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सबकुछ चुनाव खातिर

जाहिर है महिला आरक्षण बहस पश्चिम बंगाल के चुनाव को प्रभावित करने के लिए और अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों के चुनाव पर असर डालने के लिए है। संसद और संविधान दोनों जरिया है। संविधान में संशोधन के जरिए नारी शक्ति वंदन कानून बना था और अब ढाई साल के बाद फिर संविधान में 131वें संशोधन का बिल पेश कर दिया गया। उसी कानून को बदलने की कोशिश हुई, जो लागू भी नहीं हो सका था। इसके लिए तीन दिन के विशेष सत्र की घोषणा कर दी गई। वह भी ऐसे समय में जब राज्यों के चुनाव चल रहे हैं। चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में मतदान की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही यह घोषणा हो गई कि सरकार लोकसभा में सीटें बढ़ाने जा रही है और महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने जा रही है।

इसी को प्रियंका गांधी वाड्रा ने कुटलिता कहा। असल मे सरकार की कोई मंशा महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने की नहीं थी। उसको यह भी पता था कि संसद के दोनों सदनों में सत्तापक्ष के सांसदों की जो संख्या है उसके आधार पर विशेष बहुमत से संविधान संशोधन बिल को पास नहीं कराया जा सकता है। ध्यान रहे पिछले चुनाव में भाजपा ने बहुमत गंवा दिया था। उसे 240 सीटें मिली थीं और बाकी सहयोगी पार्टियों को मिला कर 293 सीटें उसके पास हैं। इस समय लोकसभा में 15 सांसद ऐसे हैं, जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। लेकिन इसमे असदुद्दीन ओवैसी भी हैं तो जेल में बंद इंजीनियर राशिद और अमृतपाल सिंह भी हैं। चंद्रशेखर राव की पार्टी भी है तो जगन मोहन रेड्डी भी हैं। सो, सरकार इन सबके समर्थन की उम्मीद भी नहीं कर सकती है। दूसरी ओर विपक्ष के पास 233 सांसद हैं। इसका अर्थ है कि संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए जिस लोकसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों के दो तिहाई बहुमत की जरुरत है वह संख्या सरकार के पास नहीं है। अगर सभी सांसद मौजूद रहें तो बहुमत का आंकड़ा 360 सीट का बनता है।

सरकार जानती थी कि बिल पास नहीं हो पाएगा। इसके बावजूद उसने संविधान संशोधन का बिल पेश किया। उसका मकसद यह था कि सितंबर 2023 की तरह अगर विपक्ष पर महिला आरक्षण का दबाव बना कर इसे पास करा लिया तो बहुत अच्छी बात है। दीर्घावधि के प्रोजेक्ट यानी परिसीमन का रास्ता भी साफ हो जाएगा और महिला आरक्षण का रास्ता भी साफ हो जाएगा। लेकिन साथ ही कुटिलता भी मन में थी कि अगर विपक्ष अड़ जाएगा और परिसीमन के कारण महिला आरक्षण का मामला अटकता है यानी बिल पास नहीं हो पाता है तो विपक्ष को महिला विरोधी ठहरा कर चुनाव प्रचार किया जाएगा। सोचें, पहले भी महिला आरक्षण के बिल आते रहे हैं और कांग्रेस व भाजपा दोनों बड़ी पार्टियों की हिप्पोक्रेसी के कारण अटकते रहे हैं। लेकिन इस तरह की कुटिलता दिखा कर, जिसे चाणक्य नीति या मास्टरस्ट्रोक का नाम दिया जाता है, किसी सरकार ने विपक्ष को बदनाम करने का प्रयास नहीं किया था। यह सिर्फ विपक्ष को बदनाम करने का प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि जनता की आंख में धूल झोंकने का भी प्रोजेक्ट था। यह मान लिया गया था कि जनता को जो कहेंगे वह मानेगी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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