदान हुआ है। सो, मतदान प्रतिशत बढ़ने का पहला कारण तो यह दिख रहा है कि मतदाता सूची से मृत मतदाताओं, फर्जी मतदाताओं और स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए लोगों के नाम कटने का असर हुआ है। इसके अलावा इन तीनों राज्यों में राजनीतिक जागरुकता भी एक कारण है, जिसकी वजह से इन राज्यों मे हमेशा ज्यादा वोटिंग होती है।
सवाल है कि वोटिंग बढ़ने का क्या असर इन राज्यों के चुनाव नतीजों पर हो सकता है? सिर्फ वोटिंग बढ़ने की वजह से नतीजे प्रभावित नहीं होंगे। तीनों राज्यों में अलग अलग राजनीतिक कारणों का असर जरूर नतीजों पर पड़ेगा। अगर केरल की बात करें तो मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन के खिलाफ कोई भारी एंटी इन्कम्बैंसी नहीं लेकिन 10 साल के शासन से एक थकान है मतदाताओं में। केरल पांच साल में सत्ता बदलने वाला राज्य रहा है। यानी वहां के मतदाता पांच साल में ही सरकार से थक जाते हैं। सो, 10 साल लगातार किसी के सत्ता में रहने से उसके थकान स्वाभाविक है। इसके अलावा विजयन ने हिंदू मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का जो प्रयास किया वह थोड़ा ज्यादा हो गया। ओबीसी समुदाय की एझवा जाति के नेता नतेशन के साथ उनकी नजदीकी ने मुस्लिम मतदाताओं को नाराज किया। नतेशन मुस्लिम विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं। ध्यान रहे पिछली बार मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त वोट लेफ्ट को मिला था, जिससे कासरगौड, कोझिकोड, कन्नूर, वायनाड जैसे उत्तरी क्षेत्र से लेकर दक्षिण में तिरूवनंतपुरम तक उसने अच्छा प्रदर्शन किया।
इस बार एक तरफ तो भाजपा एझवा व नायर सेवा समिति के जरिए हिंदू मतदाताओं को अपनी ओर कर रही है और दूसरी ओर मुस्लिम ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने की संभावना है। अगर मुस्लिम व ईसाई पहले से ज्यादा कांग्रेस की ओर जाते हैं और थोड़ा बहुत हिंदू वोट और भाजपा को मिलता है तो वहां सत्ता बदल सकती है। यानी केरल कांग्रेस के लिए संभावना वाला प्रदेश दिख रहा है। हालांकि यह सिर्फ मतदान प्रतिशत बढ़ने से नहीं होगा, इसके राजनीतिक कारण हैं। कांग्रेस के अंदर पूरे चुनाव में यह समस्या रही कि वह विजयन के मुकाबले एक चेहरा नहीं पेश कर सकी। उसके आधा दर्जन नेताओं को मुख्यमंत्री का दावेदार बताया जाता रहा।
केरल से सटे केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में कांग्रेस. डीएमके और वीसीके का अलायंस ठीक काम नहीं कर रहा है। कांग्रेस की जिद के चलते अलायंस में गड़बड़ हुई। कांग्रेस ने खुद 16 सीटें ले लीं और वीसीके के लिए सिर्फ एक सीट छोड़ी। डीएमके पिछली बार 13 सीट लड़ी थी और छह पर जीती थी, जबकि कांग्रेस 14 सीट लड़ कर सिर्फ दो सीट जीत पाई थी। इस बार भी अगर पुडुचेरी में कांग्रेस और डीएमके गठबंधन का खेल बिगड़ता है तो जिम्मेदार कांग्रेस होगी। वहां 90 फीसदी के करीब लोगों ने मतदान किया है। कांग्रेस से अलग हुए रंगास्वामी की पार्टी ने पिछली बार 10 और भाजपा ने छह सीटें जीती थीं।
असम में कांग्रेस इस बार बिना बदरूद्दीन अजमल के ही मुस्लिम वोट एकमुश्त मिलने की उम्मीद कर रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अजमल की पार्टी से तालमेल नहीं किया था और कांग्रेस के रकीबुल हसन ने धुबरी सीट पर अजमल को हरा दिया था। निचले असम में कांग्रेस इस वजह से भरोसे में है तो ऊपरी असम में जोरहाट सीट से गौरव गोगोई चुनाव लड़ रहे हैं, जो वहां से सांसद हैं। लोकसभा चुनाव में जोरहाट की 10 में से नौ सीटों पर कांग्रेस को बढ़त मिली थी। इसके अलावा कांग्रेस ने अहोम पहचान की राजनीति की है। गौरव गोगोई ने अखिल गोगोई की रायजोर दल और लुरिनजोत गोगोई की असम जातीय परिषद के साथ तालमेल करके अहोम वोट साधने का प्रयास किया है।
दूसरी ओर भाजपा जीत की हैट्रिक बनाना चाहती है। हिमंत बिस्वा सरमा ने सारे दांव आजमाए हैं। सबसे कारगार दांव परिसीमन का दिख रहा है, जिसकी वजह से राज्य की 126 सीटों में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 39 से घट कर 22 के करीब रह गई है। सरमा और दूसरे भाजपा नेताओं ने घुसपैठ या दूसरे आधार पर ध्रुवीकरण का खुल कर प्रयास किया है। राज्य में तीन फीसदी वोट ज्यादा हुआ है। वहां भी बाकी राज्यों की ही तरह सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ने से कोई बड़ा फर्क नहीं आएगा लेकिन राजनीतिक समीकरणों का फर्क पड़ सकता है। भाजपा ने विकास और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दोहरी रणनीति अपनाई है। इसका उसको लाभ मिल सकता है।


