बिहार विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने को झोंका है। कह सकते हैं कि भाजपा ऐसे ही चुनाव लड़ती है। मोदी और शाह हर चुनाव में अपने को ऐसे ही झोंकते हैं। नतीजा चाहे कुछ भी हो। एक चुनाव के बाद वे दूसरे चुनाव में लग जाते हैं और यही उनकी तासीर है। इसी अंदाज में दोनों बिहार का चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि दोनों को अंदाजा है कि बिहार इस अंदाज में नहीं जीता जाता है। आखिर दोनों ने 2015 के विधानसभा चुनाव में इससे ज्यादा दम लगाया था। तब मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी। पहली बार पूर्ण बहुमत से केंद्र में सरकार बनी थी। बिहार ने लोकसभा चुनाव में बिना नीतीश के एनडीए को 32 सीटें दी थीं। लेकिन 2015 का विधानसभा चुनाव डिजास्टर हुआ था। भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हम का गठबंधन सिर्फ 59 सीटें जीत पाया था। तब नीतीश, लालू और कांग्रेस ने भारी बहुमत पाया।
तभी मोदी और शाह को पता है कि बिहार जीतने के लिए उनको नीतीश की जरुरत है। यही कारण है कि उसके बाद एक भी चुनाव दोनों नीतीश के बगैर नहीं लड़े। वे दूसरे गठबंधन में चले गए तो वहां से लाकर एनडीए में उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा गया। इस बार का चुनाव भी नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव का है। नीतीश को रखना या नहीं और तेजस्वी को लाना है या नहीं, पर चुनाव हो रहा है। लेकिन मोदी और शाह ने अपने को इसलिए झोंका है ताकि चुनाव के बाद नतीजों का क्रेडिट ले सकें कि हमने भी बड़ी मेहनत की है। दूसरा कारण यह है कि चुनाव के बाद अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो बीमार हो चले नीतीश की जगह किसी समय अपना मुख्यमंत्री बनाया जाए।
इसका तीसरा और बड़ा कारण यह है कि दोनों कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं क्योंकि अगले साल बड़े चुनाव होने हैं और उसके अगले साल तो और भी अहम चुनाव हैं। तभी मोदी और शाह ने अपने को झोंका है और अपने तमाम नेताओं को बिहार में उतारा है। भाजपा ने कारपेट बॉम्बिंग की है। दो केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री चुनाव प्रभारी के तौर पर चुनाव लड़ा रहे हैं। उनके केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री बिहार के गांवों, कस्बों में भटक रहे हैं। उनको कुछ भी अंदाजा नहीं है कि वे क्यों बिहार में हैं लेकिन वे प्रचार कर रहे हैं।
मोदी और शाह को पता है कि बिहार के चुनाव नतीजे का असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर होगा और उससे पहले विपक्ष के साथ साथ भाजपा कार्यकर्ताओं और विश्व बिरादरी को भी संदेश देना है कि मोदी भले बाहर के हर मोर्चे पर घिरे हों लेकिन देश में उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है। इस लिहाज से यह बहुत अहम चुनाव है क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर, सीजफायर विवाद और अमेरिकी टैरिफ व वीजा विवाद के बाद का यह पहला चुनाव है। मोदी इसलिए अपने को झोंके हुए हैं ताकि चुनाव जीतें तो यह संदेश बने कि उनकी लोकप्रियता कायम है और उन्होंने बिहार में चुनाव जिताया। यह संदेश विश्व बिरादरी, कॉरपोरेट, नौकरशाही सबके लिए होगा। इसके नतीजे पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव पर भी निश्चित रूप से असर डालेंगे।
ध्यान रहे पश्चिम बंगाल और असम में बड़ी संख्या में बिहार के लोग रहते हैं। उन पर जो असर हो लेकिन नतीजों का मनोवैज्ञानिक असर चुनाव में होगा। अगर एकजुट ‘इंडिया’ ब्लॉक बिहार में हारता है तो झारखंड की हार का दाग धुलेगा और पश्चिम बंगाल के लिए भी मैसेज होगा कि वहां ममता बनर्जी को हराया जा सकता है। असल में पश्चिम बंगाल में भाजपा ने पिछला चुनाव सबसे ताकतवर तरीके से लड़ा था और उसको इसका बड़ा फायदा मिला था। उसका वोट प्रतिशत 10 से बढ़ कर सीधे 38 हो गया था। उसे 28 फीसदी अतिरिक्त वोट मिले थे। यह वोट कांग्रेस और लेफ्ट मोर्चे का था। दोनों साथ लड़ कर एक भी सीट नहीं जीत पाए थे। इस बार उसके मुकाबले बंगाल में थोड़ा कम उत्साह है क्योंकि उस जीत के बाद ममता बनर्जी ने अपनी स्थिति मजबूत की है, जबकि भाजपा का नेतृत्व आपसी विवाद में बिखरा है।
इसी तरह असम में लगातार 10 साल के राज के बाद भाजपा के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी है। हिमंत बिस्वा सरमा की सारी राजनीति सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाली है। बिहार में अगर एनडीए जीतता है तो भाजपा इसको सामाजिक समीकरण और विकास की राजनीति की जीत बता कर असम में प्रचार करेगी। केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में इसका ज्यादा असर नहीं होना है। फिर भी अगले साल के पांच राज्यों के चुनाव का पूर्वाभ्यास बिहार में हो रहा है। पांच राज्यों के चुनाव के बाद 2027 में सात राज्यों के चुनाव हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश और गुजरात भी शामिल है। बिहार का बड़ा असर गुजरात में होगा। बिहार में भी विपक्षी गठबंधन, जिसके नेता तेजस्वी यादव हैं वह पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर लड़ रहा है। अगर यह समीकऱण फेल होता है तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव पर दबाव बढ़ेगा।


