छह जून की सुबह जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की एक मामूली-सी भीड़ जमा हुई। इसकी मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। यूट्यूबर अपने फोन हाथ की दूरी पर पकड़े हुए थे, अपने पीछे खड़े लोगों को फ्रेम में लेकर खुद को रिकॉर्ड कर रहे थे। कई छात्र किनारों पर खड़े तमाशबीन थे। उन्हें खुद नहीं मालूम था कि करना क्या है, नारे क्या लगाने हैं। कुछ लोग फूल लेकर आए थे। कुछ मास्क पहने हुए थे और गर्मी में खुद को हवा कर रहे थे। कुछ ने कॉकरोच का मुखौटा पहना और खुद को गाता हुआ कॉकरोच बता रहे थे। बंद जगह का बंद माहौल उमस भरा, थका हुआ और बेचैन था। दोपहर तक थकान विरोध पर हावी हो गई। फिर प्रदर्शन समाप्त हुआ। मांग रखी गई। पर कुछ नहीं बदला। आज तक कुछ नहीं बदला।
यह उस प्रदर्शन की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है कि भला प्रदर्शन वैसा दिखा क्यों? किसी ने भी उसकी वजह को क्षण भर के लिए गंभीरता से लिया?
बारह वर्ष पहले भारत में विरोध सार्वजनिक जीवन की एक स्वाभाविक विशेषता था। जंतर-मंतर तख्तियों, नारों और बेचैन ऊर्जा से भरा रहता था। देश के दूसरे हिस्सों में मैदान, विश्वविद्यालय परिसर और शहरों के चौक भी वैसी ही मनःस्थिति में अपनी बात, अपना विरोध किए रहते थे। आरक्षण, महंगाई, भ्रष्टाचार, निर्भया, भूमि अधिग्रहण, लोकपाल—एक के बाद एक जन आंदोलनों की लहरें उठती थीं। हर आंदोलन सफल नहीं हुआ। हर मांग सही नहीं थी। लेकिन वे सब मिलकर लोकतंत्र को स्वयं से संवादरत रखते थे। लोकतंत्र जिंदादिल था।
स्वतंत्र भारत हमेशा से सड़क भरना जानता था। उससे पहले भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी सार्वजनिक स्थानों पर एकत्रित लोगों की शक्ति पर खड़ा था—बारडोली में, नागपुर में, पुराने शहरों की गलियों में और मैदानों की धूल में। आजादी के बाद वह सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। बल्कि गणराज्य ने विरोध को लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया के रूप में सामान्य बनाया। 1950 के दशक के भूमि सुधार आंदोलन, भाषाई आंदोलन जिन्होंने राज्यों की सीमाएं बदलीं, 1974 की रेल हड़ताल जिसने तीन सप्ताह तक देश को लगभग ठप कर दिया, गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन जिसने एक मुख्यमंत्री को हटाया, और उसके बाद का जेपी आंदोलन जिसने अंततः एक प्रधानमंत्री की सत्ता, कांग्रेस को हटाकर दिल्ली में गैर-कांग्रेस सरकार बनवाई। ये विनम्र नागरिक अभ्यास नहीं थे। कुछ विघटनकारी थे, कभी-कभी हिंसक भी, और केंद्र सरकारों के लिए अक्सर असुविधाजनक। लेकिन जनता आंदोलनों से चेतना पाती थी। वह राजनीतिक शिक्षा थी, सत्ता से नागरिकों का संवाद भी था।
तब भारतीय समझ में लोकतंत्र केवल चुनावों की प्रक्रिया नहीं था। वह शासित और शासक के बीच चलने वाली सतत बातचीत थी। अदालतों में, विधानसभाओं में और सबसे बढ़कर आंदोलन के रूप में सड़क पर।
1975 का आपातकाल इस सत्य को अनुपस्थिति के माध्यम से सिद्ध करता है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में सड़कों पर चुप्पी बनवा दी थी। विरोध प्रदर्शन प्रतिबंधित हुए, नेता जेल भेजे गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई। परिणाम क्या हुआ? परिणाम दबाव का ऐसा प्रेसर कूकर साबित हुआ, जो एक बंद कक्ष की वोट प्रतिहिंसा में प्रकट हुआ और ज्यों ही 1977 में सड़क को वापस बोलने दिया गया तो उसकी आवाज इतनी तीखी थी कि दशकों से चली आ रही परिवार, सर्वाधिक पुरानी पार्टी की पक्की स्थापित सत्ता एक ही चुनाव में भरभरा कर गिर गई। 1975 में जो विरोध से गुल नहीं खिला, वह 1977 में मतपेटी से प्रकट हुआ। सबक स्पष्ट था—असहमति को दबाने से वह समाप्त नहीं होती, वह चुपचाप सघन और बढ़ती जाती है।
लगता है वह इतिहास, वह सबक भुला दिया गया है।
पिछले बारह वर्षों में विरोध प्रदर्शन कम हुए हैं। इसलिए नहीं कि शिकायतें या असंतोष समाप्त हो गए हैं। बेरोजगारी, महंगाई, परीक्षा-पत्र लीक, असमानता—सभी पुराने प्रश्न अभी भी मौजूद हैं। लेकिन सड़कें पहले की तुलना में अधिक शांत हैं। समस्याओं, शिकायतों की कमी नहीं है। मगर समस्या-शिकायतों के सार्वजनिक रूप, उसकी आवाज, गूंज की कमी है।
2019 और 2020 के नागरिकता संशोधन कानून विरोध प्रदर्शनों ने आपातकाल विरोधी दौर के बाद सबसे बड़ी भीड़ जुटाई। लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई की सड़कों पर लाखों लोग उतरे। शाहीन बाग कुछ समय के लिए पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना। वहां अधिकतर मुस्लिम महिलाएं, जिनमें अनेक बुजुर्ग थीं, दिल्ली की सर्दी में सड़क पर बैठीं और संविधान की प्रतियां हाथों में थामे रहीं। उन्हें महसूस कराया गया था कि शायद वही संविधान अब उन पर लागू नहीं होता।
2020 और 2021 में किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर एक वर्ष से अधिक समय तक डेरा डाले रखा। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे लंबे और सबसे टिकाऊ आंदोलनों में से एक था। वे अपने खेतों से सैकड़ों किलोमीटर दूर थे। सर्दी में, गर्मी में, बारिश में। वे केवल एक लोकतांत्रिक मांग कर रहे थे।
लेकिन शाहीन बाग की महिलाएं मुख्यधारा के राजनीतिक आख्यान में संविधान का प्रयोग करती नागरिक नहीं थीं। उन्हें ट्रैफिक की समस्या करार दिया गया। किसान अपनी आजीविका को लेकर चिंतित नागरिक नहीं थे। वे चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर जाने वाले राजमार्ग को रोकने वाले लोग थे। बहस नागरिकता, कृषि अनुबंधों या विधिक प्रक्रिया से हटकर यात्रा समय और ट्रैफिक पर आ गई। असुविधा स्वयं एक राजनीतिक दलील और श्रेणी बन गई।
ये विरोध प्रदर्शन केवल सरकार द्वारा ही नहीं निपटाए गए। वे इसलिए कमजोर हुए क्योंकि समाज के बड़े हिस्से ने उन्हें लोकतांत्रिक कर्म के बजाय निजी परेशानी के रूप में देखना शुरू कर दिया।
यही वर्तमान समय का सबसे बड़ा राजनीतिक कौशल है। किसी विरोध को कुचलना अब आवश्यक नहीं है, यदि उसे अलग-थलग किया जा सके। शहर को बैरिकेड कर दीजिए। आवाजाही सीमित कर दीजिए। असुविधा को बढ़ने दीजिए। नागरिकों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा होने दीजिए। फिर राज्य पीछे हट सकता है और समाज स्वयं वह काम करने लगता है जो कभी सत्ता को करना पड़ता था। जनता ही कहने लगेगी—बहुत हुआ। बंद करो यह सब!
यहीं सबसे बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। आपातकाल ने विरोध को चुप कराया था। इस दौर ने विरोध का मनोबल तोड़ा है। दोनों में गहरा अंतर है।
जो सत्ता विरोध को हिंसक तरीके से दबाती है, वह अनजाने में अगली प्रतिरोध लहर के लिए चित्र भी पैदा करती है। लाठीचार्ज अक्सर भर्ती पोस्टर बन जाता है। लेकिन मनोबलहीन विरोध में ऐसी ऊर्जा नहीं बचती। वह पहले ही आंशिक रूप से स्वयं को दबा चुका होता है। वह अपनी मांग और अपने प्रदर्शन के बीच का अंतर भूलने लगता है। उसे लगता है कि वायरल होना सुने जाने के बराबर है।
भारत में गुस्सा मौजूद है। यह मान लेना भूल होगी कि ऐसा नहीं है। पर वह व्हाट्सऐप समूहों में बहता है। टिप्पणी हाशियों, खंडों में दिखाई देती है। असंतोष, गुस्सा घरों के भीतर होने वाली बातचीतों में मौजूद रहता है। लेकिन जो गुस्सा संगठित नहीं हो सकता, जो सड़क पर मार्च नहीं कर सकता, जो मांग नहीं कर सकता, जो व्यवधान पैदा नहीं कर सकता, वह अंततः अपना रूप बदल लेता है।
वह दैनिक जीवन की पृष्ठभूमि बन जाता है। मौजूद रहता है, लेकिन तात्कालिक नहीं लगता।
पेपर लीक हो गया। महंगाई बढ़ गई। भ्रष्टाचार जारी है। लेकिन फिर एक वाक्य सामने आता है—सब चल तो रहा है न।
यह वाक्य जितना साधारण लगता है, उतना है नहीं। इसमें एक पूरा राजनीतिक दर्शन छिपा हुआ है। यह संतोष नहीं है। यह शुद्ध निराशा भी नहीं है। यह अपेक्षाओं का प्रबंधन है। देश चल रहा है। भ्रष्टाचार चल रहा है। मेरी जिंदगी भी चल रही है। और इन तीनों को एक-दूसरे के साथ समायोजित कर लिया जाता है। क्योंकि विकल्प महंगा है। इतना महंगा कि उसकी कीमत पहले से नहीं मापी जा सकती।
दिल्ली की सीमा पर तेरह महीने बैठा किसान कम से कम आंशिक रियायत लेकर घर लौटा। लेकिन किसी आंदोलन में शामिल होने वाला छात्र एफआईआर का जोखिम नहीं उठाता। राजनीतिक राय व्यक्त करने वाला मध्यमवर्गीय पेशेवर अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षित हो सकता है। और मनुष्य का मन सचमुच कार्रवाई से बचने के कारण खोजने में बहुत कुशल होता है।
विरोध लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। वे समाजों को बदलने, सुधारने और कभी-कभी स्वयं को पुनर्निर्मित करने की क्षमता देते हैं। लेकिन आज जो दिखाई देता है, वह मनोबलहीन धुएं पर चलती हुई लोकतांत्रिक व्यवस्था है।
जब कोई समाज “चल रहा है न” को अपना प्रमुख राजनीतिक भाव बना लेता है, तब वह वास्तविक अर्थों में स्वयं शासन नहीं कर रहा होता। उस पर शासन किया जा रहा होता है। यह अंतर मामूली नहीं है। और एक बार यह दूरी बहुत अधिक बढ़ जाए तो उसे वापस तय करना भी आसान नहीं होता।
सोमवार की सुबह कॉकरोच फिर अपने वातानुकूलित कमरों में लौट गए थे। वे अपने ही वीडियो और अपने ही ट्रेंड देख रहे थे। सो मंत्री भी पद पर कायम है। सड़क ने अपनी बात कह दी थी, पर सुनना किसे है!
और सब चल रहा है। देश चल रहा है।


