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मोदी से नाराज हिंदू जाएगा कहां?

यह आज का यक्ष प्रश्न है। मेरा मानना है कि भक्त हिंदू मोदी का बना रहेगा। बुरे हालातों, बेरोजगारी, बेगारी, हताशाओं के बावजूद नरेंद्र मोदी को वोट देते रहेंगें। लेकिन उनकी संतानें दें, इसकी गारंटी नहीं हो सकती। पर मोटामोटी उत्तर भारत के हिंदू भक्तों के साथ मोदी का भावनात्मक जुड़ाव कायम है। उसके मनोविज्ञान में मुसलमान हैं। राम हैं। धर्म है। भक्ति, अंधभक्ति, अंधविश्वासों, झूठ और इनकी गंगा-जमुना बहाती सोशल मीडिया के प्रवचक हैं, संघ परिवार के अविवेकी लाठीधारी हैं।

कांग्रेस (राहुल) की दीमक है लेफ्ट-5

जाहिर है इस हकीकत को न राहुल गांधी बूझ सकते हैं न उनके इर्द गिर्द के चेहरे, अखिलेश, तेजस्वी या सोशल मीडिया का समानांतर प्रगतिशील नैरेटिव। कह सकते हैं लुटियन दिल्ली की पुरानी जमात पुरानी ही है। वामपंथी, प्रगतिशील, सीपीआई एमएल का छात्र संगठन, कन्हैया एंड पार्टी नेहरू के समय भी समस्या थी। इसने आम हिंदू घर-परिवारों की भाषा, उसके धर्म, उसकी भक्ति, उसके मनोविज्ञान को समझा नहीं। न ही हिंदू-मुस्लिम मनोभावों में चिंता, सुरक्षा का पोस्टमार्टम किया। ये केवल और केवल धूल में लट्ठ मारते हुए संघ परिवार को दोषी करार देते गए।

इसलिए मुश्किल है जो लेफ्ट-प्रगतिशील विवेक से नैरेटिव बना सकें। 2029 का चुनाव लड़ पाए। सोचें, जंतर-मंतर पर लड़के-लड़कियों की बहादुरी बनाम विपक्ष के जज्बे, नैरेटिव बनाने की क्षमता के अंतर पर।

जुलाई से अब तक के अनुभवों में कॉकरोच, जंतर-मंतर आंदोलन, जनरेशन जेड की इंस्टाग्राम-सोशल मीडिया पर प्रभुता विपक्षी दलों की कुल हैसियत से कई गुना अधिक प्रकट हुई है। इससे नरेंद्र मोदी-अमित शाह, योगी, भाजपा-संघ की सीमाएं, हवा बिगड़ने की वास्तविकताएं खुली हैं? मगर पहली बात, यह राहुल गांधी, अखिलेश यादव, प्रशांत किशोर या तेजस्वी यादव आदि की बदौलत नहीं है। जो हुआ है, हवा जो बदलती लगती है उसकी वजह मोदी सरकार, भाजपा, संघ परिवार के स्वंय के अहंकार और उसकी बुद्धिहीनता है।

तेरह वर्ष की सत्ता के बाद नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ा विपक्ष राहुल गांधी नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी का अपना शासन है। बेरोजगारी है। पेपर लीक हैं। भर्ती और परीक्षाओं की अव्यवस्था है। महंगाई है। छोटे-मझोले धंधों की मुश्किल है। संस्थाओं की विश्वसनीयता का सकंट है। ऊपर से सत्ता का वह आत्मविश्वास जो अहंकार में हर तरह से कनवर्ट है। उसके लिए हर आलोचना में षड्यंत्र, हर असहमति में दुश्मन और हर सवाल में राष्ट्र-विरोध देखने की आदत है। इससे उसका समर्थक भी थका है।

यही भाजपा-संघ की आने वाली मुश्किल है। हिंदू मानस को हमेशा भय में नहीं रखा जा सकता। हर चुनाव में मुसलमान, पाकिस्तान, घुसपैठिया, धर्म-संकट, मंदिर-मस्जिद और सभ्यता के खतरे की मात्रा बढ़ाते जाना अंततः diminishing return पैदा कर रहा है, कम से कम नई पीढ़ी के दिल-दिमाग में तो। मतलब जिस घर का लड़का चार साल से नौकरी खोज रहा हो, वहां पांचवें साल केवल धार्मिक गौरव से रसोई नहीं चलती। जिस पिता ने बेटी को पढ़ाने में अपनी कमाई लगा दी और परीक्षा का पेपर लीक हो गया, उसके लिए राष्ट्र का गौरव और शासन की अक्षमता दो अलग अनुभव नहीं रहते।

लेकिन क्या इससे कयास भी लगा सकते हैं कि हिंदू कांग्रेस की ओर लौट रहा है?

यहीं राहुल गांधी और उनके सलाहकारों की सबसे बड़ी भूल होगी। मोदी से मोहभंग और कांग्रेस से अनुराग एक चीज नहीं है। भाजपा से नाराज हिंदू अपने आप सेकुलर-प्रगतिशील नहीं होता। योगी से नाराज नौजवान अपनी धार्मिक स्मृति नहीं खोता। संघ से ऊबा व्यक्ति अचानक मनुस्मृति, पितृसत्ता और बहुसंख्यकवाद की वैचारिक भाषा में अपने जीवन को समझने नहीं लगता। वह नरेंद्र मोदी को छोड़ सकता है पर फिर भी राम को नहीं छोड़ेगा। यह फर्क 2026 से 2029 के मध्य भारत को लगातार अनुभव में होगा।

इसलिए विपक्ष के मायनों का अगले तीन वर्षों का सवाल है कि क्या राहुल गांधी, विपक्ष जनरेशन-जेड से भी मोदी-विरोधी वोटों का प्रबंधन कर सकेगा? या नरेंद्र मोदी के मोहभंग के युवा लक्षणों को भुनाते हुए कांग्रेस नया सामाजिक आधार बना सकेगी? अपनी हवा बना सकेगी? यहां एक और एक दो की गणित नहीं, बल्कि एक और एक ग्यारह की उस हवा की है जो जंतर-मंतर पर सर्वजनीय तौर पर प्रकट हुई। वह क्या अगले यूपी चुनाव के समय जातियों में, तात्कालिक भावनाओं, मोदी-योगी विरोधी नैरेटिव में बदल सकती है?

विपक्ष में कांग्रेस ही क्योंकि धुरी है तो उसका मामला केवल जातियों की जोड़-घटाव से नहीं बनना है। इस मामले में एक तो मोदी-शाह खुद तीसमार खां हैं। दूसरे, जाति की राजनीति में उसके मुकाबले क्षेत्रीय पार्टियों के नेता अलग से हैं। मुसलमान के सामरिक वोट में भी क्षेत्रीय पार्टी का वजन ज्यादा होता है। इसलिए क्योंकि आम धारणा में स्थानीय स्तर पर भाजपा को सबसे प्रभावी ढंग से वही हरा सकती है। उधर दलित अस्मिता में स्वतंत्र दलित नेतृत्व है। मायावती कम ही सही वोट काटने की अब भी क्षमता लिए हुए है तो चंद्रशेखर का उत्तर प्रदेश, बिहार में अलग वोट कटवा वजूद बन रहा है। उस नाते कांग्रेस की अपनी खास तुरूप (unique proposition) तभी संभव है जब आम हिंदू उसे वैसे ही अपना प्रतिनिधि माने जैसे गांधी के समय में और बाद में भी दशकों कांग्रेस को माना गया।

यानी वह मानस, वह मतदाता जिसे उसकी जाति पहचान का महत्व मिले तो जाति में कैद भी न किया जाए। जो हिंदू है तो कांग्रेस उसके हिंदू होने से असहज न हो। जो मुसलमान है उसे भय दिखाकर स्थायी वोट बैंक न बनाया जाए। दलित को न्याय मिले लेकिन उसे जीवन भर केवल उत्पीड़ित की पहचान में न रखा जाए। स्त्री को समानता और स्वतंत्रता मिले मगर उसके हर पारिवारिक-सांस्कृतिक संबंध को पितृसत्ता की जेल समझने की वैचारिक मूर्खताएं न हो। गरीब को मदद मिले लेकिन लक्ष्य उसे स्थायी लाभार्थी बनाए रखना नहीं, बल्कि कमाने और ऊपर उठने योग्य, काबिल बनाने का हो।

इन्हीं सूत्रों में कांग्रेस का नया सामाजिक गठबंधन शायद छिपा है, पहचान मिटाने में नहीं, पहचान से ऊपर साझा आकांक्षा बनाने में। तमाम पहचानों और आंकाक्षाओं का एक भारतीय छाता। उसकी कोशिश या नियत, इरादों का मैसेज बनेगा तो जनरेशन जेड याकि युवाओं की नई पीढियां कांग्रेस की और, राहुल गांधी-प्रियंका की तरफ बढ़ने लगेंगी।

नई पीढ़ी सहित 30-35 वर्ष से कम उम्र के नौजवानों का पुराने अर्थ में न कांग्रेस से प्रेम है, न भाजपा से जन्मजात निष्ठा। उसे फिलहाल परीक्षा चाहिए जो समय पर हो। पेपर चाहिए जो लीक न हो। डिग्री चाहिए जिसकी बाजार में कीमत हो। नौकरी चाहिए जिसमें सम्मानजनक वेतन हो। कारोबार करना चाहे तो नियम और पूंजी चाहिए। लड़की है तो स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों चाहिए। लड़का है तो बीस-पच्चीस वर्ष की उम्र में घर वालों पर निर्भर रहने की बेबसी या बेगारी से छुटकारा चाहिए।

जाहिर है इस पीढ़ी को पांच किलो राशन देकर हमेशा नहीं बांधा जा सकता तो केवल संविधान की किताब दिखाकर समर्थक भी नहीं बना सकते। उसका सबसे बड़ा प्रश्न अब हिस्सेदारी से पहले उत्पादक काबलियत, समर्थ डिग्री (productive capacity)का है, मैं क्या बन सकता हूं, क्या कमा सकता हूं, कितनी स्वतंत्र, अपनी जिंदगी जी सकता हूं?

जैसा मैंने इस सीरिज में पहले लिखा कि इन्हीं सवालों पर राहुल गांधी के 2015 वाले “सूट-बूट” सरकार की आलोचना में उनके आज के जाति-हिस्सेदारी विमर्श से अधिक ठोस संभावना थी। आर्थिक गैरबराबरी का प्रश्न गलत नहीं है। आर्थिकी, महंगाई, भ्रष्टाचार, तानाशाही भारत की राजनीति, जनमानस में उथल पुथल लाने वाले प्रामाणिक कारण रहे हैं। न मंडल, न कमंडल। भले इंदिरा गांघी का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा था, या भष्टाचार के खिलाफ ‘संपूर्ण क्रांति’ का जेपी नारा, इमरजेंसी के खिलाफ जनता की मौन बगावत या 2012-14 के मध्य में जंतर-मंतर में भ्रष्टाचार विरोधी गूंज। ऐसे ही मोदी आर्थिकी अर्थात ‘अच्छे दिन’ के नारे से घर-घर पहुंचे थे। काले धन को खत्म करके घर-घर पंद्रह लाख देने के वादे पर। न कि मंडल से या 2024 में राम मंदिर से (उलटे भाजपा की सीटें यूपी में ही कम हुई)। एक और उदाहरण है भाजपा ने 2009 का चुनाव लौह नेतृत्व (मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी) के नारे पर लड़ा था। रथयात्रा करने वाले आडवाणी लोगों ने कैसा ठुकराया था?

उस नाते मेरा ठोस मत है कि भारत के लोगों (भक्त हिंदुओं के नौजवानों में भी) आर्थिक असमानता, अवसरों-नौकरियों के खत्म होने जैसी आर्थिक मुश्किलों का ज्वालामुखी अंदर ही अंदर खदबदा रहा है। ऐसे में प्रश्न यह होना चाहिए, नैरेटिव का केंद्र बिंदु, चुंबक यह होना चाहिए कि भारत में संपत्ति और अवसर कुछ हाथों में क्यों सिमटते हुए हैं? बारह वर्षों में अडानी-अंबानी कहां से कहां पहुंचे? वही इंजीनियरिंग कॉलेज, मैनेजमेंट कॉलेज की डिग्री लिए लड़के-लड़कियों नौकरी के लिए कैसे व कितना भटक रहे हैं? पहले की तरह अच्छी नौकरी क्यों नहीं मिल रही? छोटे उद्यमी क्यों नहीं बढ़ रहे? एक सामान्य परिवार का बच्चा भला क्यों अपनी दिनरात की मेहनत, कंपीटिशनों के बावजूद नौकरी नहीं पा रहा है? उठ नहीं पा रहा है?

जाहिर है जाति-जनगणना जैसे मंडली, जातिवादी जुमले इस तस्वीर का मात्र एक एक्स-रे हो सकते हैं। लेकिन एक्स-रे इलाज नहीं होता।

दरअसल आर्थिक रियलिटी, सवाल ही राहुल के लिए, कांग्रेस के लिए संभावनाओं का पिटारा है। कितना किसके पास है यह जानना जरूरी है, मगर राजनीति का अंतिम काम मौजूदा संपत्ति को केवल हिस्सों में बांटना नहीं है, बल्कि नई संपत्ति और नए अवसर पैदा करना भी है। सौ रुपए को जातियों में न्यायपूर्ण बांटने का सवाल जरूरी है मगर उससे पहले की बुनियादी जरूरत भारत को सौ से हजार रुपए की अर्थव्यवस्था बनाना है? कौन बनाएगा? चंद अडानी-अंबानी? या जनरेशन जेड़?

यही पुरुषार्थ का प्रश्न है। यही स्वावलंबन का। और यही गांधी के स्वराज से लेकर आधुनिक उद्यमशील भारत तक की वह कड़ी है, जिसे कांग्रेस ने अधिकार और हिस्सेदारी, सशक्तीकरण जैसी जुमलेबाजी की राजनीति में लगभग भुला दिया है।

वापिस सवाल है राहुल गांधी और कांग्रेस क्या आज ऐसे सरोकारों या आइडिया (सोचें 2014 के शब्द- अच्छे दिन) सोचने-देने में समर्थ हैं? जो भक्त हिंदू को भी सोचने को मजबूर करे? पर इस तरह की ग्रासरूट, जमीनी राजनीति-नैरेटिव में समर्थ खांटी कांग्रेसियों के राहुल गांधी के पास चेहरे ही नहीं है जैसे गांधी-नेहरू-इंदिरा तक लोग हुआ करते हैं। जो इधर-उधर हैं भी वे राहुल के सर्कल से बाहर हैं। अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खड़गे, सीपी जोशी, दिग्विजय सिंह, जर्नादन द्विवेदी आदि पुराने कांग्रेस नेताओं का अर्थ अब दिखावे का है? मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी को सोनिया गांधी भी समझा सकें। तब कौन हैं नए नेता, नौजवान पर कथित पकड़ के कथित दिमागदार? हास्यास्पद लिस्ट है। हां, आज राहुल के राजनीतिक, संगठनात्मक और वैचारिक घेरे के चेहरे हैं- जयराम रमेश, केसी वेणुगोपाल, पवन खेडा, कनिष्क सिंह, सुमन दुबे का बेटा, कन्हैया कुमार, सचिन राव, के राजू आदि-आदि।

सवाल इन लोगों की निजी योग्यता या नीयत का नहीं है। सवाल उस सियासी नब्ज को बूझने (political feedback system) के फीडबैक के सिस्टम का है, जिससे राहुल मौजूदा भारत, मोदी-शाह की काट के जुमलों का इनपुट ले रहे हैं, पढ़ रहे हैं। तभी शायद ही राहुल गांधी को उनके उस जुमले पर डांटा नहीं होगा कि केंद्र सरकार के सचिवों में ओबीसी कितने हैं? क्या नेहरू, इंदिरा, राजीव के राज में ज्यादा थे? इस तरह की बात कर वे देश भर के सर्वजनीय नौजवानों में वाह बनाएंगे? या राहुल को भी तेजस्वी, अखिलेश की जात राजनीति जैसा एक नेता? यह जयराम रमेश, पवन खेड़ा का ज्ञान था या कन्हैया-जेएनयू टोली का या योंगेद्र यादव का?

संभव है राहुल गांधी की सर्वे टीम में उनके जुमलों के उलटे असर के नतीजे नहीं पहुंचते होंगे। क्या कोई उनसे कहता है कि जाति-जनगणना जरूरी हो सकती है लेकिन हर समस्या जाति नहीं है? कि हिंदुत्व और हिंदू अलग बताना पर्याप्त नहीं, हिंदू के साथ सहज संवाद भी चाहिए? कि ‘जेन जी’ को आइडियोलॉजी से पहले अपॉर्चुनिटी चाहिए? कि भाजपा से नाराज सवर्ण नौजवान को केवल ‘प्रीविलेज्ड’ श्रेणी में पढ़ना उसे कही भाजपा की तरफ वापिस धकेल भी सकता है?

नेता की असली परीक्षा अच्छे सलाहकार रखने में नहीं, बल्कि सलाहकारों से बाहर समाज को सुनने में है। और इसमें नरेंद्र मोदी, संघ परिवार से वे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

मतलब नरेंद्र मोदी की सफलता से भी राहुल गांधी को सीखना चाहिए। मोदी ने 2014 में केवल हिंदुत्व से चुनाव नहीं जीता था। हिंदू पहचान उनके पास थी तो उसके ऊपर उन्होंने आकांक्षा पढ़ाई, विकास, नौकरी, भ्रष्टाचार मुक्त सरकार, मजबूत नेतृत्व, गुजरात मॉडल, अच्छे दिन का साझा जादूई डंडा बनाया। हिंदू प्लस सपने (एस्पीरेशन) ने मोदी को वह विस्तार दिया जो केवल मंदिर की राजनीति मात्र नहीं दे सकती थी।

अब जब नरेंद्र मोदी से उम्मीदें, सपने (एस्पीरेशन) टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं तो कांग्रेस के सामने मौका है। मगर राहुल उसका उत्तर ले दे कर ‘Hindu minus Hindutva plus caste’ भर बना दे रहे हैं। अपना, और विपक्ष का बार-बार मैदान छोटा करते हुए।

कांग्रेस, विपक्ष, राहुल को बड़ा सूत्र चाहिए- एक साथ कई सूत्र। धर्म में सहजता + नागरिक बराबरी + आर्थिक अवसर + आधुनिकता + सामाजिक न्याय। कभी कांग्रेस का इसी से अपना मैदान था। वह वापिस हो भी सकता है। न भाजपा का हिंदुत्व, न लेफ्ट की पहचान की राजनीति (identity grid)।

तभी वापस इस सीरिज के पहले कॉलम की थीम पर लौटें- गांधी, राम और रामराज्य।

गांधी को अपना हिंदू होना छिपाना नहीं पड़ता था। वे राम कहते थे, रामराज्य कहते थे, गीता पढ़ते थे, प्रार्थना करते थे और उसी सहजता में मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी सबको बराबर का भारतीय मानते थे। उनका हिंदू भयभीत नहीं था। उसे अपनी रक्षा के लिए लाठीधारी संगठन या किसी कल्कि अवतार की जरूरत नहीं थी। उसकी ताकत अपने धर्म, सत्य, पुरुषार्थ और आत्मविवेक में थी।

कांग्रेस ने पहले उस हिंदू को सेकुलर बनाने की फितूर में उसकी सहजता छीनी। फिर जाति और हिस्सेदारी की राजनीति में उसे टुकड़ों में पढ़ा। जबकि संघ ने उसी खाली जगह में डर बैठाया- मुसलमान का, धर्म के खतरे का, सभ्यता मिटने का। नरेंद्र मोदी ने उस डर को गौरव, भक्ति और वोट में कनवर्ट कर दिया।

अब जुलाई 2026 से जंतर-मंतर पर इकठ्ठा हुई तरूरणाई से जाहिर हुआ सत्य बता रहा है कि नौजवान एक साथ हिंदू भी है, बेरोजगार भी। जातिवाला भी है, नागरिक भी। मंदिर जाता है और नौकरी भी चाहता है। राम को मानता है और भ्रष्ट थानेदार से भी परेशान है। मोदी को वोट दे सकता है और मोदी से नाराज भी हो सकता है। अपनी जाति जानता है लेकिन हर सुबह जाति-जनगणना सोचकर नहीं उठता। उसकी बेटी आधुनिक जीवन चाहती है लेकिन इसलिए अपने घर, धर्म और परिवार को शत्रु नहीं मानती। भारतीय समाज की यही उलझी हुई सहजता दिल्ली के वैचारिक चश्मों (वामपंथी-प्रगतिशील जमात) से बार-बार गायब हो जाती है।

हां, बिहार-पूर्वांचल का ब्राह्मण या फारवर्ड नौजवान यूजीसी के सरकुलर से मोदी राज के खिलाफ उबलता हुआ है लेकिन राहुल गांधी के आइडिया- मनुस्मृति, पितृसत्ता, जाति, आरक्षण, नारी स्वतंत्रता, के जुमले लिए चंगू-मंगुओं की हवाबाजी तथा अखिलेश-चंद्रशेखर आदि की गणित से यूपी में फारवर्ड योगी को रिजेक्ट नहीं करेगा।

हो सकता है कुछ चुनावों में हरा भी दे। यही 2024 का सबक है। मगर अगला सवाल अधिक बड़ा है- उसने भाजपा को हराया या कांग्रेस को चुना? दोनों एक बात नहीं हैं। तभी अपने बूते विपक्ष, कांग्रेस-राहुल गांधी की वह गूंज नहीं बन सकती कि, सिंहासन खाली करो कि जनता (नौजवान) आती है। (समाप्त)

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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