पिछले साल के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों की ओर से किए गए खर्च का आंकड़ा सार्वजनिक हो गया है। जैसा कि इन दिनों हर चुनाव में हो रहा है, भाजपा ने सबसे ज्यादा 146 करोड़ रुपए खर्च किए। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने अपने खर्च का 10 फीसदी यानी 14 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा प्रचार के लिए गूगल को दिया। बहरहाल, सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस ने भी 35 करोड़ रुपए खर्च किए। कांग्रेस 61 सीटों पर लड़ी थी, जिनमें से करीब 10 सीटों पर अपनी ही सहयोगी पार्टियों के साथ दोस्ताना मुकाबला था। इन सीटों पर पार्टी की ओर से दिए गए पैसे के अलावा भी उम्मीदवारों ने अपना खर्च किया होगा, उसका आंकड़ा कभी भी सामने नहीं आता है।
कांग्रेस ने उम्मीदवारों को देने, प्रचार करने और स्टार प्रचारकों की रैलियों पर जो खर्च किया वह 35 करोड़ है। कांग्रेस कुल छह सीटें जीत पाई है। इस तरह कांग्रेस का एक विधायक छह करोड़ रुपए का पड़ा है। अघोषित खर्च अलग है। कांग्रेस के लिए निराशाजनक बात यह है कि इतना खर्च करने के बाद जीते छह विधायक भी पार्टी की कमान नहीं मान रहे हैं। वे मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं और कांग्रेस अभी तक तय नहीं कर पाई है कि किसको विधायक दल का नेता बनाया जाए। इस बीच विधानसभा के दो सत्र निकल गए। अब राज्यसभा चुनाव है तो कांग्रेस के विधायक अलग तमाशा कर रहे हैं। पिछले दिनों राजद प्रमुख तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह के जीत की रणनीति बनाने के लिए विधायकों की बैठक बुलाई तो उसमें कांग्रेस के तीन विधायक नदारद रहे। गौरतलब है कि एनडीए ने सभी पांच सीटों पर उम्मीदवार दिए हैं। इसलिए 16 मार्च को चुनाव होना है और उससे पहले कांग्रेस के विधायक नखरे दिखा रहे हैं।


